Site icon Mainbhibharat

तेलंगाना: आदिवासियों और गैर-आदिवासियों ने वन कर्मचारियों के खिलाफ असहयोग की चेतावनी दी

मंगलवार को तेलंगाना के खानापुर विधानसभा क्षेत्र के आदिवासियों और गैर-आदिवासियों ने वन अधिकारियों और उनके परिवारों के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू करने की चेतावनी दी.

उन्होंने आरोप लगाया कि वन संरक्षण के नाम पर उन्हें परेशान किया जा रहा है.

उन्होंने आरोप लगाया कि वन अधिकारी ट्रैक्टर ज़ब्त कर रहे हैं, इंदिराम्मा घरों के निर्माण को रोक रहे हैं और गांवों में सड़क बनाने और बिजली के खंभे लगाने जैसे विकास कार्यों में बाधा डाल रहे हैं.

आदिवासियों का कहना है कि अगर उत्पीड़न जारी रहा तो आंदोलन और तेज़ किया जाएगा.”

आदिवासियों ने दावा किया कि कवाल टाइगर रिज़र्व में कोई बाघ नहीं है और स्थानीय निवासियों पर लगाई गई पाबंदियों पर सवाल उठाए.

कदम मंडल के मिड्डेचिंथा गांव के एक आदिवासी ने बताया कि एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने गांव में बनी सीमेंट-कंक्रीट की सड़क को JCB से हटाने की धमकी दी.

ग्रामीणों ने सवाल किया कि विकास कैसे हो सकता है, जब कई सालों से उस इलाके में रहने के बावजूद उन्हें सड़क, बिजली और घर जैसी सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है.

खानापुर के विधायक वेदमा बोज्जू ने आरोप लगाया कि कुछ वन अधिकारी वन संरक्षण और बाघों की सुरक्षा के नाम पर आदिवासियों और गैर-आदिवासियों को परेशान कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि जब वे कवाल टाइगर रिज़र्व के अंदर मछली पकड़ने के आरोप में हिरासत में लिए गए कुछ आदिवासी युवाओं से पूछताछ कर रहे थे, तो वन कर्मियों ने उनका मज़ाक उड़ाया.

उन्होंने कहा, “उन्होंने उनसे पूछा, ‘तुम्हारा बाघ (विधायक) कहां है और क्या वह तुम्हें बचाने आएगा?'”

बोज्जू ने कहा कि वे राज्य सरकार के खिलाफ नहीं हैं बल्कि स्थानीय समुदायों को परेशान करने वाले अधिकारियों के खिलाफ हैं.

उन्होंने वन विभाग से तनाव बढ़ाने के बजाय आदिवासियों और गैर-आदिवासियों की शिकायतों का समाधान करने का आग्रह किया.

उत्पीड़न के ये आरोप जन्नाराम, खानापुर, डंडेपल्ली, कदम, उडुमपुर, डिम्मादुर्थी और इंधनपल्ली वन रेंज के अधिकारियों और जन्नाराम वन मंडल अधिकारी राममोहन के खिलाफ लगाए गए.

आरोप है कि ये सभी ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के फील्ड डायरेक्टर एस. संताराम के निर्देशों पर काम कर रहे थे.

वन विभाग के अधिकारियों पर मनमाने फैसले लेने के आरोप

इससे पहले भी वन विभाग के अधिकारियों पर वन संरक्षण और प्रोजेक्ट टाइगर के नाम पर आदिवासियों को परेशान करने के मामले सामने आते रहे हैं.

अधिकारियों पर आदिवासी इलाकों में बिना ग्राम सभा की अनुमति के मनमाने फैसले लेने के आरोप लगे हैं.

साथ ही वन संरक्षण के नाम पर ज़मीन अधिग्रहण जैसे काम भी बिना ग्राम सभा की सहमति के होते रहे हैं.

साल 2024 में नई दिल्ली स्थित एक अधिकार समूह द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि प्रोजेक्ट टाइगर के कारण कम से कम 5 लाख 50 हज़ार आदिवासी और अन्य वनवासी विस्थापन का सामना कर रहे हैं.

राइट्स एंड रिस्क एनालिसिस ग्रुप (RRAG) की ‘भारत के बाघ अभयारण्य: आदिवासी बाहर निकलें, पर्यटकों का स्वागत’ टाइटल वाली रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2021 से प्रत्येक टाइगर रिर्जव में विस्थापन में 967 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसमें 6 नए रिर्जव की योजना बनाई गई है.

कवाल वन क्षेत्र को 1350 फसली (1940 ईस्वी) में संरक्षित वन (Reserved Forest) घोषित किया गया था और बाद में 1999 में इसे वन्यजीव अभयारण्य और 2011 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था. इसके बाद 2016 से प्रशासन आदिवासियों को विस्थापन के लिए मनाने में लगी है.

आदिवसियों को विस्थापन के लिए अलग-अलग कार्यक्रम के ज़रिए प्रेरित किया जाता रहा है.

Exit mobile version