केरल के मलप्पुरम जिले की एक आदिवासी बस्ती में रहने वाले परिवारों की परेशानियां 2019 की विनाशकारी बाढ़ के कई वर्ष बाद भी समाप्त नहीं हुई हैं. बाढ़ में उनके घर नष्ट हो गए थे और इसके बाद से उन्हें अस्थायी ठिकानों में रहना पड़ रहा है.
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सात वर्ष बीत जाने के बावजूद कुछ आदिवासी परिवार अभी भी प्लास्टिक और अन्य अस्थायी सामग्री से बने शेडों में रहने को मजबूर हैं.
इन परिवारों में पनिया (Paniya) आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हैं. बाढ़ के बाद स्थायी पुनर्वास और सुरक्षित आवास की उम्मीद थी लेकिन आवास की समस्या लंबे समय तक बनी रही.
अस्थायी शेड बारिश, गर्मी और अन्य मौसम संबंधी परिस्थितियों से पर्याप्त सुरक्षा नहीं देते. इससे परिवारों के रोजर्मरा की जिंदगी और बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ता है.
अस्थायी आश्रय अब स्थायी पता बन गया
दरअसल, साल 2019 में जब चालियार नदी ने मलप्पुरम ज़िले के वानियामपुझा आदिवासी गांव के एक हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया, तो पुरुष, महिलाएं और बच्चे भागकर ऊंचाई पर स्थित घने जंगल की ओर चले गए.
जब तक पानी उतरा, तब तक उनके घर नष्ट हो चुके थे. पुल बह गए थे, जिससे मेनलैंड से उनका संपर्क कट गया था. उन्हें लगा था कि वे घर लौट आएंगे. लेकिन सात साल बाद भी वे प्लास्टिक की शीट के नीचे रह रहे हैं.
ऐसे में वानियामपुझा आदिवासी गांव के 26 आदिवासी परिवारों के लिए यह अस्थायी आश्रय अब स्थायी पता बन गया है.
रात में जंगल में घुप अंधेरा छा जाता है. वहां बिजली नहीं है. बस्ती में हाथी घूमते रहते हैं. तेंदुए बकरियों और कुत्तों का शिकार करते हैं.
यहां की महिलाओं को शौच के लिए झाड़ियों में जाने के लिए अंधेरा होने का इंतज़ार करना पड़ता है.
कुछ वर्षों बाद आधे परिवार पहाड़ी से नीचे चले गए. जिसके बाद वानियमपुझा दो हिस्सों – ऊपरी और निचली बस्ती में बंट गई.
अब दोनों बस्तियों में कुल 161 लोग रहते हैं. ऊपर 70 और नीचे 91 लोग.
उनकी पुरानी बस्ती उस स्थान पर स्थित थी, जहां वायनाड की पहाड़ियों से उतरने वाली वानियमपुझा नदी चालियार नदी से मिलती है.
बाढ़ ने कई घरों को नष्ट कर दिया; जो घर बच गए, वे भी अब खाली पड़े हैं. कोई भी परिवार वापस नहीं लौटा है. इस बस्ती को रहने के लिए अनुपयुक्त घोषित कर दिया गया है. इसलिए प्रभावित आदिवासी परिवार पहाड़ी पर ही रह गए.
वन प्रहरी बाबू पी. कहते हैं, “अभी भी ख़तरा बना हुआ है. पहाड़ियों के कुछ हिस्से नीचे आ सकते हैं. हमने देखा है कि बाढ़ कितनी विनाशकारी हो सकती है.”
आदिवासियों में यह भी मान्यता है कि वीरान घर में लौटने से दुर्भाग्य आता है.
वहां छोड़े गए आंगनवाड़ी केंद्र और स्कूल की इमारतें अभी भी खड़ी हैं, जो अब बच्चों के खेलने की जगह बन गई हैं.
बाढ़ ने उन दो कंक्रीट के पुलों को भी नष्ट कर दिया जो वानियामपुझा और पड़ोसी गांवों – थारीप्पापोटी, थंदनकल्लू, इरुट्टुकुथी और कुंबलापारा को मेनलैंड पर स्थित मुंडेरी से जोड़ते थे.
सालों से नदी पार करने का एकमात्र ज़रिया बांस की बनी नावें हैं. मॉनसून के दौरान, उफनती नदी को पार करना एक जोखिम भरा काम होता है. गर्भवती महिलाओं, मरीज़ों और बच्चों को उठाकर नदी पार करानी पड़ती है. कभी-कभी तो फायर और रेस्क्यू सर्विस के कर्मचारी भी नदी पार नहीं कर पाते.
सात साल बाद एक नया पुल बनकर तैयार है लेकिन अभी भी इसके उद्घाटन का इंतज़ार है.
हालांकि, इस पुल से नदी के ऊपरी इलाकों की समस्याएं हल नहीं होंगी. थारीप्पापोटी और कुंबलापारा, दोनों जगहों पर 20 से ज़्यादा परिवार रहते हैं.
थारीप्पापोटी और कुंबलापारा के निवासियों के लिए आपात की स्थिति यानि बहुत ज्यादा बीमार पड़े मरीजों को अभी भी जंगल के रास्ते ले जाना पड़ता है.
घर की समस्या
घर की समस्या अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. पुरानी बस्ती छोड़ने के बाद, वानियामपुझा के परिवारों ने नई ज़मीन की तलाश की लेकिन तकनीकी अड़चनें आ गईं क्योंकि उनके नाम पर पहले से ही ज़मीन दर्ज थी.
ज़मीन मिलने में देरी हुई, इसलिए घर बनने में भी देरी हो रही है.
इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट प्रोजेक्ट (ITDP) के अधिकारी विपिन दास वाई. का कहना है कि वानियामपुझा और थारीप्पापोटी के 39 परिवारों के लिए ‘रिकॉर्ड ऑफ़ राइट्स’ (ज़मीन के मालिकाना हक, किराएदारी और वित्तीय देनदारियों से जुड़ा आधिकारिक दस्तावेज़) को मंज़ूरी मिल गई है और घर बनाने के लिए विशेष मंज़ूरी मांगी गई है.
वे कहते हैं, “हमने 2.46 करोड़ का हाउसिंग प्रपोज़ल जमा किया है और उम्मीद है कि इसे जल्द ही मंज़ूरी मिल जाएगी.”
पोथुकल पंचायत के सदस्य अनिल कुमार बाबू कहते हैं कि वे काम शुरू करवाने की कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि वो लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि कुछ महीनों में घरों का काम शुरू हो जाएगा.
पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) ने थारीप्पापोटी के लिए एक सड़क प्रोजेक्ट तैयार किया है, जबकि वनियामपुझा नदी पर एक पुल बनाने का प्रस्ताव है.
बाढ़ के कुछ ही समय बाद, स्वयंसेवी संस्थाओं ने तिरपाल और राहत का दूसरा सामान उपलब्ध कराया. प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें सरकार की तुलना में इन संस्थाओं से ज़्यादा मदद मिली.
प्लास्टिक के शेल्टर
लोग प्लास्टिक के शेल्टर में रह रहे हैं लेकिन इससे बहुत कम सुरक्षा मिलती है. गर्मियों में ये शेल्टर बहुत ज़्यादा गर्म हो जाते हैं.
निवासियों का कहना है कि प्लास्टिक शेल्टर में रात में भी बहुत गर्मी होती है. कभी-कभी तो कई खतरें होने के बावजूद लोगों को अपने बच्चों के साथ बाहर सोते हैं.
बाढ़ से पहले, इन परिवारों के पास बिजली की सुविधा वाले घर थे. लेकिन 2019 में उनके घर और बिजली, दोनों चले गए.
आपदा के कुछ ही समय बाद, सब-कलेक्टर ने ज़मीन के नीचे से केबल डालकर बिजली पहुंचाने का वादा किया था. लेकिन उस पर कोई काम नहीं हुआ.
आदिवासियों का कहना है कि उन्हें अक्सर सिर्फ़ वादे ही मिलते हैं और कुछ नहीं.
आज मोबाइल फोन ही रोशनी का ज़रिया हैं. जिनके पास टॉर्च नहीं है, वे बैटरी खत्म होने तक फ़ोन का इस्तेमाल करते हैं. फोन चार्ज करने के लिए लोगों को आधा किलोमीटर दूर वानियामपुझा फ़ॉरेस्ट स्टेशन जाना पड़ता है.
ये परिवार हाथियों के कॉरिडोर (आवाजाही के रास्ते) में रहते हैं. हाथी कभी-कभी बिजली वाली बाड़ तोड़कर उन इलाकों में घुस आते हैं जहां लोग फ़सल उगाते हैं.
यहां पर लोग कुछ भी उगा नहीं सकते. क्योंकि बिजली वाली बाड़ ठीक से काम नहीं करती. हाथी उसे तोड़ देते हैं.
जून 2025 में बिली नाम के 56 साल के एक आदिवासी व्यक्ति की हाथी के हमले में मौत हो गई. नदी में पानी का बहाव तेज़ होने के कारण तुरंत मेडिकल मदद नहीं मिल पाई. यहां तक कि फायर और रेस्क्यू सर्विस के कर्मचारी भी तेज़ बहाव की वजह से अपनी छोटी नाव (डिंगी) से नदी पार नहीं कर पाए.
तेंदुए भी एक और खतरा हैं.
परिवारों का कहना है कि तेंदुओं ने लोगों पर हमला नहीं किया है. लेकिन अंधेरा होने के बाद वे सतर्क रहते हैं.
महिलाओं को रात का इंतज़ार करना पड़ता है
टॉयलेट न होना रोज़ाना की एक और बड़ी मुश्किल है.
महिलाओं का कहना है कि हमारे मर्द तो किसी तरह झाड़ियों में काम चला लेते हैं लेकिन महिलाओं को रात होने का इंतज़ार करना पड़ता है. यह बहुत मुश्किल होता है.
नीलांबुर के मौजूदा MLA आर्यदान शौकत के दखल के बाद यह मामला केरल हाई कोर्ट पहुंचा.
कोर्ट के दखल के बाद ITDP ने 2024 में वानियामपुझा और थारीप्पापोटी में एक-एक बायो-टॉयलेट लगवाया. तब से वे इस्तेमाल के लायक नहीं रहे. वे पहले ही भर चुके हैं. इसलिए लोगों के पास खुले में जाने के अलावा कोई चारा नहीं है.
कोर्ट के दखल के बाद सीनियर सिविल जज एम. शब्बीर इब्राहिम ने उस बस्ती का दौरा किया था. वे कहते हैं कि हालात बहुत बुरे थे.
पानी भी एक और समस्या है. कुएं खोदे जा रहे हैं लेकिन काम अधूरा पड़ा है. कई बार परिवारों को ऐसी जगहों पर जाना पड़ता है जहां पानी मिल सके.
स्कूल ड्रॉपआउट
यह संकट बच्चों के साथ स्कूल भी गया है. इन बस्तियों के बच्चे मुंडेरी, नेट्टिकुलम और पोथुकल के स्कूलों में पढ़ते हैं. ट्रांसपोर्ट अभी भी मुश्किल है; उन्हें ट्रैक्टर से नए पुल तक ले जाते हैं.
बच्चों को स्कूल ले जाना समस्या का सिर्फ़ एक हिस्सा है. असली समस्या ड्रॉपआउट रेट है.
कई माता-पिता को पढ़ाई के बारे में ज़्यादा जागरूकता की ज़रूरत है. परिवार शराब को ड्रॉपआउट का एक बड़ा कारण बताते हैं.
कई माता-पिता अपने बच्चों के सामने शराब पीते हैं और लड़ते हैं. कुछ बच्चों ने घर में झगड़ों की वजह से स्कूल जाना बंद कर दिया है. ऐसे में बार-बार जागरूकता सेशन ज़रूरी हैं.
कुछ बच्चे निलांबूर और वायनाड के मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों के हॉस्टल में रहते हैं. बाकी बच्चे घर लौट आते हैं और फिर वापस जाने में उन्हें मुश्किल होती है. कुछ बच्चे तो बस दो-तीन क्लास अटेंड करके ही लौट आते हैं.
बाढ़ के सात साल बाद पुल तो बन गया है लेकिन वे अभी भी घरों का इंतज़ार कर रहे हैं. वहां अभी भी बिजली, इस्तेमाल लायक टॉयलेट या भरोसेमंद पानी की सुविधा नहीं है. बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं. परिवार अभी भी प्लास्टिक की शीट के नीचे उस जंगल में सो रहे हैं जो कभी उनका घर नहीं था.
वनियामपुझा के लोग नदी में बहे अपने पुराने घरों को वापस नहीं मांग रहे हैं. उन्हें सुरक्षित घर, बिजली, पानी और टॉयलेट चाहिए. वे चाहते हैं कि उनके बच्चे स्कूल में बने रहें. वे बिना डरे नदी पार करना चाहते हैं.
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