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अंडमान के जनजातीय प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी से की मुलाकात, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर जताई चिंता

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप से आए एक आदिवासी प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाक़ात की और प्रस्तावित ‘ग्रेट निकोबार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट’ को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर की.

ग्रेट और लिटिल निकोबार की ट्राइबल काउंसिल के प्रमुख बरनबास मंजू और पुलोभाबी गांव के पहले कैप्टन टाइटस पीटर के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं को बताया कि ग्रेट निकोबार द्वीप पर 92,000 करोड़ की परियोजना के संबंध में सरकार से की गई उनकी अपीलों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है.

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि यह परियोजना द्वीप के नाजुक पर्यावरण और वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों के जीवन पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है.

उनका मानना है कि विकास जरूरी है लेकिन यह पर्यावरणीय नुकसान या आदिवासी लोगों के विस्थापन और हाशिये पर जाने की कीमत पर नहीं होना चाहिए.

सदस्यों ने एक संतुलित और टिकाऊ दृष्टिकोण की मांग की जो पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दे और मूल समुदायों के पारंपरिक अधिकारों और आजीविका की रक्षा करे.

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि परियोजना को मंजूरी देने की प्रक्रिया में आदिवासी समुदायों से सही तरीके से सहमति नहीं ली गई.

प्रतिनिधिमंडल ने राहुल गांधी से आग्रह किया कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जाए तथा आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों और आजीविका की रक्षा की जाए.

राहुल गांधी ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि उनके मुद्दों को उचित मंचों पर उठाया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए वे उनके साथ खड़े रहेंगे.

वहीं प्रतिनिधिमंडल में शामिल एक नेता ने कहा, ‘‘लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष ने प्रतिनिधिमंडल की बात धैर्यपूर्वक सुनी और उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों की गंभीरता को समझा. उन्होंने आश्वासन दिया कि इन चिंताओं को उचित मंचों पर उठाया जाएगा.”

उन्होंने यह भी बताया कि राहुल गांधी ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का दौरा करने और वहां के लोगों से सीधे बातचीत करके जमीनी हकीकत को बेहतर ढंग से समझने की भी बात कही.

सरकार की अनदेखी

ट्राइबल काउंसिल का कहना है कि 2004 की सुनामी के कारण विस्थापित होने के बाद से अपनी पुश्तैनी ज़मीनों पर वापस लौटने की उनकी मांगों को नज़रअंदाज़ किया गया है, जबकि उन्होंने केंद्र सरकार को कई पत्र और ज्ञापन भेजे हैं.

कांग्रेस नेताओं से मुलाक़ात के एक दिन बाद श्री मंजू ने पत्रकारों से कहा, “लेकिन सरकार ने हमारी चिंताओं पर एक बार भी कोई जवाब नहीं दिया है. हमने लगभग चार साल पहले ही इस प्रोजेक्ट के लिए अपना NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) रद्द कर दिया था और हमारी ज़मीनों को प्रोजेक्ट क्षेत्र में शामिल किए जाने के मुद्दे पर हम लगातार सरकार को लिखते रहे हैं, लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ.”

इस साल की शुरुआत में काउंसिल ने ज़िला प्रशासन पर अपनी पुश्तैनी ज़मीनें सौंपने के लिए उन पर दबाव डालने का आरोप लगाया था और इस बात को दोहराया था कि वे आदिवासी ज़मीनों पर किसी भी प्रोजेक्ट के आने के लिए अपनी सहमति नहीं देते हैं.

शुक्रवार (20 मार्च) को प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि जैसे-जैसे मेगा-प्रोजेक्ट आगे बढ़ रहा है, सरकारी एजेंसियों से जुड़े प्रतीत होने वाले शोधकर्ताओं और सर्वेक्षकों की बढ़ती संख्या ग्रेट निकोबार द्वीप के विभिन्न हिस्सों का दौरा कर रही है.

हम अपनी ज़मीनें नहीं छोड़ना चाहते

टाइटस पीटर ने कहा, “हमारी बात सीधी-सी है. ऐसा नहीं है कि हम विकास नहीं चाहते. अगर आप कुछ कर रहे हैं तो उसे रेवेन्यू ज़मीनों (जो सरकार की हैं) तक ही सीमित रखें और आदिवासियों की ज़मीनों पर कब्ज़ा न करें. भले ही सरकार हमें अपना सारा पैसा दे दे, हम अपनी ज़मीनें नहीं छोड़ना चाहते.”

2004 में विस्थापित होने के बाद से निकोबारी लोग सरकार द्वारा बनाई गई न्यू चिंगेन और राजीव नगर कॉलोनियों में रह रहे हैं.

उन्होंने आगे कहा, “यहा हमारे लिए शायद ही कुछ है. कुछ दिन पहले, एक गांव के नेता ने यहां एक खेल का मैदान बनाने की कोशिश की थी लेकिन प्रशासन ने इसकी इजाज़त देने से मना कर दिया. हमने देख लिया है कि यहां हमारे लिए कुछ भी नहीं है.”

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट क्या है?

ग्रेट निकोबार द्वीप प्रोजेक्ट में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एक हवाई अड्डा, एक पावर प्लांट और एक टाउनशिप शामिल है.

संसद में सरकार के जवाबों के अनुसार, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एकीकृत विकास निगम द्वारा विकसित किए जा रहे इस प्रोजेक्ट में लगभग 13,000 हेक्टेयर वन भूमि का इस्तेमाल किया जाएगा.

जहां एक ओर इस परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंज़ूरियों को राष्ट्रीय हरित अधिकरण में चुनौती दी गई है. वहीं दूसरी ओर वन मंज़ूरियों को चुनौती देने वाली एक याचिका पर कलकत्ता उच्च न्यायालय में सुनवाई चल रही है.

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