आज 8 मार्च को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. इस दिन महिलाओं की उपलब्धियों, उनके संघर्ष और अधिकारों की बात होती है.
दुनिया भर में महिलाओं की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों को सलाम करने के लिए यह दिन तय किया गया है. इसके साथ ही महिलाओं को बराबरी के अवसर, प्रतिनिधित्व और अधिकारों के लिए जागरूकता भी इस दिन का मकसद है.
दुनिया भर में महिला सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है. महिलाओं को परिवारों और सार्वजनिक स्थानों पर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है. लेकिन यह देखा गया है कि समाज में दो समुदायों के बीच हिंसा होती है तो महिलाओं को निशाना बनाया जाता है.
भारत के संदर्भ में गुजरात के 2002 के सांप्रदायिक दंगे और 2023 में मैतई और कुकी समुदाय के बीच हुई हिंसा में महिलाओं को हैवानियत की हद तक के हमले झेलने पड़े.
मई 2023 में मणिपुर के मैतई और कुकी हिंसा में एक 18 साल की एक कुकी लड़की को हथियारबंद लोगों ने अगवा कर लिया. ये लोग इस लड़की को पहाड़ी पर ले गए और एक के बाद एक कई लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया.
इस घटना के करीब एक महीने बाद मैं कुकी बहुल क्षेत्र कांगपोकपी पहुंची थी. तब तक यह लड़की अस्पताल से अपने घर भेज दी गई थी.
दिल्ली से कांगपोकपी पहुंचने वाली मैं पहली पत्रकार थी. मैने इंफ़ाल में आगजनी और तबाही का मंज़र देखा था. मैतई और कुकी समुदाय में एक दूसरे के लिए नफ़रत और बदला लेने का पागलपन भी महसूस किया था.
लेकिन इस पागलपन में महिलाओं के साथ हुए अपराधों की कहानियों ने मुझे भीतर से हिला दिया था. इन अपराधों की शिकार महिलाओं में 18 साल की उस बच्ची से बातचीत करते हुए मैं सुन्न होती जा रही थी.
उसकी आवाज़ इतनी कमज़ोर थी कि मुझे कई बार एक ही सवाल को दोहराना पड़ रहा था. वह उस समय भी बहुत नाज़ुक और कमजोर दिख रही थी. उसके चेहरे से पता चल रहा था कि अस्पताल से उसे छुट्टी तो मिल गई है, लेकिन वह अभी भी ठीक नहीं है.
मणिपुर से लौटने के बाद कांकपोकपी और इंफ़ाल में लोगों से कई बार फ़ोन पर बात हुई. इस दौरान पता चला कि मुझसे बातचीत में मैतई-कुकी हिंसा में मणिपुर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाने वाली आशाबाला को इंफ़ाल छोड़ कर असम में जाना पड़ा.
मुझे उसकी सुरक्षा की चिंता हुई और एक अजीब सी बेबसी हर बार महसूस की थी. लेकिन उस लड़की से कभी संपर्क नहीं हो पाया.
इस साल जनवरी में उसकी मौत की खबर अख़बारों में पढ़ी. वह इस दुनिया से चली गई, बिना यह विश्वास लिए कि हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां क़ानून का राज है. उसके साथ हैवानियत करने वालों को सज़ा नहीं मिली है.
इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम अधिकार, न्याय और कार्रवाई (Rights,Justice, Action) बताई जा रही है. लेकिन मणिपुर की रेप विक्टम से लेकर गुजरात की बिलकीस बानो तक, भारत यह विश्वास नहीं दिला पाता है.

