कोलम आदिवासियों के अस्तित्व पर ख़तरा, बांस की कमी से आजीविका पर गहरा असर

यह कहानी भले ही कोलम आदिवासियों के बारे में हो, लेकिन अपने अस्तित्व के लिए जंगलों पर निर्भर करने वाले अधिकांश समुदायों का हाल यही है. राज्य के चेंचू और कोंडा रेड्डी आदिवासी समूह भी विलुप्त होने के कगार पर हैं.

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तेलंगाना ने आदिलाबाद जिले में रहने वाले कोलम आदिवासी एक ख़ास पौधे – बांस – के बढ़ते रोपण की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि बांस कीघटती फ़सल की वजह से उनकी आजीविका, धार्मिक प्रथाओं और खाने की आदतों पर ख़तरा मंडरा रहा है.

कोलम आदिवासियों, जिन्हें विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानि पीवीटीजी के रूप में पहचाल मिली है, के जीवन का बांस के पौधे से गहरा रिश्ता है. वे अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों में बांस का भरपूर इस्तेमाल करते हैं, इसके अंकुरित अनाज का सेवन करते हैं और इससे बने उत्पादों को बेचकर आजीविका कमाते हैं.

लेकिन अब कोलम समुदाय के सदस्य बांस के बागानों में कमी, और रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ों के उत्पादन के लिए उपयोगी बांस की कमी की वजह से अपने अस्तित्व को लेकर ही चिंतित हैं.

समुदाय के लोगों का कहना है कि कीड़ों के हमलों के चलते अधिकांश बांस के पेड़ मर गए थे, और जिले में टोकरी और चटाई जैसी चीज़ों के उत्पादन के लिए ज्यादा बांस अब नहीं बचा है.

कोलम आदिवासियों द्वारा बनाई जाने वाली बांस की चटाई आमतौर पर 300-400 रुपये में बिकती है, जबकि स्थानीय बाजारों में एक टोकरी की कीमत 100 रुपये तक है. यही इन आदिवासियों की आजीविका का मुख्य साधन है.

वो यह भी कहते हैं कि बिचौलिए उनका सामान कस्बों और शहरों में ऊंचे दामों पर बेचने के लिए खरीद लेते हैं, और भारी मुनाफा कमाते हैं.

अब बांस के पौधों की कमी से उनके अलावा कई दूसरे समूहों की आजीविका पर असर पड़ने की संभावना है.

आदिलाबाद ग्रामीण मंडल के बोरिंगुडा गांव के एक कोलम आदिवासी अतराम जंगु ने डेक्कन हेरल्ड को बताया कि फ़िलहाल समुदाय के सदस्यों को बांस खोजने के लिए हर दिन सात से 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. अपने घरों के आसपास बांस की कमी के चलते, वो फ़िलहाल सैदपुर के जंगलों से बांस मंगवाने को मजबूर हैं.

बांस लेने के लिए दूर-दराज के इलाक़ों में जाना भी इस आदिवासियों के लिए जोखिम भरा काम है, क्योंकि जंगलों में जंगली सूअर उनपर हमला कर देते हैं. ऐसे हमलों में कई कोलम आदिवासियों की जान गई है.

हालांक, वह कहते हैं कि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि समुदाय के ज़्यादातर सदस्य बेहद गरीब हैं.

इसके अलावा कुछ आदिवासियों ने ज़मीन का पट्टा रजिस्टर करवाया था, लेकिन इलाक़ें में सिंचाई सुविधाओं की कमा है. इसलिए, समुदाय के सदस्य मुख्य रूप से ऐसी फ़सलों को उगाने को मजबूर हैं जो बारिश पर निर्भर हैं, जैसे कपास, ज्वार और मक्का.

बांस के वृक्षारोपण की कमी से एक पूरी जनजाति का अस्तित्व खतरे में है. अब समुदाय ने जिला वन अधिकारियों से अपनी आजीविका को संरक्षित करने के लिए कदम उठाने की अपील की है.

कावल टाइगर रिजर्व में मौजूद प्रजातियों के बीज इकट्ठा करने का काम फ़िलहाल जारी है.

लेकिन आदिवासी कहते हैं कि अधिकारियों को इस प्रक्रिया के दौरान साथ ही बांस के बीजों को संरक्षित कर जंगलों में ही बो देना चाहिए, क्योंकि बांस के पेड़ बाघों जैसे बड़े जंगली जानवरों के लिए आराम स्थल माने जाते हैं. इससे जंगली जानवरों के आवास को बेहतर बनाने में भी मदद मिल सकती है.

इन आदिवासियों ने सरकार से अपने समुदाय के बारे में जागरुकता बढ़ाने और अपनी आजीविका में सुधार करने के लिए बांस से बने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाने की भी गुज़ारिश की है.

यह कहानी भले ही कोलम आदिवासियों के बारे में हो, लेकिन अपने अस्तित्व के लिए जंगलों पर निर्भर करने वाले अधिकांश समुदायों का हाल यही है. राज्य के चेंचू और कोंडा रेड्डी आदिवासी समूह भी विलुप्त होने के कगार पर हैं. इन दोनों समुदायों की आबादी पिछले 50 सालों में काफी कम हो गई है.

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