तेलंगाना में शिक्षा में सबको शामिल करने पर होने वाली चर्चा अक्सर इंफ्रास्ट्रक्चर, दाखिले और पढ़ाई जारी रखने जैसे मुद्दों पर केंद्रित होती है. हालांकि, एक ऐसा मुद्दा भी है जिस पर कम चर्चा होती है लेकिन वो काफी अहम है. वह है आदिवासी छात्रों का भाषा सीखना, खासकर हिंदी सीखना.
तेलंगाना टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, आश्रम स्कूलों, जनजातीय कल्याण आवासीय विद्यालयों, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों और आदिलाबाद, कोमाराम भीम आसिफाबाद, मुलुगु, भद्राद्री कोठागुडेम, महबुबाबाद, नागरकुर्नूल और अन्य आदिवासी बहुल जिलों के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले हजारों आदिवासी बच्चों के लिए, हिंदी केवल पाठ्यक्रम में एक विषय नहीं है; यह तीसरी या कभी-कभी चौथी भाषा का भी प्रतिनिधित्व करती है.
हालांकि हिंदी उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोज़गार और राष्ट्रीय एकता के लिए एक महत्वपूर्ण संपर्क भाषा है.
लेकिन आदिवासी छात्रों के लिए इसे सीखना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है क्योंकि उनकी भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि मुख्यधारा के शैक्षिक माहौल से काफी अलग होती है.
तेलंगाना में कई अनुसूचित जनजाति समुदाय रहते हैं. जिनमें गोंड, कोया, कोलम, नाइकपोड, चेंचू, थोटी, कोंडा रेड्डी, लाम्बाडा और येरुकुला शामिल हैं.
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, तेलंगाना की आबादी में अनुसूचित जनजातियों की हिस्सेदारी करीब 9.1 फीसदी है.
कई आदिवासी बस्तियों में बच्चे गोंडी, कोया, कोलामी, नाइकी, चेंचू या लाम्बाडी जैसी आदिवासी भाषाएं बोलते हुए बड़े होते हैं.
बहुभाषी बदलाव
जब वे स्कूल में दाखिला लेते हैं तो उन्हें पढ़ाई की भाषा के तौर पर तेलुगु से परिचित कराया जाता है. इसके बाद तीसरी भाषा के रूप में हिंदी और एक और अनिवार्य भाषा के तौर पर अंग्रेज़ी को शामिल किया जाता है.
इस तरह एक आदिवासी बच्चे को अक्सर एक ही समय में चार भाषाई प्रणालियों से निपटना पड़ता है, जिससे पढ़ाई का ऐसा बोझ बनता है जिसका अनुभव शहरी इलाकों के छात्र शायद ही कभी करते हैं.
कई भाषाओं के बीच का यह बदलाव सीखने का एक जटिल माहौल बनाता है.
तेलुगु बोलने वाले बच्चों के उलट, जो क्लास में सिखाई गई बातों को घर पर होने वाली बातचीत से जोड़ सकते हैं, आदिवासी छात्रों को अक्सर स्कूल के पहले ही दिन भाषा की ऐसी संरचनाओं का सामना करना पड़ता है जिनसे वे परिचित नहीं होते.
नतीजतन, भाषा सीखने में आने वाली मुश्किलें समय के साथ बढ़ती जाती हैं और ये मुश्किल हिंदी की क्लास में और भी साफ़ तौर पर दिखाई देने लगती हैं.
एक मुख्य बाधा आदिवासी भाषाओं और हिंदी के बीच भाषाई अंतर है. गोंडी, कोया, कोलामी और चेंचु अलग-अलग भाषाई परंपराओं से जुड़ी हैं और इनकी ध्वनियां, व्याकरण और शब्दावली बिल्कुल अलग-अलग हैं.
हिंदी में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली कई ध्वनियां आदिवासी भाषाओं में नहीं होतीं, जिससे उच्चारण मुश्किल हो जाता है. इसी तरह, हिंदी में वाक्य बनाने का तरीका आदिवासी भाषाओं के बोलने के तरीकों से काफी अलग होता है.
ऐसे में छात्र अक्सर बिना सही समझ या बातचीत के कौशल को विकसित किए ही पाठ को रट लेते हैं.
एक और चुनौती हिंदी बोलने वाले माहौल का न होना है. ज़्यादातर आदिवासी गांवों में रोज़ाना बातचीत आदिवासी भाषाओं और तेलुगु में होती है. क्लास के बाहर हिंदी सुनने या इस्तेमाल करने के मौके बहुत कम मिलते हैं.
शहर के बच्चों के उलट, जो टीवी, सिनेमा, सोशल मीडिया और दोस्तों के साथ बातचीत के ज़रिए हिंदी के संपर्क में आते हैं. आदिवासी छात्र शायद सिर्फ़ क्लास के दौरान ही हिंदी के संपर्क में आते हैं.
किसी भी भाषा को फ्लूएंट यानि धाराप्रवाह बोलने के लिए भाषा के संपर्क में आना और अभ्यास करना जरूरी है. सहायक भाषाई वातावरण के बिना हिंदी एक जीवंत भाषा के बजाय परीक्षा का विषय बनकर रह जाती है.
शिक्षकों की उपलब्धता एक और बड़ी चिंता का विषय है.
कई आदिवासी स्कूलों में हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षकों की कमी है, जबकि दूर-दराज़ के इलाकों में तैनात कई शिक्षकों के पास बहुभाषी शिक्षण पद्धति (multilingual pedagogy) की ट्रेनिंग नहीं है.
जो शिक्षक आदिवासी भाषाओं से परिचित नहीं होते, उन्हें अक्सर हिंदी की बातें ठीक से समझाने में मुश्किल होती है. नतीजा यह होता है कि भाषा को सही ढंग से सीखने-समझने के बजाय, रटने और अनुवाद करने पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है.
पूरे भारत में बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रमों के अनुभवों से पता चला है कि आदिवासी बच्चों के सीखने के नतीजों को बेहतर बनाने में शिक्षकों की तैयारी एक अहम भूमिका निभाती है.
जिन कार्यक्रमों में ट्रेंड बहुभाषी शिक्षकों और संस्कृति के हिसाब से सही शिक्षण सामग्री का इस्तेमाल किया गया है, उनमें आदिवासी छात्रों की भागीदारी, आत्मविश्वास और पढ़ाई-लिखाई में बेहतर नतीजे देखने को मिले हैं.
असल ज़िंदगी से दूर
सिलेबस भी कई मुश्किलें खड़ी करता है. ज़्यादातर हिंदी की किताबें आम छात्रों के लिए बनाई गई हैं और उनमें अक्सर शहरी जीवनशैली, मिडिल-क्लास के अनुभव और ऐसी सांस्कृतिक बातें दिखाई जाती हैं जिनसे आदिवासी छात्र अनजान होते हैं.
बड़े शहरों की ज़िंदगी, रेलवे स्टेशनों, एयरपोर्ट और शहर के बाज़ारों की कहानियों का दूर-दराज़ के जंगली गांवों में रहने वाले बच्चों से अक्सर कोई लेना-देना नहीं होता.
इससे सीखने वालों को क्लासरूम में पढ़ाई जाने वाली बातों को अपनी असल ज़िंदगी से जोड़ने में मुश्किल होती है.
शिक्षा से जुड़े शोध में इस बात पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है कि संस्कृति से जुड़ी पढ़ाई के तरीकों से छात्रों की भागीदारी और समझ बेहतर होती है. जब पढ़ाने के मटीरियल में स्थानीय कहानियां, परंपराएं, आजीविका और पर्यावरण से जुड़ी जानकारी शामिल की जाती है, तो सीखना ज़्यादा सार्थक और असरदार हो जाता है.
सामाजिक-आर्थिक हालात भाषा सीखने की प्रक्रिया को और मुश्किल बना देते हैं. कई आदिवासी परिवारों को गरीबी, मौसमी पलायन, घर पर पढ़ाई-लिखाई में मदद की कमी और किताबों या डिजिटल संसाधनों तक सीमित पहुंच जैसी लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.
जो छात्र अपने परिवार में पहली बार पढ़ाई कर रहे होते हैं, उनके पास अक्सर ऐसे परिवार के सदस्य नहीं होते जो हिंदी के असाइनमेंट में उनकी मदद कर सकें. ऐसे हालात में भाषा सीखना पूरी तरह से स्कूल में मिलने वाली शिक्षा पर निर्भर हो जाता है. जबकि स्कूल में भी स्टाफ की कमी और संसाधनों की सीमित उपलब्धता जैसी दिक्कतें हो सकती हैं.
डिजिटल अंतर इस समस्या को और बढ़ा देता है. जहां शहरी भारत में डिजिटल शिक्षा भाषा सीखने के तरीके को बदल रही है, वहीं कई आदिवासी इलाकों में अभी भी कनेक्टिविटी की समस्याएं हैं और डिवाइस तक पहुंच सीमित है.
फिर भी, नई-नई तकनीकी पहल उम्मीद जगाने वाले समाधान पेश कर रही हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में हाल के इनोवेशन से ऐसे ट्रांसलेशन टूल विकसित हुए हैं जो आदिवासी भाषाओं को हिंदी और अंग्रेज़ी से जोड़ते हैं.
IIIT हैदराबाद, IIT दिल्ली और अन्य रिसर्च संगठनों की ‘आदि वाणी’ पहल यह दिखाती है कि कैसे टेक्नोलॉजी आदिवासी भाषाओं, हिंदी और अंग्रेज़ी के बीच बातचीत को आसान बनाकर भाषाई अंतर को कम कर सकती है.
तेलंगाना में बोली जाने वाली आदिवासी भाषाओं, जैसे कोया, कोलामी और नाइकडी के लिए भी ऐसी ही कोशिशें की जा रही हैं.
तेलंगाना के लिए सीख
भारत के दूसरे हिस्सों में बहुभाषी शिक्षा की पहलों से मिले अनुभव तेलंगाना के लिए बहुत काम के हैं. ओडिशा के बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत आदिवासी भाषाओं से हुई थी और धीरे-धीरे इसमें और भाषाएं जोड़ी गईं.यह कार्यक्रम हज़ारों स्कूलों तक फैला और इससे आदिवासी बच्चों की सीखने की क्षमता में सुधार देखा गया.
इसी तरह, झारखंड का ‘पलाश’ कार्यक्रम अभी 35 हज़ार से ज़्यादा आदिवासी छात्रों को उनकी अपनी भाषाओं में शिक्षा दे रहा है. इसमें 1,000 से ज़्यादा ट्रेंड टीचर और संस्कृति के अनुकूल सीखने-सिखाने की सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है.
ये अनुभव बताते हैं कि बच्चे दूसरी भाषाएं ज़्यादा बेहतर ढंग से तब सीखते हैं जब उनकी मातृभाषा का सम्मान किया जाता है और उसे आगे की पढ़ाई के लिए आधार बनाया जाता है.
इसलिए, इसका समाधान आदिवासी भाषाओं की कीमत पर हिंदी थोपने में नहीं है. इसके बजाय, तेलंगाना को एक व्यापक बहुभाषी रणनीति अपनानी चाहिए.
शुरुआती वर्षों में आदिवासी भाषाओं का इस्तेमाल बेसिक सीखने के साधन के तौर पर किया जाना चाहिए और उसके बाद व्यवस्थित रूप से तेलुगु, हिंदी और अंग्रेज़ी की ओर बढ़ना चाहिए.
पाठ्यपुस्तकों में आदिवासी लोककथाओं, स्थानीय इतिहास, पर्यावरण की जानकारी और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को शामिल किया जाना चाहिए.
शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शिक्षकों को बहुभाषी शिक्षण कौशल में सक्षम बनाया जाना चाहिए.
द्विभाषी शब्दकोश, अनुवाद एप्लिकेशन, ऑडियो लेसन और समुदाय-आधारित भाषा संसाधन विकसित करने के लिए डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
तेलंगाना में आदिवासी छात्रों के बीच हिंदी सीखने का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि भाषाई विविधता को बाधा के बजाय एक शैक्षिक संपत्ति के रूप में देखा जाए.
आदिवासी बच्चों से यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वे हिंदी सीखने के लिए अपनी मातृभाषा छोड़ दें.
इसके बजाय, शिक्षा नीति को स्थानीय भाषाओं और राष्ट्रीय भाषाओं के बीच सेतु का काम करना चाहिए. इस तरह का दृष्टिकोण हिंदी में दक्षता को मजबूत करेगा और साथ ही आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक विरासत को भी संरक्षित करेगा.
अगर तेलंगाना सभी को साथ लेकर चलने वाला बहुभाषी शिक्षा का ढांचा बनाने में सफल हो जाता है, तो हिंदी चिंता का कारण बनने के बजाय अवसरों की भाषा बन सकती है.
अपनी मातृभाषा में शिक्षा, संस्कृति से जुड़े पाठ्यक्रम, शिक्षकों को सशक्त बनाने और डिजिटल इनोवेशन को मिलाकर, राज्य आदिवासी छात्रों के लिए भाषा सीखने के नतीजों को बेहतर बना सकता है.
साथ ही यह शिक्षा में बराबरी, सामाजिक समावेश और आदिवासियों के टिकाऊ विकास जैसे बड़े लक्ष्यों को भी आगे बढ़ा सकता है.

