टिपरा मोथा पार्टी (Tipra Motha Party) के संस्थापक और चेयरमैन प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मा (Pradyot Bikram Manikya Debbarma) ने सोमवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) त्रिपुरा के आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के इच्छुक हैं.
पूर्व शाही वंशज देबबर्मा के नेतृत्व वाली आदिवासी आधारित टिपरा मोथा मार्च 2024 से सत्ताधारी बीजेपी की पार्टनर है.
लंबे समय तक बातचीत के बाद तब विपक्ष में रही टिपरा मोथा ने 2 मार्च, 2024 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में केंद्र और त्रिपुरा सरकार के साथ एक त्रिपक्षीय समझौता किया था.
इसके बाद 13 विधायकों वाली इस पार्टी ने पिछले साल 7 मार्च को बीजेपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार में शामिल होकर राज्य की राजनीतिक गतिशीलता में एक नया आयाम जोड़ा.
टिपरा मोथा पार्टी के दो विधायकों – अनीमेश देबबर्मा और बृषाकेतु देबबर्मा को मुख्यमंत्री माणिक साहा के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में शामिल किया गया.
मीडिया से बात करते हुए देबबर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री ने त्रिपक्षीय समझौते को अपना आशीर्वाद दिया है और भरोसा जताया है कि केंद्रीय गृह मंत्री त्रिपुरा में आदिवासी आबादी के चौतरफा सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए इसे लागू करवाएं.
TMP सुप्रीमो ने कहा, “राज्य के BJP नेता समझौते, आदिवासियों या टिपरा मोथा पार्टी के बारे में क्या कह रहे हैं. इससे हमें कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि केंद्रीय बीजेपी नेतृत्व समझौते को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है.”
देबबर्मा ने दोहराया कि टिपरा मोथा का एकमात्र मकसद आदिवासी समुदायों का विकास और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना है.
देबबर्मा ने मार्च में होने वाले त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज़ ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) चुनावों में अपनी पार्टी की संभावनाओं पर भरोसा जताया.
उन्होंने कहा, “हमें ADC चुनाव जीतने का 110 प्रतिशत यकीन है. मैं पिछले पांच सालों से लगातार तिपरासा लोगों के लिए काम कर रहा हूं.”
वहीं 1982 में संविधान की छठी अनुसूची के तहत TTAADC के गठन को याद करते हुए देबबर्मा ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अगरतला में कुछ कांग्रेस नेताओं के विरोध के बावजूद आदिवासी क्षेत्रों को विशेष दर्जा देने का समर्थन किया था.
उन्होंने कहा, “आखिरकार इंदिरा गांधी ने राज्य नेतृत्व की बात नहीं मानी और त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्रों को छठी अनुसूची में शामिल करना सुनिश्चित किया. TTAADC का गठन 15 जनवरी, 1982 को हुआ था.”
अपने राजनीतिक रुख पर ज़ोर देते हुए देबबर्मा ने साफ किया कि टिपरा मोथा पार्टी किसी भी समुदाय के खिलाफ नहीं है.
उन्होंने कहा, “हम किसी के खिलाफ नहीं हैं. हमारा एकमात्र मकसद तिपरासा लोगों के अधिकारों को सुरक्षित करना है. मैं भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीति में आया हूं.”
मुख्यमंत्री माणिक साहा पर निशाना साधते हुएदेबबर्मा ने उन टिप्पणियों का भी जवाब दिया जिसमें क्षेत्रीय पार्टी से BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन में “छोटे भाई” जैसा व्यवहार करने का आग्रह किया गया था.
उन्होंने कहा, “मेरा कोई बड़ा भाई नहीं है, सिर्फ एक बड़ी बहन है. राजनीति में कोई बड़ा भाई या छोटा भाई नहीं होता – सब बराबर होते हैं.”
मुख्यमंत्री ने यह टिप्पणी 23 दिसंबर को खोवाई जिले के बैजलबाड़ी में एक पार्टी कार्यक्रम के दौरान की थी, जब BJP कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों के बाद बीजेपी और टिपरा मोथा के बीच तनाव बढ़ गया था.
TTAADC चुनाव नज़दीक आने के साथ देबबर्मा की टिप्पणियां सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर बढ़ते राजनीतिक उथल-पुथल को रेखांकित करती हैं और त्रिपुरा में तिपरासा समझौते और मूल निवासी अधिकारों के भविष्य पर ध्यान केंद्रित करती हैं.
त्रिपुरा ट्राइबल एरियाज़ ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (TTAADC) के अहम चुनावों से पहले बीजेपी और टिपरा मोथा के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं.
पिछले कुछ महीनों में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प, हमले और जवाबी हमले की कई घटनाएं सामने आई हैं.
2021 से टिपरा मोथा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 30-सदस्यीय TTAADC पर शासन कर रही है. जो त्रिपुरा के 10,491 वर्ग किमी भौगोलिक क्षेत्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को कवर करता है और 12.16 लाख से ज़्यादा लोगों का घर है, जिनमें से करीब 84 प्रतिशत मूल निवासी समुदायों के हैं.
TTAADC चुनावों से पहले सत्ताधारी BJP, उसके सहयोगी TMP और इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा (IPFT) और विपक्षी CPI(M) और कांग्रेस सहित सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने आदिवासियों के बीच समर्थन मज़बूत करने के प्रयास तेज़ कर दिए हैं, जो त्रिपुरा की लगभग 4.2 मिलियन की कुल आबादी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हैं.
TTAADC चुनाव मार्च में होने वाले हैं.
त्रिपुरा में लगभग 40 लाख की कुल आबादी में से लगभग 15 लाख आदिवासी लोग रहते हैं. जो 40 से ज़्यादा जनजातियों और उप-जनजातियों से संबंधित हैं, जिससे राज्य में आदिवासी अधिकार एक केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बन गया है.

