त्रिपुरा के मुख्यमंत्री डॉ. माणिक साहा ने हाल ही में राजधानी अगरतला स्थित उज्जयंत पैलेस के समीप पारंपरिक केर पूजा में भाग लिया और इसे राज्य की आस्था और एकता का प्रतीक बताया.
उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि यह परंपरा त्रिपुरा की सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय विश्वासों की गहराई को दर्शाती है.
उन्होंने इस अवसर पर प्रदेशवासियों के कल्याण की कामना करते हुए कहा कि यह पूजा राज्य में भाईचारे और सामूहिक सौहार्द की भावना को मज़बूत करती है.
मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि यह परंपरा त्रिपुरा के पूर्ववर्ती महाराजा त्रिलोचन के समय से चली आ रही है और आज भी इसका आयोजन पूरी पारंपरिक गरिमा और अनुशासन के साथ किया जाता है.
आज यह पूजा जहां उज्जयंत पैलेस के सामने वाले क्षेत्र में होती है, लेकिन पहले पूरा महल परिसर ‘केर’ की सीमा में आता था.
क्या है केर पूजा?
त्रिपुरा की यह अनोखी पूजा ‘केर’ नामक रक्षक देवता को समर्पित होती है.
यह पूजा समाज की रक्षा, सामूहिक कल्याण और प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए की जाती है.
यह पूजा मुख्यतः यहां के मूल जनजातीय समुदायों द्वारा आयोजित की जाती है और इसे त्रिपुरा के सबसे पवित्र अनुष्ठानों में गिना जाता है.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
केर पूजा की शुरुआत त्रिपुरा के आदिवासी त्रिपुरी समुदायों की पारंपरिक आस्थाओं से हुई. ‘
केर’ शब्द स्वयं सुरक्षा या परिरक्षण से जुड़ा हुआ माना जाता है.
लोककथाओं के अनुसार, केर एक अदृश्य रक्षक शक्ति है जो बुराइयों से सामूहिक सुरक्षा प्रदान करती है.
इस पूजा को त्रिपुरा की मानिक्य वंशीय राजशाही द्वारा राज्य स्तरीय आयोजन के रूप में स्वीकार किया गया था.
पूजा का समय और अवधि
यह पूजा खारची पूजा के लगभग 14 दिन बाद आयोजित की जाती है और इसका समय पारंपरिक त्रिपुरी पंचांग के अनुसार तय होता है.
आमतौर पर यह जुलाई माह में आयोजित होती है और लगभग ढाई दिनों तक चलती है.
प्रमुख अनुष्ठान और परंपराएँ
जिस क्षेत्र में अनुष्ठान किए जाते हैं, उसके आसपास बांस के डंडों, केले के पत्तों और प्रतीकात्मक चीज़ों से एक घेरा बना दिया जाता है.
पूजा शुरू होने से लेकर पूजा खतम होने तक किसी को भी इस घेरे के अंदर या बाहर जाने की इजाज़त नहीं होती.
इस पवित्र सुरक्षा घेरे को बुरी शक्तियों से सुरक्षा का प्रतीक मानी जाती है.
केर पूजा के दौरान, तपस्या का एक अनोखा माहौल होता है. इस पूरे पूजा काल के दौरान शोर-शराब, मनोरंजन, किसी सामाजिक कार्यक्रम के साथ-साथ कुछ ज़रुरी और दैनिक गतिविधियों की भी मनाही होती है. जैसे इस पूजा के दौरान स्वादिष्ट भोजन बनाना और नाच-गाना मना होता है.
मौन और संयम का वातावरण आध्यात्मिक शुद्धता और एकाग्रता को बनाए रखने में सहायक माना जाता है.
इसके अलावा, अनुष्ठान क्षेत्र में पटाखों, शराब और मांस का उपयोग प्रतिबंधित है.
यहाँ तक कि यदि अंतिम संस्कार और जन्म भी इस दौरान होते हैं, तो उन्हें भी प्रतिबंधित क्षेत्र के बाहर शांतिपूर्वक मनाया जाता है.
ऐसा माना जाता है कि इससे आध्यात्मिक शुद्धता और एकाग्रता का माहौल बनता है जो पूजा के लिए आवश्यक है.
पहले इस पूजा में पशु बलि दी जाती थी. लोकिन अब इसकी जगह प्रतीकात्मक अर्पण जैसे चावल, फूल, धूप और स्थानीय फल आदि को महत्व दिया जाता है.
पूजा का संचालन चंताई नामक पुजारी करते हैं जो कोकबोरोक भाषा में मंत्रों का उच्चारण करते हैं.
यह पूजा केवल पुजारियों तक सीमित नहीं होती, बल्कि पूरा समुदाय इसमें भाग लेता है.
इस पूजा के दौरान युवा पुरुष उपवास रखते हैं, मौन साधते हैं और सभी सांसारिक गतिविधियों से दूर रहते हैं.
महिलाएं प्रत्यक्ष रूप से पूजा में शामिल नहीं होतीं लेकिन भोजन निर्माण, स्थल की सजावट और अनुष्ठानिक व्यवस्थाओं में उनकी भूमिका होती है.
खारची पूजा से संबंध
केर पूजा का गहरा संबंध खारची पूजा से है.
जहां खारची पूजा में 14 देवी-देवताओं की आराधना की जाती है और उत्सव का वातावरण होता है, वहीं केर पूजा संयम, शांति और आत्मशुद्धि का पर्व होती है. इन दोनों पूजाओं को मिलाकर त्रिपुरा की धार्मिक परंपराओं में संतुलन और पूर्णता का संदेश है.
आज भी यह पूजा अगरतला और अन्य क्षेत्रों में पूरे श्रद्धा और अनुशासन के साथ मनाई जाती है. हालांकि शहरीकरण, आधुनिक जीवनशैली और धार्मिक समरूपीकरण के चलते कई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं.
लेकिन राज्य सरकार इसे सांस्कृतिक कैलेंडर में सम्मिलित कर प्रचारित करती है, जिससे शोधकर्ता, पर्यटक और संस्कृति प्रेमी इसमें रुचि लेने लगे हैं.

