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कैसे भारत के इतिहास में अमर हुआ भील बालक दूधा?

भील बालक दूधा के बलिदान की गाथा राजस्थान की भूमि पर घटी एक महान देशभक्ति की कहानी है.

राजस्थान के पुंगा की पहाड़ी बस्ती में जन्में दूधा भील जनजाति से ताल्लुख रखते थे. कम उम्र में ही दूधा ने अपने राष्ट्र की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप की सहायता करने का फैसला किया.

जिस समय महाराणा प्रताप जंगल में रहकर मुगलों से संघर्ष कर रहे थे उस समय भील समुदाय के लोग दैनिक आधार पर उनके परिवार के लिए बारी-बारी से खाना भेजते थे.

इस व्यवस्था में एक दिन दूधा के परिवार की बारी आई. उसके घर में खाने के लिए अन्न का एक दाना भी नहीं था लेकिन इसके बावजूद उसकी मां ने पड़ोस से आटा मांगकर रोटियां बनाईं और दूधा से रोटियां ले जाकर महाराणा प्रताप को देने के लिए कहा.

दूधा ने सहर्ष पोटली उठाई और पहाड़ी की तरफ़ जाने लगा, जहां एक गुफ़ा में महाराणा प्रताप और उनका परिवार रह रहा था. वो बड़ी तेज़ी से पहाड़ी की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा था जिस कारण घात लगाए बैठी अकबर की सेना को शक हो गया.

शक होने पर एक सैनिक ने दूधा को रोक कुछ पूछने की कोशिश की लेकिन दूधा रूकने के बजाय तेज़ी से आगे बढ़ने लगा.

उसे पता था कि वे मौके का फ़ायदा उठाने का भरसक प्रयास करेंगे और उसके माध्यम से महाराणा प्रताप के ठिकाने तक पहुंचने की कोशिश करेंगे.

उसका अंतरमन ये भी जानता था कि उसकी एक छोटी सी चूँक का परिणाम भयावह हो सकता है. इसलिए वह किसी भी हालत में पकड़ा नहीं जाना चाहता था.

सैनिकों ने अपनी पूरी क्षमता के साथ कोशिश की कि दूधा को पकड़ा जा सके लेकिन वे न तो दूधा के पैरों की गति की बराबरी कर सके न उसकी दृढ़ता की.

जब सैनिक उसे पकड़ नहीं पाए तब उन्होंने गुस्से में आकर अपनी तलवार चला दी जिससे दूधा की कलाई कटकर गिर गई और खून बहने लगा. लेकिन इस चोट से भी दूधा रुका नहीं.

उसने गिरी हुई रोटी की पोटली उठाई और दूसरे हाथ में रोटी लेकर दौड़ने लगा. उसकी आंखों के सामने सिर्फ एक ही मकसद था रोटियां राणा प्रताप तक पहुंचानी हैं.

आखिरकार जब दूधा गुफ़ा में पहुंचा जहां महाराणा प्रताप छिपे हुए थे वह थक कर गिर पड़ा. उसने अपनी आखिरी ताकत जुटाई और राणाजी को आवाज़ लगाई.

महाराणा प्रताप तुरंत बाहर आए और देखा कि दूधा खून से लथपथ था. उसकी एक कलाई कटी हुई थी और दूसरे हाथ में रोटियों की पोटली थी.

महाराणा ने तुरंत दूधा को गोद में उठा लिया और पानी के छींटे मारकर होश में लाने की कोशिश की.

दूधा हिम्मत जुटाकर टूटी हुई आवाज़ में इतना ही कह पाया “राणाजी, ये रोटियां… मां ने भेजी हैं.” महाराणा प्रताप की आंखों से आंसू बहने लगे. उन्होंने करूण स्वर में कहा,  “बेटा, तुम्हें इतने बड़े संकट में पड़ने की ज़रूरत नहीं थी.”

वीर दूधा ने अन्नदाता महाराणा प्रताप से कहा कि वे पूरे परिवार के साथ संकट में हैं.

वीर दूधा ने महाराणा प्रताप से कहा कि आप और आपका पूरा परिवार संकट में है. मां कहती हैं कि आप चाहते तो अकबर से समझौता कर सकते थे लेकिन आपने धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए बड़ा त्याग किया है. मेरे त्याग की तो कोई तुलना ही नहीं है. इतना कहकर दूधा वीरगति को प्राप्त हो गया.

महाराणा प्रताप ने उसके बलिदान को सलाम किया और कहा कि तू अमर रहेगा,  मेरे बेटे, तू हमेशा अमर रहेगा.

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