HomeAdivasi Dailyआओ नागा आदिवासी: मोकोकचुंग, उन्गमा गांव और आओला से मुलाक़ात

आओ नागा आदिवासी: मोकोकचुंग, उन्गमा गांव और आओला से मुलाक़ात

आओ समुदाय में आओला का पद किसी एक ख़ास परिवार के लिए आरक्षित नहीं होता. लेकिन यह पद एक ख़ास गोत्र के लोगों को ही मिलता है, और आओला का कार्यकाल तीस बरस का होता है.

नागालैंड के मोन ज़िले में कोनियाक आदिवासियों के साथ हफ़्ते भर का समय बिताकर हम मोकोकचुंग की तरफ़ बढ़े. मोकोकचुंग आओ आदिवासियों का इलाक़ा है. मोन से मोकोकचुंग की सड़क की हालत ठीक ही कही जा सकती है, लेकिन पहाड़ी सड़क होने की वजह से गाड़ी की गति कम ही थी.

एक तरफ़ ऊंचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ घाटी. इस घुमावदार सड़क से चलते हुए पहाड़ी ढलानों पर खेती के नज़ारे मिलते हैं. कई जगहों पर केले के पेड़ नज़र आते हैं, और आप उन्हें देखकर अंदाज़ा लगाने की कोशिश करते हैं कि आख़िर यहां तक लोग कैसे पहुंचते होंगे. क्योंकि ऊंची पहाड़ी ढलानों पर पुहंचना काफ़ी दुश्कर होता होगा. जैसे-जैसे मोकोकचुंग शहर क़रीब आता रहा था, जंगल कम होता जा रहा था और बस्तियां नज़र आने लगी थीं.

जूम खेतों में आओ बुज़ुर्गों से मुलाक़ात

एक जगह हम रुके जहां मील का पत्थर बता रहा था कि मोकोकचुंग अब सिर्फ़ 5 किलोमीटर रह गया है. यहां पहाड़ी ढलानों पर दूर तक फैले खेत खिली धूप में बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रहे थे. खेतों में बलखाती बहुत नीचे तक उतरती पगडंडियां जिनपर फिसलने से बचने के लिए सीढ़ीयां खोद कर बनाई गई हैं. ऊपर सड़क से खड़े होकर खेतों में सैंकड़ों झोंपड़ी नज़र आती हैं.

हमने फ़ैसला किया कि नीचे उतर कर देखा जाए और हो सके तो इन खेतों में किसी से बात करने की कोशिश की जाए. पर ये चिंता थी कि पता नहीं इन खेतों में काम करते लोगों में से कोई हिंदी या इंग्लिश समझ पाएंगे या नहीं. यही सोचते हम एक पगडंडी से नीचे उतर गए. थोड़ा ही नीचे उतरे तो देखा एक बुज़ुर्गदंपत्ति खेतों में छोटी-छोटी खुरपाली से मक्का के बीज चोभ रहे थे.

आओ किसान दंपत्ती से मुलाकात

मैंने इन लोगों को ज़ोर से नमस्ते किया तो इनका ध्यान मेरी तरफ़ गया. दोनों जिस तरह से मुस्कुराए, उससे लगा कि वो हमारे वहां होने से कम-से-कम ख़फ़ा नहीं हैं. मैंने उन्हें बताया कि हम दिल्ली से आए हैं.

वो दोनों मेरे पास आए और झोंपड़ी की तरफ़ चलने का इशारा किया. दोपहर हो चली थी. हल्की ठंड में धूप बहुत अच्छी लग रही थी. हम लोग बाहर ही बैठ गए. बुज़ुर्गमहिला झोंपड़ी के अंदर चली गई. जबकि उनके साथी हाथ धोने लगे. थोड़ी देर में वो बुज़ुर्गमहिला दो प्लेट में चावल और उसके साथ कुछ साग और सूअर का मीट लेकर झोंपड़ी से बाहर निकली.

मुझे लगा कि दोनों के खाने का समय है, और उन्हें आराम से खाना खाने दिया जाए. मैंने बुज़ुर्गमहिला से कहा कि वो खाना खा लें, मैं थोड़ी देर में आता हूं नीचे की तरफ़ घूम कर. लेकिन उन्होनें हंसते हुए मुझे बैठने का इशारा किया. उन्होंने एक प्लेट अपने पति को दे दी, और दूसरी मेरी तरफ़ बढ़ा दी.

लेकिन उन्होंने प्लेट में मौजूद सूअर के मीट की तरफ़ इशारा किया. मैं समझ गया कि वो मुझे बताना चाह रही हैं कि यह सूअर का मीट है. मैंने उन्हें कहा कि मैं सूअर का मीट भी खा लेता हूं. इस पर उनके चेहरे पर संतोष के भाव थे.

ज़ाहिर है इस बुज़ुर्ग दंपत्ति ने अपने खाने में से ही मुझे कुछ खाने के लिए दे दिया था. क्योंकि ये दो लोग ही तो घर से काम करने आए थे तो खाना भी तो अपने ही हिसाब से लाए होंगे. यह बात मैने बुज़ुर्ग पुरुष को कही. उन्होंने हिंदी में हंसते हुए कहा बेफ़िक्र होकर खाएं, उन्हें कम नहीं पड़ेगा. लेकिन उन्हें अफ़सोस है कि वो मेरे कैमरामैन साथियों को खाना नहीं दे पा रहे हैं. मैंने उन्हें बताया कि मेरे साथी मांस नहीं खाते हैं. इसलिए वो अफ़सोस ना करें, उनके लिए गाड़ी में खाना है.

इन दोनों के साथ खाना खाते समय उनके परिवार के बारे में कुछ बातें हुई. इनके कुल 12 बच्चे हैं – 6 लड़के और 6 लड़कियां. सभी पढ़ाई-लिखाई या नौकरी के सिलसिले में बाहर हैं. इनका एक बेटा फ़ौज में है और एक बेटी कोहिमा में नर्स है. खेती इन दोनों बुज़ुर्गों के भरोसे है. इन लोगों से बातचीत में पता चला कि यह स्थिति अब ज़्यादातर परिवारों में दिख रही है. अब यहां भी नई पीढ़ी खेती में खुद को नहीं खपाना चाहती.

आओ आदिवासी इन पहाड़ी ढलानों पर मिश्रित खेती करते हैं. इस खेती में मेहनत बहुत ज़्यादा करनी पड़ती है, और उत्पादन बहुत ज़्यादा नहीं होता है. लेकिन फिर भी परिवार के लिये काफ़ी उत्पादन मिल जाता है. उन्होंने बताया कि यहां पर अभी भी पूरी तरह से परंपरागत खेती होती है. यानि जूम खेती होती है, जिसमें आग से जलाकर पहाड़ों को खाली किया जाता है और फिर उसको खेती के लिए तैयार किया जाता है.

इन खेतों में बेशक फ़सल इन आदिवासियों के अपने परिवार के पालन-पोषण लायक ही हो पाती है, लेकिन एक बात संतोष देने वाली है कि कम से कम यहां की सामाजिक संरचना ऐसी है कि ये बीज, दवा या खाद के लिए साहूकारों के जाल में नहीं फंसे हैं. यहां पर अब फल, रबड़ और दूसरे पौधे लगाये जा रहे हैं. यह एक प्रयोग है जो अगर सफल होता है तो यह आदिवासी समुदाय स्थाई खेती की तरफ़ बढ़ सकता है.

लाल चाय

मैंने बुज़ुर्ग दंपत्ति से अपनी झोंपड़ी दिखाने को कहा तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं चाय पीना पसंद करूंगा. मैंने हां कहा, तो बांस के दो कप में बुज़ुर्ग महिला चाय ले आईं. यह बिना दूध की लाल चाय थी, जिसमें चीनी भी नहीं थी.

दरअसल यहां पर लगभग हर घर अपनी ज़रूरत के लिहाज़ से घर के आंगन में या खेतों में चाय के पौधे लगाता है. इन्होंने बताया कि ये लोग चाय में दूध या चीनी का इस्तेमाल बिलकुल भी नहीं करते हैं. लाल चाय की खुश्बू तो अच्छी थी ही, खाना खाने के बाद यह गर्म चाय मानो मुंह और खाने की नली को ताज़गी भी दे रही थी.

चाय पीने के बाद हम जब इनसे विदा लेने लगे तो उन्होंने झोंपड़ी की तरफ़ इशारा किया. मैं झोंपड़ी के अंदर गया तो कोने में एक चूल्हा था, एक तरफ़ लकड़ियां बहुत ही करीने से जमा करके रखी गईं थीं. चूल्हे पर अभी भी बर्तन में लाल चाय बची थी.

उन्होंने बताया कि यहां जो सैंकड़ों झोंपड़ियां नज़र आ रहीहैं, उनमें सभी में आपको चूल्हा और लकड़ियां ज़रूर मिलेंगे. लकड़ियों को बेहद सफ़ाई से झांगकर चार लकड़ी गाड़ कर उनके बीच फंसा कर जमा किया गया था.

उन्होंने बताया कि जब पहाड़ को खेती के लिए साफ़ किया जाता है तो ये लकड़ियां जमा कर ली जाती हैं. झोंपड़ी में चार-पांच हरे, मोटे और लंबे बांसों को खड़ा करके रखा गया था. मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि इनमें पानी भर कर रखा जाता है. यह पानी झोंपडी में आग लगने की सूरत में इस्तेमाल करने के लिए रखा गया है.

मोकोकचुंग शहर

बुज़ुर्गों से विदा लेकर हम मोकोकचुंग की तरफ़ बढ़े. कुछ ही मिनटों में हमें मोकोकचुंग का बड़ा सा गेट और साइनबोर्ड नज़र आ गया. लोगों से रास्ता पूछते हुए हम अपने होटल पहुंच गए. होटल शहर के सबसे ख़ूबसूरत इलाक़े में था. होटल के पास ही ज़िलाधिकारी का घर और कार्यालय, दोनों थे. आस-पास के घरों को देखकर ही अंदाज़ा लगता था कि यह संपन्न लोगों का इलाक़ा है.

मोकोकचुंग छोटा सा, लेकिन बेहद ख़ूबसूरत शहर है. मौसम के अलावा शहर की साफ़-सफ़ाई सुकून देती है. शहर के बीचों-बीच भव्य बैपटिस्ट चर्च है. इसके अलावा भी ज़िला मुख्यालय होने के नाते यहां पर कई सरकारी भवन और कार्यालय हैं. शहर में किसी तरह की अफ़रा-तफ़री या भीड़-भड़क्का नहीं है. ट्रैफ़िक इत्मिनान से चलता है. लोग यातायात नियम का पालन सहज ही करते हैं और शहर में छोटा सा एक बाज़ार है.

मोकोकचुंग के बाहर की तरफ़ पहाड़ी पर एक वॉचटावर है जहां से पूरे मोकोकचुंग शहर को देखा जा सकता है. इस टावर पर खड़े होकर मोकचुंग कुछ-कुछ दिल्ली के जंतर-मंतर की शेप का नज़र आता है, जिसके बीचों-बीच चर्च की बिल्डिंग है.

क़रीब सोलह सौ वर्ग किलोमीटर में फैला नागालैंड का मोकोकचुंग ज़िला राज्य के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक, आओ आदिवासियों की ज़मीन है. आओ आदिवासी समुदाय की नागालैंड के दूसरे आदिवासी समुदायों से कई समानताएं हैं.

लेकिन उनकी अपनी एक ख़ास पहचान भी है– चाहे वो उनकी भाषा हो, सामाजिक बनावट या गांव प्रशासन की अवधारणा का मामला.आओ आदिवासियों की उत्पत्ति और फैलाव को लेकर कई तरह की कहानियां हैं, और कई तरह के दावे. इस बारे में आओ आदिवासियों में भी कई मिथक प्रचलित हैं.

सबसे ज़्यादा प्रचलित कहानी के हिसाब से आओ आदिवासी एक गुफ़ा से आये जिसे लोंगत्रोक कहा जाता है. जबकी एक और कहानी के हिसाब से आओ आदिवासियों की उत्पत्ति छह पत्थरों से हुई जो दिखू नदी के दक्षिण में संगताम इलाक़े में हैं. ये पत्थर आओ आदिवासियों के अलग-अलग कुटुम्बों का प्रतिनिधत्व करते हैं.

प्रचलित कहानियों के हिसाब से ये आदिवासी दिखू नदी को पार करके आगे बढ़े, और इसलिये इन नागा आदिवासियों को आओ कहा जाता है जिसका मतलब है चले जाना. इसके अलावा कई इतिहासकार और मानव वैज्ञानिक आओ समुदाय का संबंध म्यंमार के आदिवासी समुदायों से लेकर बोरेनियो के ड्याक समुदाय तक से करते हैं.

बहरहाल, आओ समुदाय फ़िलहाल एक संगठित और आधुनिक समाज है. एक समय में नंगे बदन रहने वाले ये आदिवासी आज राज्य का सबसे आगे बढ़ा हुआ समुदाय है. चाहे मामला शिक्षा का हो, संपन्नता का या फिर राजनीतिक प्रभाव का.

मोकोकचुंग में आओ आदिवासियों से मुलाक़ात और बातचीत के लिए यहां की एक लड़की का नंबर हमारी साथी पत्रकार ने दिया था. मोकोकचुंग पहुंचने के अगले दिन सुबह मैंने उस लड़की को फ़ोन लगाया तो उन्होंने कहा कि दरअसल उनके पिता शायद मेरी ज़्यादा मदद कर सकते हैं. उन्होंने मुझे अपने पिता का दे दिया.

मैंने उन्हें फ़ोन लगाया तो उन्होंने कहा कि वो शाम को हम से मिल सकते हैं. इस मकसद से उन्होंने मुझसे होटल का नाम पूछा तो मैंने बताया कि हम डीसी ऑफ़िस के पास एक होटल में ठहरे हैं. इस पर उन्होंने कहा कि अगर हम उस होटल में ठहरे हैं तो फिर हमें किसी और की मदद की ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि उस होटल का मालिक तो खुद ही उन्गमा का रहने वाला है.

उन्गमा यानि आओ आदिवासियों का सबसे बड़ा और मशहूर गांव. उन्होंने मुझे वादा किया कि अगर होटल मालिक से मदद नहीं मिलती है तो वो शाम को हमारे होटल आ जाएंगे और हमारी मदद का पूरा बंदोबस्त कर देंगे.

मैंने होटल के रिसेप्शन पर फ़ोन लगाया और पूछा कि क्या होटल के मालिक से बात हो सकती है. तो उन्होंने कहा कि पूछकर बताते हैं. थोड़ी देर में हमें ख़बर दी गई कि मालिक हमें थोड़ी देर में नाश्ते पर ही मिल जाएंगे. मैंने जैसे ही फ़ोन रखा, बाहर से गोली चलने की आवाज़ आई. मैंने खिड़की से झांका तो देखा एक नागा लड़का पेड़ के नीचे से चिड़िया उठा रहा था जिसको उसने अभी-अभी मारा है.

मोन ज़िले में मैंने देखा था कि कोनियाक नागों के कंधे पर बंदूक और कूल्हे से झूलता दांव या कटार ज़रूर मिलते हैं. यहां पर हमारी मदद कर रहे लड़के ने मुझे बताया था कि सिर्फ़ हवाई जाहज़ को छोड़कर हवा में उड़ने वाली हर चीज़ को नागा खाते हैं.

कुछ देर बाद हम लोग डाइनिंग हॉल पहुंचे तो होटल के मालिक हमारा इंतज़ार कर रहे थे. उनसे परिचय हुआ और मैंने उन्हें बताया कि मुझे पता चला है कि वो उन्गमा गांव से हैं. इस पर उन्होंने हंसते हुए कहा कि होटल के बारे में काफ़ी रिसर्च करके आए हैं आप लोग.

नाश्ते पर अच्छी बातचीत हुई. उसके बाद उन्होंने हमारी दो मदद की. एक तो उन्होंने हमें होटल के सबसे अच्छे कमरों में शिफ़्ट करा दिया, और दूसरा उन्गमा गांव में सूचना भिजवा दी की हम दो घंटे बाद वहां पहुंच रहे हैं. हमारा पूरा एक दिन बच गया था.

उन्गमा गांव में एक दिन

नाश्ता ख़त्म कर हम तुरंत उन्गमा गांव के लिए निकल पड़े. मुश्किल से 10-15 मिनट में हम लोग उन्गमा गांव पहुंच गए. यहां पर एक स्थानीय लड़का पहले से हमारा इंतज़ार कर रहा था. उससे मिलने पर हमें पता चला कि वो बाक़ायदा एक ट्रेन्ड टूरिस्ट गाइड है. उसने बताया कि उन्गमा नागालैंड के टूरिस्ट मैप पर काफ़ी अहम है. यहां पर अक्सर सैलानी आते रहते हैं. बातचीत में उसने कहा कि दरअसल लोग मोकोकचुंग ज़िले को जानते ही उन्गमा गांव की वजह सेहैं.

उन्गमा गांव के एक सिरे पर जो शायद गांव का सबसे ऊंचा सिरा है, वहां पर तीन मूर्ती लगी हैं. ये तीनों मूर्ती आओ पुरुषों की हैं. एक हाथ में भाला और दूसरे हाथ में दांव, नंगे बदन – बिलकुल हमला करने की पोज़िशन में ये मूर्तियां बनाई गई हैं. उस नागा लड़के ने हमें बताया था कि एक समय में आओ समुदाय के पुरुष नंगे बदन ही रहते थे, और वो दरअसल वॉरियर्स थे.

आओ आदिवासी शिकारी और योद्धा हैं

गांवे के इसी ऊंचे सिरे पर एक लॉग ड्रम रखा है, जिसके खोखले हिस्से में मुदगर पड़े थे, जिनसे इस ड्रम को बजाया जाता है. इस लड़के ने बताया कि यह लॉग ड्रम पुराने ज़माने में गांव को किसी आपदा या बाहरी हमले की चेतावनी देने के लिए बजाया जाता था.

उस लड़के ने बताया कि दरअसल यह ऊंचा सिरा गांव पर और गांव में आने वाले रास्तों पर नज़र रखने के लिए वॉच टावर की तरह इस्तेमाल होता था. इस टीले से पूरा उन्गमा गांव नज़र आता है. यहां हमने कुछ फ़ोटो खींचे, और गांव के कुछ वीडियो शॉट्स लिए.

इसके बाद गांव में आगे बढ़ने से पहले मैंने उस लड़के से कहा कि मैं उसकी जानकारी और उस जानकारी को बताने के अंदाज़ से प्रभावित हूं. लेकिन मैं उन्गमा को सिर्फ़ एक टूरिस्ट की नज़र से नहीं देखना चाहता हूं. मैंने उससे रिक्वेस्ट की कि मुझे वो इत्मिनान से गांव में घुमाए, और वहां लोगों से मिलवाए. वो मुस्कुरा दिया. उसने कहा कि उसे भी कोई जल्दबाज़ी नहीं है, और वो हमसे पैसे की उम्मीद भी नहीं कर रहा है.

हम गांव की तरफ़ बढ़े तो हल्की बारिश हो रही थी और गांव लगभग बादलों से ढका हुआ था. हम इस ऊंचे सिरे से उतरती सड़क पर आगे बढ़े. यह काफ़ी चौड़ी और साफ़ सुथरी सड़क है. हम इस सड़क पर सीधे वहां पहुंचे जहां टी प्वाइंट बन जाता है. यानि यह सड़क जहां ख़त्म होती है और गांव के दो हिस्सों की तरफ़ की सड़क इस सड़क में जुड़ जाती है.

उन्गमा नागालैंड का दूसरा सबसे बड़ा गांव माना जाता है, और आओ आदिवासियों के इतिहास में इस गांव की अपनी ख़ास जगह है. 1832 के आस-पास इसाई मिशनरी इस गांव पहुंचे. उन्गमा में विशाल और भव्य चर्च, और गांव की पूरी आबादी इसाई धर्म का पालन करती है. लेकिन गांव और समाज का प्रशासन आज भी आओ आदिवासी परंपराओं से चलता है.

उन्गमा गांव का चर्च

उन्गमा गांव के जिस टी प्वाइंट पर हम पहुंचे थे वहीं पर सामने एक बांस से बना घर है. उसके सामने एक चबूतरा है जिस पर दो बुज़ुर्ग बैठे दांव से बांस की खपच्ची छील रहे थे. इस लड़के ने बताया कि यह गांव का ओल्ड ऐज होम है, जिसे विलेज काउंसिल चलाती है. हम इस घर में अंदर गए. वहां 10-12 बुज़ुर्गमौजूद थे. उनमें से एक दांव से मछली काट रहा था, और बाक़ी लोग बाहर बैठे बुज़ुर्गों की तरह ही बांस को छील या काट रहे थे. घर में एक तरफ़ बांस से बनी टोकरी, मछली पकड़ने के ट्रैप और गांव के मोरोंग के रेप्लिका रखे थे. घर के बीचों-बीच नागा स्टाइल का चूल्हा था. यानि लोहे के दो-तीन फ़्रेम स्टोव की तरह रखे थे और उनके नीचे लकड़ियां जल रही थीं.

उन्गमा गांव के बुज़ुर्गजो साठ बरस की उम्र पार कर चुके हैं,उनके लिये विलेज काउंसिल ने यहओल्ड ऐज होम बनाया है.

उन्गमा का ओल्डऐज होम

कुछ ही देर में विलेज काउंसिल के एक मेंबर यहां पहुंचते हैं. उन्हें भी हमारे यहां आने की सूचना मिल गई थी. उनसे मुलाक़ात हुई. वो हमें लेकर यहां छोटे-छोटे बांस से बने मूढ़ों पर बैठ गए. उन्होंने अपना नाम आईएस चमियार बताया. उनसे बातचीत का सिलसिला काफ़ी लंबा चला. उन्होंने बताया कि इस आश्रम के लिए विलेज काउंसिल मनरेगा के तहत मिलने वाले फ़ंड का एक हिस्सा इस्तेमाल करती है. उन्होंने बातचीत में यह भी बताया कि यहां पर ये बुज़ुर्ग परंपरागत चीज़ें बनाते हैं और गांव की नई पीढ़ी को भी सिखाते हैं. इसके अलावा यहां बनी चीज़ों को टूरिस्ट ख़रीद लेते हैं.

मैंने उनसे पूछा कि विलेज काउंसिल गठन की प्रक्रिया क्या है. उन्होंने बताया कि आओ आदिवासी गांव खेल में बंटे होते हैं और खेल में कई कुटुम्ब होते हैं. हर कुटुम्ब से विलेज काउंसिल का सदस्य नामित होता है. हर विलेज काउंसिल का एक चेयरमैन होता है. गांव के खेलों को आप अलग-अलग सैक्टर या मोहल्लों के तौर पर समझ सकते हैं. आईएस चामियार बताते हैं कि विलेज काउंसिल में अलग-अलग क्लैन से लोगों को नामित किया जाता है. वो बताते हैं कि पहले विलेज काउंसिल में सिर्फ़ 6 सदस्य होते थे, लेकिन फ़िलहाल 44 सदस्य हैं. उन्होंने कहा कि यह बढ़ोतरी गांव की आबादी बढ़ने के साथ-साथ हुआ है.

विलेज काउंसिल के सदस्य

यहां विलेज काउंसिल परंपरागत क़ानूनों को लागू करने के अलावा गांव के विकास और सुरक्षा से जुड़े नियम भी बनाती है. मसलन उन्गमा गांव की कांउसिल ने नियम बनाया है कि पतझड़ के मौसम में हर घर के बाहर बड़े और मोटे बांसों में पानी भर कर रखना है. इसकी वजह है कि पतझड़ के मौसम में घरों में आग लगने की घटनाएं होती हैं, और पानी की कमी होती है. इस नियम को तोड़ने पर विलेज काउंसिल जुर्माना करती है हालांकिऐसी नौबत कम ही आती है. विलेज काउंसिल गांव के क़ानूनी और सामाजिक मामलों में सर्वशक्तिमान संस्था है. यानि विलेज काउंसिल का फ़ैसला किसी भी मामले में लगभग अंतिम होता है.

कुछ देर उनके साथ बैठ कर गप्प लगाने के बाद हम बाहर चले आए. बाहर आते समय उन्होंने मुझे बताया कि एक समय आओ समुदाय का आध्यात्मिक, सैन्य और सामाजिक गुरू आओला होता था. यह संस्था अभी भी है. उनके गांव में भी आओला है. मैंने आओला से मिलने की इच्छा जताई तो उन्होंने हमारे साथ मौजूद नागा लड़के को मुझे आओला से मिलवाने के लिए कह दिया.

आओ समुदाय में आओला का पद किसी एक ख़ास परिवार के लिए आरक्षित नहीं होता. लेकिन यह पद एक ख़ास गोत्र के लोगों को ही मिलता है, और आओला का कार्यकाल तीस बरस का होता है. उन्गमा गांव के वर्तमान आओला की नियुक्ति तीन साल पहले ही हुई है. उस लड़के के साथ हम आओला के घर की तरफ़ निकल पड़े. दोपहर का समय हो चुका था. बच्चे स्कूल से घरों को लौट रहे थे. स्कूल से लौटते बच्चों की ड्रैस, उनके जूते और छातों से अंदाज़ा लगाया जा सकता था की उन्गमा गांव में स्कूल किसी भी बड़े शहर के स्कूल के स्तर के हैं. इन बच्चों में लड़कियों की तादाद भी काफ़ी थी. आओला के घर की तरफ़ जाते हुए इस लड़के ने बताया कि उन्गमा से लड़के-लड़कियां बड़ी तादाद में स्कूलिंग के बाद हायर एजुकेशन के लिए बाहर जाते हैं.

स्कूल से घर लौटती उन्गमा गांव की लड़कियां

उन्गमा गांव के आओला घर पर ही मौजूद थे. उम्र में कुछ ख़ास नहीं लग रहे थे. पैंट शर्ट और जैकेट पहने थे. लेकिन एक नागा शॉल भी ओढ़े थे.उनके घर को देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आओला संपन्न परिवार से हैं. उन्होंने काफ़ी गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया और चाय के साथ कुछ खाने के लिए भी ऑफ़र किया, जिसकी हमें काफ़ी ज़रूरत महसूस हो रही थी.

उन्गमा गांव के आओला

बातचीत में उन्होंने बताया कि उनकी पांच बेटियां हैं. मैंने उनसे हंसते हुए पूछ दिया कि क्या लड़के की चाह में उन्होंनेपांच बेटियां पैदा की थीं. इस पर उन्होंने कुछ साफ़ जवाब नहीं दिया, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि उनके पिता के बाद वो आओला बने हैं, मगर उनकी बेटियां आओला नहीं बन सकतीं. उन्होंने अपनी सभी बेटियों को आधुनिक शिक्षा के लिये शहर भेजा है. लेकिन उनकी पांचों बेटियों में से एक भी ना तो पिता की संपत्ति में हिस्सा पा सकती है और ना ही अपने पिता की तरह उनके रिटायर होने पर आओला का पद संभाल सकती है. वो कहते हैं कि आओ कस्टमरी लॉ में इसकी इजाज़त नहीं है.

आओला नियुक्ति पर उन्होंने बताया कि उनके गांव में तीन कुटुम्ब हैं, चमियार, लौगम और पुवन. पिछले कम से कम 300 साल से इस गांव में चमियार कुटुम्ब से ही आओला होते रहे हैं. उनसे पहले उनके पिता इस गांव के आओला थे. वो अब रिटायर हो चुके हैं, और अपना अलग घर बनाकर रहते हैं.

उनके घर में उनकी बेटियों की कई तस्वीरें लगी थीं. जिस तरह से वो अपनी बेटियों के बारे में बात कर रहे थे, उससे लग रहा था कि वो अपनी बेटियों से बेहद प्यार करते हैं. मैंने उनसे यह बात पूछ दी. उन्होंने कहा कि वो अपनी बेटियों पर ख़ूब ख़र्च कर रहे हैं. वो उन्हें बेहद प्यार भी करते हैं. लेकिन वो कस्टमरी लॉ के ख़िलाफ़ नहीं जा सकते. उन्होंने कहा कि वो चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते.

उन्होंने कहा कि आओला का पद ही क्यों, नागा महिलाएं विलेज काउंसिल या किसी भी संस्था का हिस्सा नहीं हो सकती हैं. वो कहते हैं कि इस तरह की मांग कभी-कभी होती है. जैसे मैंने सवाल पूछे हैं कुछ और लोग भी सवाल पूछते हैं. वो कहते हैं कि जो लोग नागा समाज और उसके इतिहास को नहीं समझते या जानते, उनके मन में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं.

यहां मैं अपने पढ़ने वालों से यह ज़रूर कहना चाहूंगा कि बेशक नागा समाज में फ़ैसले लेने वाली संस्थाओं में नागा महिलाओं का प्रतिनिधत्व या फिर उनसे जुड़े नियम कायदों पर सवाल ज़रूर किए जा सकते हैं. लेकिन इसके बावजूद परिवार में या समाज में नागा महिलाओं का स्थान या सम्मान उत्तर भारत के कई राज्यों की महिलाओं की तुलना में बेहतर है.

उन्गमा के आओला से मैंने आग्रह किया कि क्या मैं उनके पिता से भी मिल सकता हूं. उन्होंने अपने पिता को फ़ोन किया तो पता चला वो घर पर ही हैं. उस लड़के को उन्होंने हमें उनके पिता से मिलवाने के लिए कहा.

आओला के पिता का नाम अब मुझे याद नहीं आ रहा है, लेकिन वो काफ़ी खुशमिज़ाज आदमी हैं. गांव के बाहर की तरफ़ जहां से गहरी घाटी शुरू होती है, पहाड़ के एकदम किनारे पर ऊंचाई पर उनका घर है. घर बिलकुल नया बना है, बल्कि यह कहा जा सकता है कि अभी बन ही रहा है. घर में लकड़ी की फ़्लोरिंग का काम चल रहा है. उन्होंने हमें जिस कमरे में बिठाया उसमें एक बड़ी सी खिड़की थी. सामने बेहद ख़ूबसूरत पहाड़ नज़र आते हैं.

उनके बारे में और उन्गमा के बारे में कुछ बातें करने के बाद उनसे मैंने पूछ दिया कि आख़िर क्यों नागा समुदाय अभी भी औरतों को विलेज काउंसिल में शामिल नहीं करते हैं. इस पर उन्होंने भी वही कहा जो उनके बेटे यानि वर्तमान आओला ने कहाथा , “नागा समुदाय को समझे बिना यह समझना बेहद मुश्किल काम है.”

उन्होंने मुझे नागाओं में आओ समुदाय की उत्पत्ति के बारे में 6 पत्थर वाली कहानी सुनाई. उसके बाद कहा कि आप मोकोकचुंग देखते हैं, और फिर उन्गमा आते हैं. उन्गमा आने के बाद आपकी गांवों के बारे में धारणा बदल जाती है. यह एक आधुनिक गांव है. वो मुझे याद दिलाते हैं कि मैंने गांव के ऊंचे सिरे पर आओ समुदाय के प्राचीन पुरुष की मूर्ति देखी होगी. वो कहते हैं कि मेरे मन में जो सवाल है वो वाजिब है. पिछले 200 साल में आओ समुदाय ने आधुनिक तौर-तरीक़े अपनाए हैं. एक वक़्त नंगे बदन रहने वाले आओ समुदाय के लोग अब दुनियाभर के फ़ैशन के बारे में जानते हैं. यहां की लगभग पूरी आबादी इसाई धर्म को मानने लगी है. वो कहते हैं कि इसके बावजूद कि हम चर्च जाते हैं और इसाई हैं, लेकिन अपनी उत्पत्ति आज भी उन्हीं 6 पत्थरों से मानते हैं. इसके अलावा अपने कस्टमरी लॉ के बारे में भी हमारा समुदाय बेहद सचेत है.

आगे वो बताते हैं कि भारत का संविधान भी आओ नागा आदिवासियों के कस्टमरी लॉ को स्वीकार करता है, और इसके अनुसार अपने समाज और स्थानीय प्रशासन को चलाने कि इजाज़त देता है. वो बताते हैं कि आओ नागा गांव ख़ासतौर पर, और नागा आदिवासियों के बाक़ी समुदायों में हर गांव अपने आप में एक गणराज्य है. नागा आदिवासियों के लिए अपने ऊपर राज स्वीकार करना बेहद मुश्किल काम है. उन्होंने हमें मोकोकचुंग कस्टमरी लॉ कोर्ट जाने और देखने की सलाह दी.

उनसे आओ समुदाय को लेकर लंबी बातचीत हुई. इस बातचीत में उन्होंने नागा कस्टमरी लॉ, क्लैन सिस्टम और स्थानीय प्रशासन के बारे में काफ़ी जानकारी दी. इस मसले पर यहां सबकुछ लिखना संभव नहीं है. इसलिए आओ कस्टमरी लॉ और भारत के संविधान के प्रवाधानों पर अलग से लिखा जाएगा.

आओ समुदाय के क्लैन सिस्टम के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसे समझने के लिए हम हिंदू धर्म के गोत्र सिस्टम की मदद ले सकते हैं. यानि आओ अपने क्लैन की लड़कियों से शादी नहीं करते हैं. इन नागाओं की ज़मीन क्लैन की होती है. उसी तरह से विलेज काउंसिल में प्रतिनिधित्व भी क्लैन से ही होता है. लड़कियां शादी करने के बाद दूसरे क्लैन में चली जाती हैं. इसलिए उन्हें ज़मीन में हिस्सा दिया ही नहीं जा सकता. क्योंकि ज़मीन सिर्फ़ परिवार की नहीं बल्कि क्लैन यानि कुटुंब की होती है.

इस लंबी बातचीत के बाद हम लोगों ने जब उनसे विदा ली तो उन्होंने अपने हाथ से बनाया दांव मुझे भेंट किया. उन्होंने कहा कि मैं दिल्ली से इतनी दूर सिर्फ़ घूमने या फ़ोटोग्राफ़ी के लिए नहीं आया बल्कि आओ समुदाय को समझने की कोशिश में हूं, इसलिए वो अपने समुदाय का यह प्रतीक मुझे दे रहे हैं.

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