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क्यों केरल का आदिवासी समुदाय जंगली जानवरों के हमलों का खामियाजा भुगत रहा है

सदियों से केरल में आदिवासी समुदाय प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रह रहा है. साथ ही जंगल को बचा रहा है और जंगली जानवरों के साथ जगह साझा कर रहा है.

हालांकि, हाल के सालों में जंगली जानवरों के हमलों के कारण आदिवासी लोगों की मौतें बढ़ी हैं और इनमें से ज़्यादातर घटनाएं जंगल के अंदर होती हैं.

केरल इंडिपेंडेंट फार्मर्स एसोसिएशन (KIFA) द्वारा जारी डेटा के मुताबिक, साल 2025 (जनवरी – दिसंबर) में हाथियों के हमलों में 34 लोगों की मौत हुई है और इनमें से 19 पीड़ित आदिवासी समुदाय के सदस्य हैं.

इसी दौरान राज्य में बाघों के हमलों में चार लोगों की मौत हुई और तीन पीड़ित आदिवासी समुदाय के थे.

वन विभाग इंसानों और जंगली जानवरों के बीच बढ़तेटकराव को कम करने के लिए आदिवासी समुदाय के पारंपरिक ज्ञान को फिर से ज़िंदा करने के लिए वर्कशॉप आयोजित कर रहा है.

वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, जंगल के अंदरूनी हिस्सों में बसी बस्तियों का दौरा करने वाले वन अधिकारियों ने सदस्यों को जंगल में घूमते समय सतर्क रहने और समूह में यात्रा करने के बारे में शिक्षित करने की कोशिश की थी.

संरक्षणवादियों का आरोप है कि कई युवा जंगल से गुज़रते समय ईयरफ़ोन लगाकर संगीत सुनते हैं. वहीं कई बार शराब का सेवन करते हुए जंगल से गुजरते हैं.

वायनाड के सुल्तान बाथरी (Sulthan Bathery) में चीयंबम बस्ती के मूप्पन (आदिवासी मुखिया) बी वी बोलन ने कहा, “यह सच है कि नई पीढ़ी का प्रकृति से रिश्ता टूट गया है. हमारे पूर्वजों को पता था कि जंगल में झरने कब सूखेंगे और जंगली जानवर पानी की तलाश में किस रास्ते से जाएंगे. हमें पारंपरिक रूप से गंध और आवाज़ों से जंगली जानवरों की मौजूदगी को समझना सिखाया गया है.”

उन्होंने आगे कहा, “पुरानी पीढ़ी को पता था कि जंगली जानवर सुबह और दोपहर में किस इलाके में घूमेंगे. इसलिए हम ऐसी जगहों से जाने से बचते थे. हाल के दिनों में हाथियों के व्यवहार में बदलाव आया है. यह लोगों द्वारा हाथियों को भगाने के लिए अपनाए गए हिंसक तरीकों, जैसे आग के गोले फेंकना और गोलियां चलाना, की वजह से हुआ है. मेरे दादाजी कहते थे कि जंगल से गुज़रते समय हमें बंदरों और गिलहरियों की आवाज़ों को सुनना चाहिए. ये जंगली जानवरों की मौजूदगी के बारे में हमें अलर्ट करने वाली चेतावनी वाली आवाज़ें होती हैं.”

पर्यावरणविदों के अनुसार, आधुनिक दुनिया के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश में आदिवासी समुदाय ने अपने पारंपरिक मूल्य खो दिए हैं.

एक्टिविस्ट एम एन जयचंद्रन ने कहा, “सरकार को आदिवासी लोगों के पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देना चाहिए. साथ ही किसानों के जंगल वाले इलाकों में पलायन के कारण जो ज़मीन उन्होंने खो दी है, उसे वापस दिलाना चाहिए. आदिवासी लोग बाजरा उगाते थे और जंगली जानवरों के साथ उनका अच्छा रिश्ता था. वे पेड़ों और पहाड़ियों की पूजा करते थे. यह सरकार की पहल थी कि उन्हें बाहरी दुनिया से जोड़ा जाए, जिसने उनकी संस्कृति को नष्ट कर दिया.”

केरल फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल, साइंटिस्ट ए वी रघु ने कहा कि आदिवासी समुदाय के पास जंगली जानवरों के साथ तालमेल बिठाकर रहने के पारंपरिक तरीके थे लेकिन नई पीढ़ी अपने आस-पास के माहौल से दूर हो गई है.

उन्होंने कहा, “एक समय था जब आदिवासी समुदाय जंगल को भगवान की तरह पूजता था. लेकिन अब वे जंगल के उत्पादों पर निर्भर नहीं हैं. वे सरकार द्वारा दिए गए सब्सिडी वाले चावल पर जीते हैं और युवा लोग मज़दूरी करके गुज़ारा करते हैं. पुरानी पीढ़ी के पास अपने खेतों में आने वाले जंगली जानवरों को भगाने के पारंपरिक तरीके थे. ज़मीन पर व्यक्तिगत अधिकार मिलने के बाद लोग स्वार्थी हो गए. जंगल के किनारों पर अनानास और केले की खेती जंगली जानवरों को खेतों की ओर आकर्षित करती है जिससे टकराव बढ़ता है. आदिवासी समुदाय ने अपनी समझदारी वाली स्किल्स खो दी हैं, जो टकराव में होने वाली मौतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण है.”

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