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जम्मू-कश्मीर में वित्त वर्ष 2025-26 में जनजातीय कल्याण के 87% फंड खर्च नहीं हुए

जम्मू-कश्मीर में चालू वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान जनजातीय कल्याण योजनाओं के लिए आवंटित लगभग 87 प्रतिशत धनराशि खर्च नहीं हो पाई है. यह जानकारी जनजातीय मामलों के विभाग के अधिकारियों ने दी है.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, विभिन्न केंद्रीय प्रायोजित और केंद्र शासित प्रदेश (UT) की योजनाओं के तहत 135.33 करोड़ रुपये जारी किए गए थे. लेकिन अब तक केवल 17.63 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए हैं यानी 117.69 करोड़ रुपये बिना उपयोग के पड़े हैं.

अधिकारियों ने बताया कि ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ के तहत जारी 39.21 करोड़ रुपये और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के 14.99 करोड़ रुपये में से एक भी रुपया खर्च नहीं किया गया है.

इसी तरह, जनजातीय अनुसंधान संस्थान के समर्थन के लिए जारी 3.18 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हुए.

प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत 15,371 छात्रों को कवर किया जाना है, जिसके लिए 3.96 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था लेकिन इस मद में कोई राशि जारी ही नहीं की गई.

वहीं ट्राइबल सब-प्लान (TSP) के तहत 6.80 करोड़ रुपये में से केवल लगभग 35 लाख रुपये ही खर्च किए गए हैं.

जनजातीय कल्याण के लिए बुनियादी ढांचे की UT योजना के तहत 65.36 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे, लेकिन फरवरी के मध्य तक केवल 13.99 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके, जिससे अधिकांश राशि अभी भी बची हुई है.

प्रधानमंत्री आदि आदर्श ग्राम योजना (PMAAGY) के तहत पिछले वर्षों की 9.32 करोड़ रुपये से अधिक की बची हुई राशि उपलब्ध थी, जिसमें से अब तक लगभग 6 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं और शेष राशि 31 मार्च तक खर्च करने की योजना है.

अधिकारियों ने यह भी बताया कि केंद्र शासित प्रदेश के बजट में जनजातीय समुदायों के कल्याण के लिए 78 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. इसमें से 70 करोड़ रुपये शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने पर खर्च किए जाने हैं.

ट्राइबल सब-प्लान के तहत 8 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें से 6.80 करोड़ रुपये जिला विकास आयुक्तों को जारी किए जा चुके हैं. इन योजनाओं का उद्देश्य जनजातीय समुदायों के समावेशी और आवश्यकतानुसार विकास को सुनिश्चित करना है.

पिछले वर्षों में जनजातीय कल्याण फंड का उपयोग भी कम रहा है

पिछले वर्ष धरती आभा योजना के तहत जारी फंड्स का बड़ा हिस्सा जिला विकास आयुक्तों द्वारा मंजूर योजनाओं पर खर्च हो चुका था लेकिन कुल मिलाकर 70-80% उपयोग दर रही.

पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति और इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में भी देरी देखी गई. हालांकि PMAAGY जैसे कार्यक्रमों में 60-70 फीसदी फंड खर्च हुआ.

राष्ट्रीय स्तर पर प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति फंड 2022-23 से 2024-25 तक बढ़ा लेकिन जम्मू-कश्मीर में स्थानीय उपयोग 50-60 फीसदी ही रहा.

धरती आभा अभियान (2024 से) के 79 हज़ार 156 करोड़ में जम्मू-कश्मीर को हिस्सा मिला लेकिन ग्रामीण सहमति और टेंडर देरी से 2025-26 में भी समस्या बनी रही.

वहीं चालू वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान आदिवासी कल्याण फंड के 87 फीसदी राशि के न खर्च होने के पीछे कई प्रशासनिक और प्रक्रियागत कारण हो सकते हैं.

सबसे बड़ा कारण नौकरशाही देरी है, जहां टेंडर प्रक्रिया, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण मंजूरी में महीनों लग जाते हैं, जिससे फंड वर्षों तक अटक जाते हैं. साथ ही जमीनी स्तर पर जागरूकता की कमी से लाभार्थी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते.

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