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ओडिशा: आख़िर क्यों आदिवासी शख्स अपनी बहन के कंकाल को लेकर बैंक पहुंचा

ओडिशा के क्योंझर जिले (Keonjhar district) से एक बेहद चौंकाने वाली घटना सामने आई, जहां एक आदिवासी शख्स ने अपनी मृत बहन के कंकाल (Skeleton) को बैंक तक ले जाकर उसकी मौत का सबूत देने की कोशिश की.

यह शख्स अपनी मृत बहन का कंकाल लेकर बैंक इसलिए पहुंचा ताकि उसके नाम पर जमा 19 हज़ार रुपये निकाल सके.

लेकिन बैंक ने उससे मृत्यु प्रमाण पत्र और कानूनी उत्तराधिकारी (legal heir) से जुड़े दस्तावेज मांगे. दस्तावेजों की कमी और प्रक्रिया की जानकारी न होने के कारण वह बार-बार बैंक के चक्कर लगाता रहा लेकिन उसे पैसे नहीं मिल पाए.

हताश होकर उसने अपनी बहन के दफनाए गए अवशेष निकालकर बैंक पहुंचकर दिखाए, जिससे वहां अफरा-तफरी मच गई और पुलिस को बुलाना पड़ा.

घटना के सामने आने और विवाद बढ़ने के बाद जिला प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ. अधिकारियों ने मृतिका का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी किया, कानूनी प्रक्रिया पूरी कराने में मदद की. साथ ही संबंधित व्यक्ति को बैंक से पैसे निकालने में सहायता दी. इसके बाद वह शख्स मंगलवार (28 अप्रैल, 2026) को अपनी बहन के खाते से जमा राशि निकाल सका.

क्या है पूरा मामला?

यह घटना क्योंझर ज़िले के पटना ब्लॉक में स्थित ओडिशा ग्रामीण बैंक की मालीपोसी शाखा में हुई. शख्स की पहचान दियानाली गांव के जीतू मुंडा (50) के रूप में हुई.

वह अपनी बड़ी बहन, कालरा मुंडा (56) के बैंक खाते से 19,300 रुपये निकालना चाह रहा था. कालरा मुंडा का निधन 26 जनवरी, 2026 को हो गया था.

बैंक अधिकारियों ने जब उनसे किसी मृत व्यक्ति के खाते से पैसे निकालने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ मांगे, तो बैंकिंग प्रक्रियाओं से अनजान जीतू मुंडा ने अपनी बहन की कब्र खोदी, कंकाल बाहर निकाला और लगभग 2.5 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंचे.

जीतू मुंडा ने मीडिया को बताया, “मैं कई बार बैंक के चक्कर लगा चुका हूं और वहां के लोगों ने मुझसे कहा कि उसके नाम पर जमा पैसे निकालने के लिए मैं खाताधारक को साथ लेकर आऊं. हालांकि मैंने उन्हें बताया कि उसकी मृत्यु हो चुकी है फिर भी उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी और उसे बैंक लाने की ज़िद्द करते रहे. इसलिए हताश होकर मैंने उसकी कब्र खोदी और उसकी मृत्यु के प्रमाण के तौर पर उसका कंकाल बाहर निकाल लाया.”

पटना पुलिस थाने के इंस्पेक्टर-इन-चार्ज (IIC) किरण प्रसाद साहू, जो सूचना मिलने पर बैंक पहुंचे थे.

उन्होंने कहा, “जीतू एक अनपढ़ आदिवासी शख्स है. उसे यह नहीं पता कि ‘कानूनी वारिस’ या ‘नॉमिनी’ क्या होता है. बैंक अधिकारी उसे किसी मृत व्यक्ति के खाते से पैसे निकालने की प्रक्रिया समझाने में नाकाम रहे हैं.”

इस घटना के बाद पुलिस ने जीतू मुंडा को भरोसा दिलाया कि वे उनकी मृत बहन के बैंक खाते से पैसे निकालने में उनकी मदद करेंगे. बाद में पुलिस की मौजूदगी में कंकाल को दोबारा कब्रिस्तान में दफना दिया गया.

इस बीच, स्थानीय ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) मानस दंडपत ने कहा कि स्वर्गीय कालरा मुंडा के कानूनी वारिस के तौर पर किसी ने भी उनसे संपर्क नहीं किया था.

BDO ने कहा, “मुझे आज ही इस बारे में पता चला. हम देखेंगे कि इस मामले को सुलझाने के लिए क्या किया जा सकता है.”

इस बीच, बैंक सूत्रों ने बताया कि कालरा मुंडा के बैंक खाते में जो नॉमिनी था, उसकी भी मौत हो चुकी थी.

बैंक ने कहा, “ऐसा लगता है कि यह घटना पैसे के निपटारे की प्रक्रिया के बारे में जानकारी की कमी और उस व्यक्ति की ब्रांच मैनेजर द्वारा समझाई गई प्रक्रियाओं को मानने की अनिच्छा के कारण हुई. बैंक का मकसद उस गरीब आदिवासी महिला के खाते में जमा पैसों को सुरक्षित रखना था. इसमें किसी भी तरह की कोई ज़्यादती या उत्पीड़न का मामला नहीं है.”

स्थानीय प्रशासन ने बैंक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे ज़रूरी इंतज़ाम करें और यह सुनिश्चित करें कि जीतू मुंडा, जो नियमों के मुताबिक एकमात्र दावेदार हैं, उन्हें जल्द से जल्द पैसे मिल जाएं.

इस घटना ने कई गंभीर मुद्दों को उजागर किया है और वो है ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में दस्तावेज़ी प्रक्रिया की कमी, बैंकिंग सिस्टम में संवेदनशीलता की कमी, गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए जटिल नियमों की समस्या.

कुल मिलाकर यह घटना न सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी है बल्कि यह दिखाती है कि कैसे जटिल प्रशासनिक और बैंकिंग प्रक्रियाएं गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए बड़ी बाधा बन जाती हैं.

इस सबके बाद राज्य सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि इसमें मानवीय दृष्टिकोण की कमी रही और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाएगी.

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