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इन आदिवासी बस्तियों में ईवीएम ही बड़ी मुश्किल से पहुंचती हैं, तो राजनेता क्या पहुंचेंगे

चुनाव के मौसम में नीलगिरी ज़िले के दूरदराज़ के आदिवासी इलाक़ों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पहुंचाना यहां के चुनाव अधिकारियों की सबसे बड़ी चुनौती है. पहाड़ी रास्ते, घने जंगल और जंगली जानवरों का डर यहां इनके लिए बड़ी मुश्किलें पैदा करते हैं.

शायद यही वजह है कि राजनेता चुनाव से पहले इन क्षेत्रों में प्रचार (Campaign) के लिए आने से कतराते हैं. ऐसे में ज़ाहिर सी बात है कि इन बस्तियों में रहने वाले आदिवासियों के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं.

चुनाव अधिकारियों के मुताबिक़ नीलगिरी की पहाड़ियों में तीन बस्तियां ऐसी हैं, जहां पहुंचने के लिए सबसे ज़्यादा मुश्किल का सामना करना पड़ता है. इनमें कुन्नूर निर्वाचन क्षेत्र के तेंगूमरहडा और अनइपालम, और गुडालुर का नागमपल्ली क्षेत्र शामिल हैं.

इन बस्तियों तक पहुंचने के लिए सड़कें नहीं हैं, और घने जंगलों के बीच से होते हुए पहाड़ी रास्तों पर लंबा रास्ता तय करना पड़ता है. इसके अलावा छोटी-छोटी नावों पर नदी भी पार करनी पड़ती है.

ऐसे में इतनी दिक्कतों का समाना करने के बजाय, पार्टी कार्यकर्ता और नेता प्रचार के लिए यहां पहुंचते ही नहीं हैं.

यहां रहने वाले आदिवासियों को वैसे भी वोट देने के लिए प्रोत्साहित करना चुनाव अधिकारियों के लिए बड़ी चुनौती है. जब नेता प्रचार के लिए न पहुंचें, तो यहां के आदिवासियों के लिए अपने मुद्दों के हिसाब से किसी उम्मीदवार को वोट देना नामुमकिन है.

हालांकि नीलगिरी ज़िला अपनी आदिवासी आबादी के लिए जाना जाता है, इनकी संख्या में पिछले कई सालों में काफ़ी गिरावट आई है. 200 साल पहले जब अग्रेज़ों ने पहली बार 1821 में यहां की आबादी का सर्वेक्षण किया, तो पाया कि नीलगिरी में 100 प्रतिशत आबादी आदिवासी है.

लेकिन 1961 तक आते-आते आदिवासी समूहों की आबादी कुल आबादी का केवल 25 प्रतिशत रह गई. पिछली जनगणना में यहां की आदिवासी आबादी 25,048 है, या ज़िले की कुल आबादी का लगभग 3.5 प्रतिशत हिस्सा.

इनमें पनिया, बेट्टा कुरुम्बा, मुल्लू कुरुम्बा, इरुला आदि समुदाय शामिल हैं.

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