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शोम्पेन: क्या बच पाएंगे प्रकृति के ये मासूम बच्चे?

ग्रेटर निकोबार द्वीप पर ₹92,000 करोड़ की लागत से एक मेगा-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की शुरुआत होने जा रही है. सामरिक और आर्थिक दृष्टि से इस बेहद महत्वपूर्ण योजना के पीछे एक बड़ा मानवीय संकट छुपा है.

‘मैं भी भारत’ के इस विशेष वीडियो में हम यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह विशालकाय प्रोजेक्ट भारत की सबसे संवेदनशील और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) में से एक—शोंपेन (Shompen) जनजाति के अस्तित्व को कैसे खतरे में डाल रहा है.

हज़ारों सालों से बाहरी दुनिया से अलग-थलग रह रही शोंपेन एक अर्ध-घुमंतू (semi-nomadic) जनजाति है, जिसकी आबादी अब महज़ 240 के आसपास बची है.

सरकार की इस योजना में एक विशाल इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट और एक नया शहर (टाउनशिप) बनाना शामिल है.

लेकिन विशेषज्ञ और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे लेकर बेहद चिंतित हैं.

आधुनिक बीमारियों के खतरे से लेकर उनके पारंपरिक शिकार क्षेत्रों (ancestral hunting grounds) के उजड़ने तक—यह वीडियो राष्ट्रीय विकास और आदिवासियों के अस्तित्व के बीच छिड़े इस जटिल संघर्ष का विश्लेषण करता है.

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