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खराब स्कूल सुविधाओं के खिलाफ सैकड़ों आदिवासी छात्रों का 180 किलोमीटर मार्च

महाराष्ट्र में आदिवासी छात्रों और उनसे जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सरकारी आवासीय स्कूलों और छात्रावासों में व्याप्त बुनियादी सुविधाओं की कमी, छात्रों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर आज (28 सिंतबर, 2026) मुंबई की ओर लगभग 180 किलोमीटर लंबा मार्च शुरू किया है.

यह आंदोलन आदिवासी छात्रों की शिक्षा और कल्याण से जुड़े कई पुराने और गंभीर सवालों को राज्य सरकार के सामने रखने की कोशिश है.

आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग है कि आदिवासी छात्रों को केवल स्कूल में दाखिला देने के बजाय उन्हें सुरक्षित, सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक वातावरण भी उपलब्ध कराया जाए.

‘सकल आदिवासी विद्यार्थी आंदोलन कृति समिति’ द्वारा आयोजित ‘ट्राइबल जेन Z उल्गुलान’ मार्च, सुबह 11 बजे नासिक के अनंत कन्हेरे मैदान (गोल्फ क्लब ग्राउंड) से शुरू होने वाला था.

नासिक के ईदगाह मैदान में पिछले 40 दिनों से धरना दे रहे प्रदर्शनकारी, राज्य सरकार पर शिक्षा और कल्याण से जुड़े कई मुद्दों पर कार्रवाई करने का दबाव बना रहे हैं.

वे महाराष्ट्र के आदिवासी विकास मंत्री अशोक उइके के इस्तीफ़े और आदिवासी विकास विभाग के सेक्रेटरी व कमिश्नर के तबादले के साथ-साथ, छात्र आदिवासी स्कूलों और हॉस्टलों में बेहतर ज़रूरी सुविधाओं की मांग कर रहे हैं.

साथ ही वे रेजिडेंशियल स्कूलों में आदिवासी छात्रों की मौत की स्वतंत्र जांच की भी मांग कर रहे हैं.

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने पीड़ितों के लिए आर्थिक मदद और महाराष्ट्र में ‘आश्रम’ स्कूलों और आवासीय शिक्षण संस्थानों के लिए ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ (NCPCR) की गाइडलाइंस को सही ढंग से लागू करने की मांग की है.

छात्रों ने अपनी शिकायतों पर बात करने के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से सीधे मुलाक़ात की भी मांग की है.

‘द हिंदू’ से बात करते हुए आदिवासी नेता राहुल पावरा ने बताया कि मार्च के पहले दिन लगभग 1,500 छात्रों के शामिल होने की उम्मीद है, जिसमें नासिक, खानदेश, उत्तरी महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ से लोग हिस्सा लेंगे.

एक मुख्य विवाद का विषय आदिवासी आवासीय स्कूलों में खाना सप्लाई करने वाला सेंट्रल-किचन सिस्टम है. उन्होंने इस सिस्टम को पूरी तरह खत्म करने की मांग की है क्योंकि खाना कई घंटे पहले ही बना लिया जाता है और लंबी दूरी तक ले जाया जाता है, जिससे इसकी क्वालिटी पर सवाल उठते हैं और सेहत से जुड़े जोखिम बढ़ जाते हैं.

प्रदर्शनकारियों ने किचन में क्वालिटी-कंट्रोल के तरीकों पर भी सवाल उठाए हैं, जिसमें कच्चे माल की लेबलिंग और एक्सपायरी की जानकारी शामिल है.

वहीं आरोपों के जवाब में, राज्य सरकार ने कहा है कि सेंट्रल किचन 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले रिहायशी इलाकों में खाना सप्लाई करते हैं और सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है. उम्मीद है कि यह कमेटी तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सौंप देगी, जिसके बाद कोई फ़ैसला लिया जाएगा.

आंदोलन की पृष्ठभूमि

महाराष्ट्र के विभिन्न आदिवासी इलाकों में बड़ी संख्या में बच्चे सरकारी आश्रम स्कूलों और आवासीय विद्यालयों में पढ़ते हैं. इन संस्थानों का उद्देश्य दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा, आवास और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना है.

लेकिन आंदोलन से जुड़े छात्रों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि अनेक स्कूलों और छात्रावासों में अभी भी पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

छात्रों की शिकायतों में स्कूलों और छात्रावासों का कमजोर बुनियादी ढांचा, भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, विद्यार्थियों की सुरक्षा और प्रशासनिक समस्याएं शामिल हैं.

उनका कहना है कि इन समस्याओं का समाधान लंबे समय से पूरी तरह नहीं हुआ है. इसी असंतोष ने छात्रों को स्थानीय स्तर के विरोध से आगे बढ़कर मुंबई तक मार्च करने के लिए प्रेरित किया.

यह मार्च नासिक में आदिवासी छात्रावासों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर हुए 19 दिन के भूख हड़ताल आंदोलन के बाद सामने आया. छात्रों ने 4 सितंबर को भूख हड़ताल समाप्त की थी.

इसके बाद आंदोलन को राज्य की राजधानी मुंबई तक ले जाने का निर्णय लिया गया, ताकि सरकार और संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों तक उनकी मांगें सीधे पहुंचाई जा सकें.

छात्रों की प्रमुख मांगें

1. बेहतर बुनियादी सुविधाएं

छात्रों की सबसे प्रमुख मांग है कि सरकारी आश्रम स्कूलों और छात्रावासों में पर्याप्त तथा सुरक्षित बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं. इसमें भवन, कमरे, स्वच्छता, भोजन और विद्यार्थियों के रहने-पढ़ने के लिए उचित वातावरण जैसी सुविधाएं शामिल हैं.

आंदोलनकारियों का कहना है कि दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए आवासीय स्कूल शिक्षा प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं. इसलिए इन संस्थानों में खराब सुविधाओं का सीधा असर विद्यार्थियों की शिक्षा और उनके भविष्य पर पड़ता है.

2. विद्यार्थियों की सुरक्षा

आंदोलन में छात्राओं और अन्य विद्यार्थियों की सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। विशेष रूप से गडचिरोली के एक आश्रम स्कूल में छात्राओं के साथ कथित छेड़छाड़/उत्पीड़न की घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की गई है.

यह मांग आंदोलनकारियों की ओर से उठाई गई है और इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आवासीय स्कूलों में रहने वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था हो तथा किसी भी शिकायत पर निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई की जाए.

3. सेंट्रल-किचन सिस्टम खत्म करने की मांग

आंदोलनकारी आदिवासी आश्रम स्कूलों में लागू सेंट्रल-किचन सिस्टम को समाप्त करने की मांग भी कर रहे हैं.

उनका तर्क है कि भोजन की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें विद्यार्थियों को पर्याप्त, गुणवत्तापूर्ण और समय पर भोजन मिल सके.

यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आवासीय विद्यालयों में रहने वाले बच्चों के लिए स्कूल ही भोजन और आवास दोनों का प्रमुख आधार होता है. इसलिए भोजन की व्यवस्था में किसी प्रकार की समस्या का सीधा असर विद्यार्थियों के स्वास्थ्य और पढ़ाई पर पड़ सकता है.

4. शिक्षा में कथित अनियमितताओं पर रोक

आंदोलनकारियों ने शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी कथित अनियमितताओं को दूर करने की मांग की है. उन्होंने यह भी कहा है कि आदिवासी विद्यार्थियों को शिक्षा के क्षेत्र में समान अवसर मिलने चाहिए और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण उनके अवसर प्रभावित नहीं होने चाहिए.

आंदोलन में रोस्टर से जुड़े मुद्दों के समाधान की मांग भी शामिल है. इसके अतिरिक्त शिक्षा में कथित ‘डोनेशन’ की प्रथा को समाप्त करने की मांग उठाई गई है.

5. मुआवजा, स्वयं (Swayam) फंड

मार्च की एक महत्वपूर्ण मांग उन मामलों से जुड़ी है जिनमें आदिवासी विद्यार्थियों की सुरक्षा या अधिकार प्रभावित हुए हैं. आंदोलनकारी चाहते हैं कि ऐसे मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो तथा प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए.

इसका व्यापक उद्देश्य यह है कि विद्यार्थियों से जुड़ी गंभीर घटनाओं को केवल विभागीय स्तर की सामान्य कार्रवाई तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनकी स्वतंत्र जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए.

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने गढ़चिरौली में मारे गए छात्रों के परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये और घायल छात्रों के लिए 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की है.

उन्होंने ‘स्वयं’ (Swayam) योजना के तहत बाकी बचे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) फंड को जारी करने और इस पहल के तहत दी जाने वाली सहायता के स्तर में सुधार की भी मांग की है.

कुछ मांगें मान ली गई हैं.

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, आदिवासी विकास विभाग ने 25 सितंबर को छात्र नेताओं के साथ बैठक की और सात पेज का एक पत्र जारी किया, जिसमें उन मांगों का ब्योरा दिया गया जिन्हें मान लिया गया है और जिन्हें नहीं माना गया है.

विभाग का दावा है कि कुछ मांगों के लिए वर्क ऑर्डर और टेंडर जारी कर दिए गए हैं, जिनमें आदिवासी आवासीय स्कूलों के बाथरूम में गर्म पानी की सुविधा भी शामिल है. वहीं कई मांगों को अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है. सरकार का कहना है कि इन पर नीतिगत स्तर पर और गहराई से फैसले लेने की ज़रूरत है.

इसके बावजूद, प्रदर्शनकारी अपना आंदोलन जारी रखे हुए हैं और राज्य सरकार से लिखित आश्वासन और कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.

यह मार्च 4 अक्टूबर तक चलेगा

संगठन के सदस्य प्रशांत गवंधे ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को बताया कि इस पैदल मार्च में शामिल लोग दिन में चलेंगे और रात में आराम करने के लिए खुली जगहों पर रुकेंगे. उम्मीद है कि यह मार्च 4 अक्टूबर तक जारी रहेगा, जब तक कि प्रदर्शनकारी मुंबई में राजभवन नहीं पहुँच जाते.

ये घटनाक्रम आदिवासी समुदाय के एक महीने से चल रहे आंदोलन के बीच हो रहे हैं, जिसमें 18 अगस्त, 19 अगस्त और 1 सितंबर को हुए प्रदर्शन भी शामिल हैं. कुछ प्रदर्शनकारियों ने पहले अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी की थी.

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के संस्थापक अभिजीत दिपके ने 3 सितंबर को प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की और उनसे भूख हड़ताल खत्म करने और आंदोलन को राज्य की राजधानी ले जाने का आग्रह किया.

गवंधे ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि इससे पहले फडणवीस, उइके और नासिक के ज़िला कलेक्टर आयुष प्रसाद के साथ फ़ोन पर बातचीत हुई थी, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने कहा था कि अगर उनकी मांगें लिखित रूप में दी जाएं, तो वे सरकार का जवाब सुनने को तैयार हैं.

अब वे अपनी मांगें रखने के लिए मुख्यमंत्री से सीधे मुलाक़ात करना चाहते हैं.

दरअसल, यह मार्च महाराष्ट्र में आदिवासी शिक्षा से जुड़े सवालों को एक बड़े सार्वजनिक मुद्दे के रूप में सामने लाता है. आदिवासी समुदायों के अनेक बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां सामान्य स्कूलों तक पहुंच कठिन होती है. ऐसे में आश्रम स्कूल और आवासीय विद्यालय उनके लिए शिक्षा प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं.

अगर इन स्कूलों में पर्याप्त भवन, स्वच्छता, भोजन, आवास और सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती, तो शिक्षा का उद्देश्य प्रभावित होता है. इसी कारण आंदोलनकारी केवल स्कूल खोलने के बजाय स्कूलों में गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं.

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