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आधार कार्ड के अभाव में मांकिड़िया जनजाति के 15 से अधिक बच्चे स्कूल छोड़ने को मजबूर

ओडिशा के मयूरभंज जिले के कप्टिपदा ब्लॉक (Kaptipada block) के दमासाही गांव (Damasahi village) में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) में शामिल मांकिड़िया जनजाति (Mankidia tribal community) के 15 से अधिक बच्चों को कथित तौर पर स्कूल छोड़ना पड़ा है.

इसकी प्रमुख वजह आधार कार्ड का न होना बताया जा रहा है, जिसके कारण बच्चों की शिक्षा और उससे जुड़ी सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं.

मांकिड़िया जनजाति के बाया मांकिड़िया (Baya Mankidia) ने वर्ष 2010 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर अपने समुदाय के पहले मैट्रिक पास व्यक्ति बनने का गौरव हासिल किया था. उनकी इस उपलब्धि से गांव के लोगों में उम्मीद जगी थी कि अब समुदाय के अन्य बच्चे भी औपचारिक शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे.

लेकिन 16 वर्ष बाद भी गांव में शिक्षा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. विडंबना यह है कि बाया मांकिड़िया के अपने बेटे और बेटी भी उन बच्चों में शामिल हैं, जिन्होंने कथित तौर पर पढ़ाई छोड़ दी है.

दमासाही गांव में मांकिड़िया जनजाति के 35 से अधिक परिवार रहते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक, 15 से अधिक बच्चे अलग-अलग कक्षाओं में पढ़ाई छोड़ चुके हैं. कुछ बच्चों ने पांचवीं कक्षा के बाद स्कूल जाना बंद कर दिया, जबकि कुछ ने नौवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी.

आधार कार्ड के अभाव में छात्रवृत्ति और बैंकिंग सुविधाओं से वंचित बच्चे

परिवारों का कहना है कि बच्चों के आधार कार्ड नहीं होने के कारण बैंक खाते खुलवाने, छात्रवृत्ति प्राप्त करने और अन्य शैक्षणिक आर्थिक सहायता हासिल करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.

ग्रामीणों के अनुसार, आधार कार्ड बनवाने के लिए कई बार आवेदन देने और अधिकारियों से अनुरोध करने के बावजूद अनेक परिवारों को अब तक ये दस्तावेज नहीं मिले हैं.

इस स्थिति में बच्चे प्रशासनिक प्रक्रियाओं और शिक्षा प्राप्त करने के अपने अधिकार के बीच फंसकर रह गए हैं. जरूरी दस्तावेजों के अभाव में उनकी पढ़ाई बाधित हो रही है और कुछ बच्चों को आजीविका के लिए काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. 

पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर बच्चे

शिक्षा से वंचित होने का असर अब बच्चों के जीवन और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी दिखाई देने लगा है.

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ बच्चे दूसरे राज्यों में जाकर झींगा प्रसंस्करण कारखानों में काम करने लगे हैं. वहीं, गांव में रहने वाले कुछ बच्चे बकरियां चराते हैं, पत्तों से दोना-पत्तल बनाते हैं या परिवार की आय बढ़ाने के लिए दिहाड़ी मजदूरी करते हैं.

इस तरह जिन बच्चों को स्कूल में पढ़कर अपना भविष्य संवारना चाहिए, वे परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए श्रम करने में लगे हुए हैं.

आंगनवाड़ी केंद्र में भी बच्चों की उपस्थिति कम

समस्या केवल स्कूल जाने वाले बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और देखभाल भी प्रभावित हो रही है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार, गांव के आंगनवाड़ी केंद्र में केवल लगभग पांच से सात बच्चे ही आते हैं, जबकि दस से अधिक बच्चों ने वहां आना बंद कर दिया है.

यह स्थिति समुदाय के छोटे बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा और आंगनवाड़ी सेवाओं तक पहुंच को लेकर भी चिंता पैदा करती है.

प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग

बाया मांकिड़िया ने इस स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए आरोप लगाया कि प्रशासनिक बाधाओं के कारण जनजातीय बच्चों को शिक्षा के अवसरों से वंचित होना पड़ रहा है.

बच्चों के माता-पिता और समुदाय के अन्य सदस्यों ने संबंधित अधिकारियों से तत्काल हस्तक्षेप करने तथा आधार कार्ड से जुड़ी समस्याओं का समाधान करने की अपील की है.

गांव की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नीरू मांकिड़िया ने भी परिवारों के सामने आ रही कठिनाइयों को रेखांकित किया है.

इस मामले पर एकीकृत जनजातीय विकास एजेंसी (ITDA), उदाला के परियोजना प्रशासक आशीष कुमार महापात्र ने आश्वासन दिया है कि आधार कार्ड से संबंधित समस्याओं का समाधान 15 दिनों के भीतर कर दिया जाएगा.

इस आश्वासन से प्रभावित परिवारों को उम्मीद बंधी है कि बच्चों के आवश्यक दस्तावेज तैयार होंगे और वे दोबारा अपनी पढ़ाई शुरू कर सकेंगे. हालांकि, इसके लिए समय पर कार्रवाई करना और बच्चों की स्कूल वापसी सुनिश्चित करना जरूरी होगा.

मांकिडिया जनजाति के बच्चों की यह स्थिति बताती है कि दस्तावेजों की कमी किस तरह शिक्षा तक पहुंच में बड़ी बाधा बन सकती है. वर्ष 2010 में बाया मांकिड़िया की ऐतिहासिक शैक्षणिक उपलब्धि ने समुदाय में शिक्षा के प्रति नई उम्मीद जगाई थी लेकिन आज उसी गांव के बच्चे पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हैं.

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