Site icon Mainbhibharat

जवाधु पहाड़ियों में आदिवासियों को अवैध खेती की अनुमति देने वाले 6 वन अधिकारी सस्पेंड

तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले की जवाधु पहाड़ियों में आदिवासियों को वन भूमि के 1000 एकड़ से अधिक क्षेत्र में अवैध रूप से खेती करने की अनुमति देने के आरोप में 6 वन अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है.

आरोप है कि इन अधिकारियों ने निर्धारित क्षेत्रों से बाहर खेती करने की अनुमति देने के बदले आदिवासी किसानों से कथित तौर पर पैसे लिए.

‘द हिंदू’   कि रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने यह आश्वासन भी दिया कि ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी अधिनियम, 2006’ (जिसे ‘वन अधिकार अधिनियम’ या FRA, 2006 भी कहा जाता है) के तहत उन्हें पहाड़ियों में खेती के लिए बढ़ाई गई ज़मीन के मालिकाना हक (टाइटल डीड) दिए जाएंगे.

सस्पेंड किए गए अधिकारियों में एस. प्रभु (वन रेंज अधिकारी, इको-टूरिज्म रेंज), के. सेनगुट्टुवन (वन रेंज अधिकारी, नादानूर), एफ. अरुणागिरी (फॉरेस्टर, नादानूर रेंज), के. सुब्रमणि (फॉरेस्टर, नादानूर रेंज), एस. मुथु (वन रक्षक, जमुनामारथूर रेंज) और आर. सुरेश (वन रेंजर, चेन्नई नदियां बहाली ट्रस्ट – डेप्युटेशन पर) शामिल हैं.

एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने बताया, “सस्पेंड किए गए अधिकारियों ने आदिवासियों को पिछले तीन सालों से पहाड़ियों में वन भूमि के एक बड़े हिस्से पर खेती का दायरा बढ़ाने की इजाज़त दी थी, जबकि उन्हें केवल तय इलाकों में ही खेती करने की अनुमति थी. इस तरीके को ‘तेज़ खेती’ (accelerated cultivation) कहा जा सकता है.”

सस्पेंड किए गए अधिकारियों ने आदिवासियों से यह वादा भी किया था कि वन रिकॉर्ड में उनके नाम ‘पारंपरिक किसान’ के तौर पर जोड़े जाएंगे ताकि वे खेती के लिए बढ़ाई गई ज़मीन के मालिकाना हक पाने के योग्य हो सकें. यह विस्तार पहाड़ियों में मेलपट्टू, जमुनामारथूर और नादानूर वन रेंज में हुआ था. इन पहाड़ियों में कम से कम 150 आदिवासी बस्तियां हैं.

ज़िला वन अधिकारी (DFO) के कार्यालय की शुरुआती जांच में पाया गया कि औसतन, हर किसान ने गैर-वन क्षेत्रों में खेती करने की इजाज़त पाने के लिए सस्पेंड किए गए वन कर्मचारियों को हर महीने 3,000 से 5,000 दिए होंगे.

यह भुगतान उसी दौरान गैर-कानूनी रूप से खेती की जा रही वन भूमि के मालिकाना हक पाने के लिए भी किया गया था.

जांच में पाया गया कि इसमें लगभग 600-700 आदिवासी शामिल हो सकते हैं.

एक वन अधिकारी ने कहा, “छत्तीसगढ़ और बिहार की आदिम जनजातियों के विपरीत, जवादु पहाड़ियों की मायालाली जनजातियां सामाजिक और आर्थिक रूप से विकसित समूह हैं. हालांकि, उन्हें इस कानून के प्रावधानों की अच्छी जानकारी नहीं रही होगी और वे वन कर्मचारियों के भरोसे में आ गए होंगे.”

वन अधिकार अधिनियम का क्या प्रावधान है?

वन अधिकारियों के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत वे आदिवासी व्यक्तिगत भूमि अधिकार/स्वामित्व दस्तावेज प्राप्त करने के पात्र हैं, जो 31 दिसंबर 2005 से पहले से वन भूमि पर खेती करते आ रहे थे.

ऐसे प्रत्येक लाभार्थी को उस क्षेत्र के लिए भूमि अधिकार दिया जा सकता है, जिसकी वह व्यक्ति पीढ़ियों से खेती करता रहा हो. इसकी सीमा कम से कम आधा एकड़ और अधिकतम 2.5 एकड़ तक हो सकती है.

हालांकि, यह अधिकार केवल निर्धारित वन क्षेत्र में खेती करने तक सीमित होता है. लाभार्थी उस भूमि को बेच नहीं सकता, न ही उसे गिरवी रख सकता है या किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित कर सकता है.

लाभार्थी की मृत्यु के बाद भूमि वन विभाग के पास वापस चली जाती है.

पारंपरिक खेती करने वालों द्वारा ऐसी भूमि अधिकारों के लिए किए गए दावों का मूल्यांकन गांव, रेंज और जिला स्तर पर FRA समिति द्वारा किया जाता है. जिसमें जिला कलेक्टर समिति के अध्यक्ष और DFO इसके सदस्य-सचिव के रूप में कार्य करेंगे. समिति में आदिवासी प्रतिनिधियों के रूप में गांव के बुजुर्ग भी शामिल होते हैं.

ज्यादातर दावे पात्रता पूरी नहीं करते थे

जवाधु पहाड़ियों में ज्यादातर आदिवासी कानून लागू होने के बाद वन भूमि पर खेती कर रहे हैं, इसलिए वे इसके लिए पात्र नहीं हैं.

एक वन अधिकारी ने कहा, “पहले हमने पहाड़ियों में आदिवासियों से कानून के तहत भूमि अधिकार पत्र प्राप्त करने के लिए 100 से अधिक आवेदन खारिज कर दिए थे क्योंकि वे कानून से पहले पारंपरिक खेती करने वाले नहीं थे. हालांकि, निलंबित कर्मचारियों ने कानून के तहत तथ्यों को छिपाया.”

वरिष्ठ वन अधिकारियों का कहना है कि जिला स्तर के अधिकारियों द्वारा दूरदराज के वन क्षेत्रों में नियमित गश्त और निगरानी की जाती तो इस तरह की गतिविधियों को रोका जा सकता था.

जांच में यह भी पाया गया कि निलंबित कर्मचारियों ने वन अधिकार अधिनियम के इन प्रावधानों से संबंधित तथ्यों को छिपाया और आदिवासियों को भूमि अधिकार मिलने का भरोसा दिलाया.

जांच में अधिकारियों की भूमिका, कथित अवैध भुगतान, वन अभिलेखों में की गई गलत प्रविष्टियों और बड़ी संख्या में आदिवासियों को कथित तौर पर दिए गए आश्वासनों की जांच की जा रही है.

मामले में आगे की जांच जारी है.

Exit mobile version