मानसून में नालों और छोटी नदियों में पानी भरने से सड़कें बंद हो जाती हैं, जिससे दूर-दराज के गांवों में रहने वाले आदिवासी अलग-थलग पड़ जाते हैं.
ऐसी ही परेशानियों का सामना कर रहे है तेलंगाना के आदिलाबाद ज़िले के आदिवासी. मानसून के दौरान नालों और छोटी नदियों के उफान पर आने से दूरदराज़ के कई आदिवासी गांवों का संपर्क बाहरी दुनिया से कट गया है
भारी बारिश के कारण बेज्जूर मंडल के कुश्नेपल्ली और सोमिनी गांवों के स्थानीय नाले पर बना पुल पानी में डूब गया, जिससे ग्रामीणों का आवागमन पूरी तरह बाधित हो गया.
ग्रामीणों का कहना है कि चिकित्सा आपात स्थिति में उन्हें अपनी जान जोखिम में डालकर
यहां के आदिवासियों का कहना है कि मेडिकल इमरजेंसी के समय अपनी जान जोखिम में डालकर तेज बहाव वाले नालों को पैदल पार करना पड़ता है.
इसी तरह, पेंचिकलपेट मंडल के कम्मरागांव, जिलेडा और मोरलीगुड़ा गांवों सहित चिंतलामानेपल्ली, सिरपुर (टी), दहेगांव और कागजनगर मंडलों के अनेक गांव भी हर वर्ष मानसून में सड़कों के टूटने और पुलियों के जलमग्न होने के कारण गंभीर समस्याओं का सामना करते हैं.
ग्रामीणों ने प्रशासन से इस समस्या का स्थायी समाधान करने की मांग की है.
सड़क एवं भवन (Roads & Buildings) विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अकेले आदिलाबाद जिले में 26 सड़कें और 41 पुलियां बारिश के दौरान अत्यधिक संवेदनशील चिन्हित की गई हैं. इनकी मरम्मत के लिए सरकार से 85 लाख रुपये की मांग करते हुए प्रस्ताव भेजा गया है.
अधिकारियों ने यह भी बताया कि यातायात शीघ्र बहाल करने के लिए बजरी, मिट्टी तथा अर्थ-मूवर जैसी आवश्यक मशीनरी पहले से तैयार रखी गई है.
मंचेरियल जिले में भी 13 सड़कें संवेदनशील श्रेणी में रखी गई हैं. अधिकारियों का कहना है कि बारिश से क्षतिग्रस्त होने पर उनकी तत्काल मरम्मत की जाएगी. इसके लिए भी उच्च अधिकारियों को धनराशि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भेजा गया है. उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष भारी वर्षा से क्षतिग्रस्त अधिकांश सड़कों की मरम्मत पहले ही कर दी गई थी.
इसी तरह निर्मल जिले में 9 सड़कें बारिश के दौरान क्षति की आशंका वाली मानी गई हैं.
भैंसा–पेद्दारपाड़ी, टाकली–दोडापुर, अरली–मुधोल, दौलताबाद–खरबाला, भैंसा–पालसी, कल्लूर, डाउनेली, जेवला, सोनारी, नरसापुर–सोअन तथा ईदगांव–कौतला मार्ग विशेष रूप से संवेदनशील बताए गए हैं.
हालांकि, साल 2025 में क्षतिग्रस्त सड़कों की मरम्मत करने वाली एजेंसियां भुगतान में देरी से नाराज़ हैं. उनका कहना है कि उन्हें अपने बिलों के भुगतान के लिए लगातार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं.
(Representative image)

