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कोया आदिवासी: कौन हैं, कैसे जीते हैं और इतिहास क्या है

दक्षिण ओडिशा के मलकानगिरि जिले में रहने वाली वाली कोया जनजाति (Koya tribe) को भारत की सबसे पहली जनजातियों में से एक मानी जाता है.

इस आदिवासी समुदाय के लोग वखुद को “कोया” (Koya) या “कोइतोर” (Koitor) भी कहते हैं, जिसका मतलब है ‘लोग’.

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में रहने वाले कोया लोगों को डोरला और माड़िया कहा जाता है. उनकी मातृभाषा गोंडी है, जो द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है. वे ओड़िया और तेलुगु भी बोल सकते हैं.

ओडिशा के अलावा कोया लोग छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में भी बसते हैं.

ओडिशा के मलकानगिरि जिले में जनसंख्या के हिसाब से कोया सबसे प्रमुख जनजाति है. वे कालीमेला, मोट्टू, पोडिया, मथिली, कोरकोंडा और मलकानगिरि क्षेत्रों में रहते हैं.

परंपरागत रूप से कोया लोग पशुपालन और झूम खेती करते थे. लेकिन आज वे स्थायी कृषि, पशुपालन और वन उत्पादों के संग्रह पर निर्भर हैं. उनके पास बड़ी संख्या में गाय और बैल होते हैं.

कोया जनजाति की परंपरा के अनुसार उनकी वास्तविक संपत्ति पशुधन है क्योंकि बिना पशुओं वाला व्यक्ति इनके समाज में सम्मानित नहीं माना जाता.

वे गांव स्तर पर सामुदायिक निधि (community funds) और अनाज बैंक बनाए रखते हैं ताकि जरूरतमंद परिवारों की सहायता हो सके और खाद्य सुरक्षा बनी रहे.

वे अपने मृतकों यानि पूर्वजों की याद में स्मारक पत्थर (Menhir) बनाते हैं.

कोया जनजाति ने अपने रंग-बिरंगे नृत्य और संगीत की समृद्ध परंपरा को आज भी सुरक्षित रखा है.

उनके त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों में नृत्य और संगीत का विशेष महत्व है. पुरुष नृत्य के समय बाइसन के सींगों वाले बड़े मुकुट पहनते हैं, जिन्हें मोरपंख और कौड़ियों से सजाया जाता है.

महिलाएं रंगीन वस्त्र और आभूषण पहनती हैं. साथ ही अपने माथे पर पीतल की सपाट पट्टी पहनती हैं और टिनटिन बजती घंटियों से सजी लाठियां हाथ में लेती हैं. वे नृत्य के दौरान थाप के बीच में लाठियों को टकराते हुए घेरे में नृत्य करती हैं.

पुराने दिनों से ही कोया लोग अपने दूरदराज के आवासों में बिना किसी अशांति के रह रहे हैं और अपने अनूठे जीवन और संस्कृति का प्रसार कर रहे हैं.

लेकिन आज़ादी के बाद उनके क्षेत्र में विभिन्न समुदायों के लोगों के आगमन और विकास परियोजनाओं के कारण उनकी पारंपरिक जीवन शैली प्रभावित हुई. आज वे अपनी संस्कृति और पहचान को सुरक्षित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

पहचान

कोया एक प्राचीन जनजाति है जिसकी अपनी विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत है.

प्राचीन समय में कोया लोगों को एक योद्धा जनजाति माना जाता था. मलकानगिरि की अंतिम रानी बंगारू देवी (1855–1872 ई.) के पास एक शक्तिशाली कोया सेना थी, जिसने जयपुर के राजा रामचंद्र देव तृतीय को पराजित किया.

जनसंख्या

1880 में ब्रिटिश शासन के दौरान तमा डोरा नाम के एक कोया युवक के नेतृत्व में कोया विद्रोह (Koya Rebellion) हुआ. इसके बाद कोया लोग समय-समय पर अंग्रेजी शासन का विरोध करते रहे.

2011 की जनगणना के मुताबिक, ओडिशा में कोया जनजाति की कुल जनसंख्या 1 लाख 47 हज़ार 137 है, जिसमें 71 हज़ार 14 पुरुष और 76 हज़ार 123 महिलाएं शामिल हैं. उनका लिंगानुपात 1000 पुरुषों पर 1072 महिलाएं है.

कोया लोगों में साक्षरता दर 29.87 प्रतिशत (पुरुषों के लिए 36.46 प्रतिशत और महिलाओं के लिए 23.77 प्रतिशत) दर्ज की गई है.

2001-2011 के दौरान उनकी जनसंख्या में 20.08 प्रतिशत की नकारात्मक वृद्धि दर दर्ज की गई है.

बस्ती और आवास व्यवस्था

कोया आंध्र प्रदेश के गोदावरी जिले के उत्तर और ओडिशा के मलकनगिरी जिले की पहाड़ियों और जंगलों में निवास करते हैं. यह जिला विशाल वन क्षेत्रों से घिरा हुआ है.

कोया गांव जंगलों के बीच साफ किए गए हिस्सों पर स्थित हैं जो महुआ और सल्पा जैसे पेड़ों से घिरे हैं.

प्रत्येक गांव में एक संरचना होती है जिसे ‘बिज्जागुड़ी’ या ‘भगवान का घर’ कहा जाता है. यह या तो गांव के अंदर या गांव की सीमा के पास या यहां तक कि मुखिया के घर के ठीक सामने स्थित होती है.

ग्राम देवी – गुडीमाता का पवित्र मंदिर, गांव के अंदर या पास में महुआ के पेड़ों के एक झुरमुट में स्थित होता है.

प्रत्येक गांव में एक शयनशाला (dormitory) होती है जिसका उपयोग गांव की अविवाहित लड़कियों द्वारा रात में सोने और गपशप करने के लिए किया जाता है. लेकिन यह प्रथा आजकल चलन से बाहर होती जा रही है.

आमतौर पर कोया गांवों तक पहुंच कच्चे रास्तों के माध्यम से होती है.

कोया कम ऊंचाई वाले फूस के घरों में रहते हैं. प्रत्येक घर में एक या दो छोटे कमरे होते हैं. घर की दीवारें पेड़ की टहनियों और बांस से बनी होती हैं, जिन पर मिट्टी का मोटा लेप लगाया जाता है.

घरों की छतों की उचांई कम होती है.कोया भाषा में घरों को ‘सिंदी’ कहा जाता है. घर आकार में आयताकार होते हैं और मिट्टी से सने बांस की दीवारों से कमरे में बने होते हैं. घर बिना खिड़की के होते हैं और चूल्हा इसके एक कोने में स्थित होता है.

कोया घर की सीमा को बांस की पट्टियों से बनी बाड़ बनाया जाता है. सूअरों, बकरियों और मुर्गियों के लिए छोटे बाड़े होते हैं. प्रत्येक कोया घर के साथ एक किचन गार्डन जुड़ा होता है. वहां वे तंबाकू, सरसों, सब्जियां, मक्का और बाजरा उगाते हैं.

करीब सभी घरों की छतें सब्जियों की लताओं से ढकी रहती हैं. वे बगीचे में या घर के पास सिकड़ या फलियां लगाते हैं.

आजीविका

पहले कोया लोग झूम खेती करते थे लेकिन आजकल वे स्थायी खेती करने लगे हैं. वे मुख्य रूप से धान, मक्का, रागी और तंबाकू के पत्तों की खेती करते हैं.

फसल कटाई के वक्त सभी परिवार अपने-अपने खेतों में बनी झोपड़ियों (केतुल) में चले जाते हैं, जहां वे फसल की रखवाली के लिए पूरा दिन बिताते हैं और शाम को घर लौट आते हैं.

कोया भोजन के लिए अन्य तरीकों का भी सहारा लेते हैं, जैसे कि जंगल से कंद-मूल और फल इकट्ठा करना और सुआन (छोटा बाजरा), मक्का और दलहन जैसी लघु फसलें उगाना.

कोया क्षेत्र में महुआ के पेड़ प्रचुर मात्रा में मिलेंगे और मार्च और अप्रैल के महीनों के दौरान बड़ी मात्रा में महुआ एकत्र किया जाता है, सुखाया जाता है और भविष्य के उपयोग के लिए इकट्ठा किया जाता है.

जुलाई से सितंबर के महीनों के दौरान जंगल से कई प्रकार की जड़ें इकट्ठा की जाती हैं और खाई जाती हैं.

जंगल से इकट्ठा की गई जड़ें कोया लोगों के लिए भोजन का एक और स्रोत हैं. जड़ें कोया के मुख्य आहार का हिस्सा हैं. इनका उपयोग दवाओं के रूप में भी किया जाता है.

खान-पान की आदतें

कोया दिन में दो मुख्य भोजन और एक तीसरा छोटा भोजन लेते हैं. सुबह के खाने में ‘जावा’ या मांड (चावल का दलिया) शामिल होता है. कभी-कभी वे बाजरे का दलिया भी लेते हैं. दोपहर के दौरान वे या तो चावल का मांड या बाजरे का मांड लेते हैं. बच्चे उबला हुआ कुल्थी (horse gram) या शकरकंद खाते हैं.

शाम के भोजन में उबले हुए चावल और मिक्स सब्जी या दाल और पालक की सब्जी शामिल होती है.

उनके खान-पान में मौसमी बदलाव देखा जाता है. अनाज की कमी के दिनों (lean period) के दौरान जड़ें, कंद, हरी पत्तियां और जंगली फल उनके भोजन के महत्वपूर्ण अंग होते हैं.

बाघों और भालू को छोड़कर सभी प्रकार के जंगली जानवरों और पक्षियों को कोया लोगों द्वारा खाया जाता है. गिलहरी, जंगली चूहे और खरगोश भी चाव से खाए जाते हैं और अक्सर उनका शिकार किया जाता है.

बारिश के मौसम में कोया लोग घोंघे, सीप, केकड़े, मछली और मशरूम इकट्ठा करते हैं. वे लाल और सफेद चींटियों के अंडे भी खाते हैं.

गर्मियों के महीनों में ये लोग ताड़ के फल, आम, कटहल, बेर और केंदु पर ही गुजारा करते हैं.

महुआ (महूला) और सल्पा इनके पेय हैं.

कोया लोग महुआ के फूलों का उपयोग न केवल भोजन के रूप में बल्कि एक मादक पेय के रूप में भी किया जाता है.

कोया देशी तरीके से महुआ के फूलों को उबालकर मादक पेय तैयार करते हैं. इसे सुरते या उराम कहा जाता है और यह गहरे लाल रंग का होता है. कोया महुआ से तेल भी तैयार करते हैं, जिसका उपयोग वे खाना पकाने के लिए करते हैं और इसे अपने शरीर और बालों पर भी लगाते हैं.

त्योहार

कोया मुख्य रूप से चार वार्षिक धार्मिक त्योहार मनाते हैं जैसे कि बिज्जा पांडु (Bijja Pandu), कोदता पांडु (Kodta Pandu), बिमुद पांडु (Bimud Pandu) और इदु या इक्क पांडु (Idu / Ikk Pandu). बिज्जा पांडु सबसे महत्वपूर्ण कृषि त्योहार है जो धरती माता की पूजा करने के लिए आयोजित किया जाता है ताकि बिना परेशानी के अच्छी फसल प्राप्त हो सके. ‘बिज्जा पांडु’ वह पवित्र बीज है जिससे इस त्योहार का नाम पड़ा है. यह चैत्र के महीने में मनाया जाता है, जब मुर्गे, सूअर, अंडे और आम की भेंट देकर धरती माता की पूजा की जाती है.

वहीं बिमुद पांडु वर्षा देवता की पूजा के लिए माघ-फाल्गुन के महीने में आयोजित किया जाता है. यह सभी प्रकार की फसलों की कटाई पूरी होने के ठीक बाद मनाया जाता है.

उत्सव के दिन वर्षा देवता और उनकी पत्नी के दो छोटे मिट्टी की मूर्ती बनाई जाती है और एक महुआ के पेड़ के नीचे, एक पत्थर के टुकड़े पर रखे जाते हैं. ग्रामीण, पुजारी और मुखिया के साथ सभी प्रकार की फसलों के साथ उस स्थान पर इकट्ठा होते हैं.

इक्क पांडु, इमली का त्योहार है. इसे फरवरी-मार्च के दौरान पकी हुई इमली का संग्रह शुरू करने के लिए मनाया जाता है जो कोया का एक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है. गांव का पुजारी गांव के अंदर एक इमली के पेड़ की पूजा करता है और अंडे और मुर्गियों की बलि देता है.

इसी तरह कोया महुआ के फूलों का संग्रह शुरू करने के लिए भी इक्क पांडु मनाते हैं.

वहीं मार्च के महीने में आयोजित ताड़ी पांडु (Tadi Pandu) ताड़ी यानी ताड़ के रस के संग्रह की शुरुआत का प्रतीक है जो कोया का पसंदीदा पेय है.

कुल मिलाकर कोया जनजाति सभी नए खाने की चीजों को त्योहारों में अर्पित करते हैं. इस दौरान ग्राम देवता (गामा) और घरों में पैतृक आत्माओं की पूजा ग्राम पुजारी और घर के प्रमुख द्वारा की जाती है.

पशुओं की बलि दी जाती है और नई फसल, फल या सब्जी देवताओं को अर्पित की जाती है जिसके बाद कोया उन्हें खाते हैं. कोई भी कोया नया फल खाने का समारोह मनाए बिना नए फल या फसल खाने की हिम्मत नहीं करता है.

कोया जनजाति समय-समय पर अपने देवताओं और पूर्वजों की पूजा करते हैं. लेकिन कोया समाज में जादू और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं.

क्योंकि कोया अपने देवताओं की पूजा करते हैं और उन्हें प्रसन्न करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. लेकिन जब यह पूजा उन्हें कोई परिणाम देने में विफल रहती है तो वे वद्दे (जादू-टोना विशेषज्ञ) की मदद से जादुई प्रथाओं का सहारा लेते हैं.

वद्दे को बीमारियों को ठीक करने, बच्चे के सुचारू प्रसव को प्रभावित करने और आपदाओं और महामारियों को दूर करने के लिए जादुई अनुष्ठान करने के लिए बुलाया जाता है.

सामाजिक नियंत्रण

कोया लोगों के बीच अगर कोई उनके आदिवासी प्रथागत नियम का उल्लंघन करता है, तो ग्राम समुदाय गलत काम करने वाले पर जुर्माना जैसा दंड लगाकर सुधारात्मक कार्रवाई करता है और फिर अलौकिक शक्तियों के क्रोध के कारण होने वाली संभावित आपदाओं से बचने के लिए देवताओं की पूजा करता है.

दूसरी ओर इस तरह के विश्वास और प्रथाएं सामाजिक अनुशासन और अनुरूपता सुनिश्चित करती हैं.

कोया के बीच सामाजिक नियंत्रण की पारंपरिक संस्थाओं का कामकाज यह दर्शाता है कि पारंपरिक ग्राम परिषद (traditional village council) के माध्यम से गांव में धर्मनिरपेक्ष और पुरोहित दोनों नेता एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं जो अंतर और अंतरा-ग्राम विवादों को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करती है और दंड और इनाम देते हैं.

कोया गांव के पारंपरिक मुखिया को ‘पेडा’ (Peda) कहा जाता है, जिसके इर्द-गिर्द राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह का नेतृत्व घूमता है और यह पद वंशानुगत होता है. वह एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और कुछ विशेष अधिकारों का आनंद लेता है जो उसे एक गांव में पावरफुल शख्स बनाता है. वह अपने धार्मिक कर्तव्यों के अलावा धर्मनिरपेक्ष मुखिया के रूप में काम करता है. वह अपने गांव के प्रथागत मामलों में निर्णय लेता है.

परिवर्तन और विकास

मलकनगिरी में कोया के आवास, अर्थव्यवस्था और समाज तथा सांस्कृतिक जीवन में 1970 दशक के बाद से दंडकारण्य विकास परियोजना (Dandakaranya Development Project) में बांग्लादेश के शरणार्थियों के पुनर्वास और पारगमन के आधार पर बर्मा से ओडिया शरणार्थियों और श्रीलंका से तमिल शरणार्थियों के पुनर्वास और दुदुमा, बालीमेला, ऊपरी कोलाब बांध परियोजनाओं के कारण कोया परिवारों के विस्थापन के कारण परिवर्तन की एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा है.

इसके अलावा, बाहर से विभिन्न संस्कृतियों के लोगों की आमद ने कोया लोगों के जीवन और संस्कृति को प्रभावित किया है. वर्तमान में कोया पुनर्वासियों (resettlers) के मुकाबले जीवित रहने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं, जो अपनी जीवन शैली में उनसे कहीं बेहतर हैं.

कोया लोगों के बीच अपेक्षाओं और उपलब्धियों के बीच अभी भी एक बड़ा अंतर है. इसने उनके जीवन और आजीविका पर विभिन्न विकास कार्यक्रमों के प्रभाव को कम किया है.

यह नहीं कहा जा सकता कि अब तक कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. हालांकि, सरकार के नियोजित विकास हस्तक्षेपों में कोया लोगों को अपने सतत सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए लाभों को बढ़ाने के लिए परियोजनाओं/योजनाओं के सफल कार्यान्वयन के लिए पूरी तरह से भाग लेने की जरूरत है.

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