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तेलंगाना में आदिवासियों की मांग: पहले मुआवज़ा तय हो, फिर करेंगे ज़मीन खाली

तेलंगाना में सीतम्मा सागर परियोजना से विस्थापित होने वाले आदिवासियों ने मुआवज़ा तय न होने तक विरोध प्रदर्शन करते रहने का फ़ैसला किया है. यह आदिवासी तेलंगाना के भद्राद्री-कोठागुडम ज़िले के अश्वपुरम, चारला, मनुगुरु और डुम्मुगुडेम मंडल में रहते हैं.

सीतम्मा सागर परियोजना की घोषणा के बाद से ही यहां के आदिवासी विस्थापन को लेकर चिंतित हैं. परियोजना के लिए अधिग्रहित की जाने वाली भूमि अनुसूचित या एजेंसी क्षेत्रों में है, जहां बाज़ार मूल्य कम है.

ऐसे में अधिकारियों का 6 लाख रुपये प्रति एकड़ का ऑफ़र इन आदिवासियों को मंज़ूर नहीं है. यहां के ज़्यादातर किसानों के पास एक-दो एकड़ भूमि ही है, और इस रेट पर भूमि अधिग्रहण से उनके अस्तित्व को ही ख़तरा है. किसान प्रति एकड़ 25 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं.

सीतम्मा सागर परियोजना की घोषणा जनवरी में की गई थी, और इसे पूरा करने के लिए सितंबर 2022 की समय सीमा तय की गई है. इसके लिए क़रीब 3,200 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाना है.

इलाक़े के लोग, जिनमें कई आदिवासी शामिल हैं, मूल रूप से परियोजना के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन उनका कहना है कि ज़बर्दस्ती अपनी ज़मीन से बेदखली और कम मुआवज़े की पेशकश उन्हें मंज़ूर नहीं है.

परियोजना से कई गांव पानी में डूब जाएंगे. अधिकारियों पर आरोप यह भी है कि उन्होंने प्रभावित लोगों को यह नहीं बताया है कि उन्हें कहां स्थानांतरित किया जाएगा.

परियोजना के तहत गोदावरी नदी पर सीतम्मा सागर बैराज का निर्माण भद्राद्रि-कोठगुडम ज़िले के अश्वपुरम मंडल में किया जाएगा. इसके अलावा चारला और मनुगुरु मंडल में दो और बांध बनाने की योजना है.

जब भी अधिकारी परियोजना और भूमि अधिग्रहण के लिए सर्वेक्षण के इरादे से इन इलाक़ों में पहुंचते हैं, उनका विरोध किया जाता है. इसके अलावा ग्राम सभाओं में भी किसानों ने परियोजना और मुआवज़े का विवरण नहीं देने के लिए राजस्व विभाग के अधिकारियों से पूछताछ की है.

परियोजना प्रभावित परिवारों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर सहमति नहीं बनेगी, तब तक उनका आंदोलन चलता रहेगा. और यह भी स्पष्ट है कि वे मुआवज़े को अंतिम रूप देने से पहले यह लोग अपनी ज़मीन खाली नहीं करेंगे.

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