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त्रिपुरा भाषाई संगठन ने कोकबोरोक भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा (Manik Saha) को लिखे पत्र में कोकबोरोक साहित्य परिषद (Kokborok Sahitya Parishad) ने शनिवार को संविधान की आठवीं अनुसूची में कोकबोरोक भाषा (Kokborok language) को शामिल करने की मांग की.

आदिवासी साहित्यिक संस्था ने कहा कि कोकबोरोक भाषा की लिपि बंगाली या देवनागरी हो सकती है.

पत्र में लिखा है, “कोकबोरोक त्रिपुरा के मूल निवासी समुदायों के बीच सबसे पुरानी और सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है. यह आदिवासी आबादी के लिए सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, इतिहास और पहचान का एक महत्वपूर्ण माध्यम है. अपनी समृद्ध विरासत और व्यापक उपयोग के बावजूद भाषा को अभी तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिली है, जो राष्ट्रीय स्तर पर इसके संरक्षण, विकास और प्रचार के लिए महत्वपूर्ण है.”

पत्र में आगे लिखा है, “यहां यह उल्लेख करना उचित है कि कोकबोरोक को देवनागरी या बंगाली लिपि में सही और उचित तरीके से लिखा जा सकता है, और बंगाली लिपि में लिखे जाने का इसका स्वर्णिम इतिहास है. अधिकांश कोकबोरोक विद्वान बंगाली लिपि में कोकबोरोक लिखते रहे हैं.”

हालांकि, टिपरा मोथा के संस्थापक प्रद्योत किशोर देबबर्मा (Pradyot Kishore Debbarma) ने इस सिफारिश को दुखद, चौंकाने वाला और अस्वीकार्य करार दिया.

अपने सोशल मीडिया हैंडल पर उन्होंने लिखा, “कोकबोरोक लिपि का निर्णय लोगों की इच्छा से किया जाएगा, न कि उन तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा, जो मूल निवासी छात्रों के लिए बोलने का साहस नहीं रखते हैं.”

प्रद्योत किशोर ने स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्हें बंगाली भाषा से कोई दुश्मनी नहीं है और लिखा, “मैं देवनागरी लिपि (कोकबोरोक भाषा के लिए) समझ सकता हूं. लेकिन जब बंगाली समुदाय बेहतर संभावनाओं के लिए हिंदी और अंग्रेजी की ओर जा रहा है, तो बंगाली लिपि के लिए क्यों जोर दिया जा रहा है?”

उन्होंने पूर्वोत्तर की भाषाओं में इसके व्यापक उपयोग के कारण रोमन लिपि में कोकबोरोक लिखने की आवश्यकता पर जोर दिया.

पिछले महीने 8 मार्च को प्रद्योत देबबर्मा ने कोकबोरोक लिपि मुद्दे को हल करने के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से हस्तक्षेप की मांग की थी.

पिछले महीने TSF ने की थी हड़ताल

वहीं पिछले महीने कोकबोरोक भाषा के लिए आधिकारिक तौर पर रोमन लिपि का उपयोग करने की मांग को लेकर पूर्वोत्तर छात्र संगठन (NESO) का प्रमुख अंग त्विप्रा स्टूडेंट्स फेडरेशन (TSF) ने अनिश्चितकालीन राज्यव्यापी हड़ताल की थी.

टीएसएफ, जिसे भाजपा सरकार की सहयोगी टिपरा मोथा की छात्र शाखा का समर्थन प्राप्त है. उसने यह भी मांग की थी कि कोकबोरोक के लिए सीबीएसई कक्षा 10 और 12 की परीक्षाएं नए सिरे से आयोजित की जाएं क्योंकि कई उम्मीदवारों को खाली उत्तर पुस्तिकाएं जमा करनी पड़ीं. क्योंकि कुछ केंद्रों में निरीक्षकों ने बांग्ला लिपि में कोकबोरोक प्रश्नपत्रों का अनुवाद करने से इनकार कर दिया था.

हालांकि, हड़ताल शुरू होने के कुछ घंटे बाद ही मुख्यमंत्री साहा ने जनता को आश्वासन दिया था कि इस मुद्दे को जल्द ही सुलझा लिया जाएगा.

विधानसभा में लिपि मुद्दे पर बोलते हुए सीएम साहा ने कहा था, ‘यह सरकार समाधान की सरकार है. हम सभी लोगों के विचारों, संस्कृति, परंपराओं और भाषाओं का सम्मान करते हैं.’

इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था कि कोकबोरोक भाषा के लिए रोमन लिपि शुरू करने सहित आदिवासियों की कई मांगों को पूरा करने के लिए पिछले साल नई दिल्ली में केंद्र, राज्य और टिपरा मोथा के बीच एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं.

आदिवासियों की प्रमुख भाषा

कोकबोरोक त्रिपुरा के 19 आदिवासी समुदायों में से अधिकांश की भाषा है. इस भाषा का इतिहास समृद्ध है और यह पूर्वोत्तर राज्य की आधिकारिक भाषाओं में से एक है लेकिन इसकी कोई आधिकारिक मान्यता प्राप्त स्वदेशी लिपि नहीं है.

कोकबोरोक रोमन और बांग्ला दोनों लिपियों में लिखी जाती है.

पिछले साल जब त्रिपुरा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. धनंजय गण चौधरी ने लिपि के मुद्दे पर कई बार बहस की तो काफी विवाद हुआ था. आखिरकार राज्य सरकार ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि छात्र रोमन और बांग्ला दोनों लिपियों में कोकबोरोक परीक्षा दे सकते हैं.

इससे पहले लिपि के मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए पूर्व विधायक श्यामा चरण त्रिपुरा और भाषाविद् पवित्र सरकार की अध्यक्षता में दो अलग-अलग आयोग गठित किए गए थे.

2018 में राज्य में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से पार्टी के कुछ वर्गों द्वारा कोकबोरोक के लिए देवनागरी लिपि अपनाने पर जोर दिया गया है, जिसकी अन्य राजनीतिक दलों, छात्रों, भाषा कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की ओर से तीखी आलोचना की गई है.

कोकबोरोक भाषा को बचाने के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं. पिछले करीब 40 सालों में लगभग एक दर्जन से ज़्यादा बार इस भाषा की लिपि को लेकर फैसले बदले हैं.

त्रिपुरा में लंबे समय तक सत्ता में रही वामपंथी मोर्चा की सरकार इस भाषा की बांग्ला लिपि के पक्ष में थी. लेकिन यहां के आदिवासी संगठन और राजनीतिक दल रोमन स्क्रिप्ट चाहते हैं.

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