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मणिपुर में कुकी समुदायों ने अपने विधायकों को गद्दार बताया

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मणिपुर में कुकी-जो समुदाय के भीतर एक बार फिर राजनीतिक असंतोष गहराता दिख रहा है. समुदाय के तीन निर्वाचित विधायक नेमचा किपजेन, एल.एम. खौटे और एन. सनाटे के राज्य सरकार में शामिल होने के बाद पहाड़ी इलाकों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं. 

कुकी-बहुल जिलों, खासकर चुराचंदपुर, कांगपोख्पी और तेंग्नूपाल में बंद और प्रदर्शन की खबरें सामने आई हैं. स्थानीय संगठनों का आरोप है कि जिन विधायकों को समुदाय ने अपने अधिकारों और संघर्ष की आवाज़ मानकर चुना था, उन्होंने सरकार में शामिल होकर उस भरोसे को तोड़ दिया है.

कुकी-जो समुदाय का कहना है कि मौजूदा हालात में सरकार का हिस्सा बनना सामूहिक फैसलों के खिलाफ है. 

समुदाय के छात्र संगठनों, महिला संगठनों और नागरिक मंचों ने पहले ही यह तय किया था कि जब तक सुरक्षा, न्याय, पुनर्वास और अलग प्रशासन जैसी मांगों पर ठोस राजनीतिक आश्वासन नहीं मिलता, तब तक सरकार में भागीदारी नहीं की जानी चाहिए. इसके बावजूद तीनों विधायकों का मंत्रिमंडल में शामिल होना समुदाय को स्वीकार नहीं है.

नाराज़गी के चलते कई इलाकों में 24 घंटे का बंद बुलाया गया. सड़कों पर प्रदर्शनकारियों ने नारेबाज़ी की और विधायकों के पुतले जलाए. कुछ स्थानों पर सुरक्षा बलों के साथ झड़प की खबरें भी सामने आईं. महिला संगठनों और नागरिक मंचों ने इन विधायकों के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा की है. संगठनों का कहना है कि यह केवल राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि समुदाय के आत्मसम्मान और लंबे संघर्ष से जुड़ा मुद्दा है.

विरोध कर रहे संगठनों का कहना है कि मणिपुर में जारी जातीय संघर्ष के दौरान कुकी-जो समुदाय ने भारी नुकसान झेला है. हजारों लोग विस्थापित हुए हैं और बड़ी संख्या में परिवार अब भी राहत शिविरों में रह रहे हैं. ऐसे हालात में सरकार में शामिल होना समुदाय की पीड़ा को नज़रअंदाज़ करने जैसा है. प्रदर्शनकारियों का मानना है कि इससे उनके राजनीतिक संघर्ष को कमजोर किया गया है.

वहीं सरकार में शामिल हुए विधायक नेमचा किपजेन, एल.एम. खौटे और एन. सनाटे का तर्क है कि सत्ता में रहकर ही वे अपने लोगों की बात बेहतर ढंग से उठा सकते हैं. उनका कहना है कि बातचीत के ज़रिये ही समाधान संभव है. हालांकि समुदाय का एक बड़ा वर्ग इस दलील से संतुष्ट नहीं है और विरोध जारी है.

मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए शांति बनाए रखने की अपील की है. उन्होंने कहा है कि सरकार सभी समुदायों से संवाद के लिए तैयार है. प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए हैं. इसके बावजूद पहाड़ी जिलों में तनाव बना हुआ है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल तीन विधायकों के फैसले तक सीमित नहीं है. यह मणिपुर में लंबे समय से चले आ रहे जातीय संघर्ष, प्रतिनिधित्व के संकट और समुदायों के बीच भरोसे की कमी को उजागर करता है. विशेषज्ञों के अनुसार राज्य में स्थायी शांति के लिए ज़मीनी मुद्दों पर ठोस और भरोसेमंद राजनीतिक समाधान ज़रूरी है.



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