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आदिवासी बाज़ार और हिंदुत्व की राजनीति का टकराव क्यों?

महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले की धड़गांव तहसील में बकरे, मुर्गे और बकरों का बाज़ार लगता है. इसके अलावा यहां बैलों का एक बड़ा बाज़ार लगता है.

बैलों के इस बाज़ार में आकर पता चलता है कि अभी भी बैल भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम है. यहां के आदिवासी अपने बैलों को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखते हैं.

इस बाज़ाप में बैले व्यापार के लिए तो लाए ही जाते हैं, लेकिन कुछ किसान अपने बैलों को प्रदर्शन भर के लिए ले आते हैं.

यह बैलों का हाट महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच ग्रामीण व्यापार की चेन का एक अहम पड़ाव है. यहां पर मौजूद किसानों ने बताया कि यहां के पहाड़ों में दरअसल छोटे बैल इस्तेमाल होते हैं.

इसलिए यह इलाका बैलों की ट्रेनिंग ग्राउंड माना जाता है. जैसे ही बैलों का साइज़ बड़ा हो जाता है, ये बैल मैदानी इलाकों में भेज दिए जाते हैं.

इस बाज़ार में कई आदिवासी किसानों से हमने शिकायत सुनी की अब बैलों का व्यापार मुश्किल और ख़तरनाक हो गया है. क्योंकि अब हिंदूवादी संगठन गाय की रक्षा के नाम पर बैलों के व्यापारियों को तंग करते हैं.

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