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कर्नाटक के 48,000 आदिवासी परिवारों को चार महीने से पौष्टिक भोजन किट नहीं मिली

कर्नाटक के आठ ज़िलों में करीब 48 हज़ार आदिवासी परिवारों को पिछले चार महीनों से पौष्टिक भोजन किट नहीं मिली है. जिससे उन्हें ज़रूरी खाद्य सामग्री मिलने में दिक्कत हो रही है.

इतनी लंबी देरी के कारण कई परिवारों को अपनी रोज़ाना की पोषण संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने में संघर्ष करना पड़ रहा है.

सूत्रों का कहना है कि पिछला सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद सप्लाई रोक दी गई थी.

राज्य सरकार ने आदिवासी समुदायों में कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए साल 2008 में पौष्टिक भोजन किट योजना शुरू की थी. शुरू में ये किट मॉनसून के मौसम में सिर्फ़ छह महीने के लिए बांटी जाती थीं.

फिर साल 2023 में इस योजना का विस्तार किया गया ताकि पूरे साल पौष्टिक भोजन किट दी जा सकें.

इस किट में चावल, दाल, चीनी, मूंगफली, खाना पकाने का तेल और घी जैसी ज़रूरी चीज़ें होती हैं.

जिन आदिवासी परिवारों की सालाना आय 2.5 लाख रुपये से कम है, वे पौष्टिक भोजन किट पाने के हकदार हैं और इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए ज़रूरी आय प्रमाण पत्र पांच साल तक मान्य रहता है.

इस योजना में 11 आदिवासी समुदाय शामिल हैं, जिनमें कोरगा और जेनू कुरुबा भी हैं, जिन्हें ‘खास तौर पर कमज़ोर आदिवासी समूह’ (PVTG) के तौर पर वर्गीकृत किया गया है.

समुदाय के लोगों का कहना है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर कई आदिवासी परिवार अपनी पोषण संबंधी ज़रूरतों के लिए हर महीने मिलने वाली भोजन किट पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहते हैं.

दक्षिण कन्नड़ ज़िला कोरगा संघ के अध्यक्ष सुंदर कोरगा ने कहा कि कोरगा परिवारों को मार्च से पौष्टिक भोजन किट नहीं मिली है. उडुपी ज़िले में आखिरी बार वितरण फरवरी में हुआ था.

उन्होंने सरकार से मांग की कि समय पर वितरण सुनिश्चित करने के लिए डिप्टी कमिश्नर की देखरेख में ज़िला स्तर पर खरीद की अनुमति देकर खरीद प्रक्रिया को विकेंद्रीकृत किया जाए.

उन्होंने कहा, “अगर ज़िला स्तर पर टेंडर निकाले जाएं तो भोजन किट की क्वालिटी और समय पर सप्लाई से जुड़ी समस्याओं को ज़्यादा बेहतर ढंग से हल किया जा सकता है.”

कई आदिवासी समुदाय अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर रहते हैं और अक्सर मॉनसून के दौरान वे जंगलों में नहीं जा पाते हैं.

चामराजनगर ज़िले के सोलिगा समुदाय के सदस्य जे. बोम्मैया ने कहा कि पौष्टिक भोजन किट बांटने में देरी के कारण कई आदिवासी परिवारों को आजीविका की तलाश में दूसरे ज़िलों, खासकर कॉफी बागानों में काम करने के लिए पलायन करना पड़ा है.

उन्होंने कहा कि इस इलाके को टाइगर रिज़र्व और वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी घोषित किए जाने के बाद वन विभाग की ओर से मिलने वाले रोज़गार के मौके भी कम हो गए हैं.

उन्होंने कहा, “इस वजह से माता-पिता को काम पर जाते समय अपने बच्चों को भी साथ ले जाना पड़ता है, जिससे उनकी पढ़ाई में रुकावट आती है. सरकार को फ़ूड किट बांटने का काम तेज़ी से करना चाहिए.”

दक्षिण कन्नड़ में इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (ITDP) के कोऑर्डिनेटर बसवराजू ने बताया कि सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट मार्च में खत्म हो गया था और राज्य स्तर पर नया टेंडर निकाला गया था.

उन्होंने कहा, “उम्मीद है कि नया टेंडर जल्द ही फ़ाइनल हो जाएगा और हमें उम्मीद है कि अगले महीने से लाभार्थियों को फ़ूड किट मिलनी शुरू हो जाएगी.”

कर्नाटक SC/ST और सेमी-नोमैडिक ट्राइब्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन की चेयरपर्सन जी. पल्लवी ने कहा कि राज्य में राजनीतिक घटनाक्रमों के कारण पिछले चार महीनों से न्यूट्रिशनल फ़ूड किट नहीं बांटी गई हैं.

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने संबंधित अधिकारियों को टेंडर प्रक्रिया में तेज़ी लाने और यह पक्का करने का निर्देश दिया है कि पात्र परिवारों को जल्द से जल्द फ़ूड किट बांटी जाएं. उम्मीद है कि लाभार्थियों को जल्द ही किट मिल जाएगी.

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