Site icon Mainbhibharat

ओडिशा की कंध जनजाति का जीवन, दर्शन और परंपराएं ख़ास हैं

ओडिशा की कुल 62 अनुसूचित जनजातियों में से कंध जनजाति (Kandha Tribe) जनसंख्या की दृष्टि से सबसे बड़ी है. इस लिहाज से यह राज्य और देश दोनों स्तरों पर एक प्रमुख जनजाति मानी जाती है.

वैसे तो इनकी जनसंख्या पूरे ओडिशा में बिखरी हुई है लेकिन इनका मुख्य केंद्र दक्षिण ओडिशा है. भौगोलिक रूप से इनका मुख्य गढ़ पूर्वी घाट क्षेत्र के मध्य भाग (बौध और कंधमाल जिले), रायगड़ा क्षेत्र और दक्षिण-पश्चिमी भाग (पूर्ववर्ती काशीपुर और महुलपाटना क्षेत्र) में है.

‘कंध’ शब्द तेलुगु भाषा के ‘कोंडा’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ ‘छोटी पहाड़ी’ या ‘पहाड़ी निवासी’ होता है. मूल रूप से वे पहाड़ी निवासी थे. ‘कंध’ नाम उन्हें गैर-जनजातीय लोगों द्वारा दिया गया है, जिसे समय के साथ जनजातीय लोगों ने स्वीकार कर लिया.

हालांकि, वे खुद को ‘कुई लोकु’, ‘कुई एंजु’ या ‘कुइंगा’ के रूप में पहचानते हैं, क्योंकि वे द्रविड़ भाषा परिवार की ‘कुई’ या ‘कुवी’ भाषा बोलते हैं.

कुई और कुवी दो क्षेत्रीय भाषाई विविधताएं हैं. कुवी मुख्य रूप से अविभाजित कोरापुट, कालाहांडी और बोलांगिर जिलों के कंधों द्वारा बोली जाती है. जबकि कुई कंधमाल (फूलबणी) जिले के कंधों द्वारा बोली जाती है.

कुवी भाषा की संरचना अधिक मूल प्रतीत होती है, जबकि कुई इसका परिवर्तित रूप है.

कंध समाज के प्रमुख उप-वर्ग

सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं के आधार पर कंध जनजाति को कई उप-समूहों में विभाजित किया गया है. जैसे- देसिया कंध, डोंगरिया कंध, कुटिया कंध, सिथा कंध, बुडा कंध, पेंगो कंध, मालुआ कंध आदि.

इनमें से दो उप-समूहों (कुटिया कंध और डोंगरिया कंध) को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में चिन्हित किया गया है.

• कुटिया कंध (Kutia Kandha): इनका नाम उनके मकान के फर्श (‘कुट्टी’) के आधार पर पड़ा है, जो गांव की सड़क से लगभग 2 फीट नीचा होता है. ये मुख्य रूप से कंधमाल जिले के तुमूड़ीबंध ब्लॉक और कालाहांडी जिले के लांजीगढ़ ब्लॉक में निवास करते हैं.

• डोंगरिया कंध (Dongria Kandha): कुवी भाषा में ‘डोंगर’ का अर्थ ‘पहाड़’ होता है. ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करने के कारण इन्हें डोंगरिया कंध कहा जाता है. ये मुख्य रूप से रायगड़ा जिले के विशमकटका और मुनिगुड़ा ब्लॉक में पाए जाते हैं.

• सिथा कंध (Sitha Kandha): ये पारंपरिक रूप से टोकरी बनाने का काम करते हैं.

• मालुआ कंध (Malua Kandha): पहाड़ी क्षेत्रों में समूहों में रहने की अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं.

• देसिया कंध (Desia Kandha): ये मैदानों में निवास करते हैं, इसलिए इन्हें देसिया कंध कहा जाता है.

• पेंगो कंध (Pengo Kandha): यह वह समूह है जो ‘बेंगो’ (मेढक) शब्द का उच्चारण ‘पेंगो’ करते हैं और पारंपरिक रूप से मेंढक का मांस पसंद करते हैं.

जनसंख्या

2001 की जनगणना के अनुसार, कंध जनजाति की कुल जनसंख्या 13 लाख 95 हज़ार 643 (पुरुष: 6,88,402 एवं महिला: 7,07,241) है. यह संख्या ओडिशा की सभी 62 जनजातियों में सबसे अधिक है. कंध जनजाति राज्य की कुल जनजातीय आबादी का 17.13 फीसदी हिस्सा निर्मित करती है.

पहनावा एवं आभूषण

कंध जनजाति का पहनावा बेहद साधारण होता है. पारंपरिक रूप से महिलाएं कपड़े के दो टुकड़े (सिंदा) पहनती थीं. एक कमर से घुटनों तक और दूसरा शरीर के ऊपरी हिस्से के लिए. हालांकि, अब कंध महिलाएं स्थानीय बाजार में उपलब्ध साड़ी पहनना पसंद करती हैं.

महिलाएं विभिन्न प्रकार के आभूषणों से स्वयं को सजाना पसंद करती हैं, जैसे कि रंगीन मनकों का हार (सुरसुरिया माली), चांदी का कड़ा (बाला), हंसुली/गर्दन का बैंड (गोगला), नथनी (नाक पुटुकी), हेयरपिन (पुजुपाका), और कान की बाली (किचेडका).

पारंपरिक रूप से कंध महिलाओं के चेहरे पर कई तरह के गोदना गुदवाने का रिवाज रहा है. लेकिन नई पीढ़ी की महिलाओं में अब गोदना का प्रचलन कम हो रहा है.

पुरुष पारंपरिक रूप से धोती और गंजी (बनियान) पहनते हैं. विशेष अवसरों पर सिर पर पगड़ी भी बांधी जाती है. विवाह समारोह के दौरान दूल्हा रंगीन पगड़ी धारण करता है.

बस्ती और घर की बनावट

आमतौर पर कंध गांव चारों ओर से पहाड़ों (सरू) से घिरे होते हैं. उनकी बस्तियों का स्वरूप छितरा हुआ (scattered) होता है, जिसमें घरों से सटे बड़े-बड़े खेत होते हैं. इन जमीनों पर वे सब्जियां, हल्दी (सिंगा), कटहल (पोनोसी), खजूर (ताड़ी) और सल्प (मडा) के पेड़ उगाते हैं.

आम (महा) के बाग और महुआ (इर्पी) के पेड़ गांव की सीमाओं पर पाए जाते हैं.

गांव में एक-दूसरे को काटती हुई कई पगडंडियां होती हैं. एक गांव में कई टोले या हैमलेट होते हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से ‘साही’ या ‘पाड़ा’ कहा जाता है.

आमतौर पर नया घर (ईडू) फरवरी (माघ), मार्च (फागन), अप्रैल (वैशाख) या मई (जेठ) के महीने में बनाया जाता है.

घर बनाने के लिए स्थान चयन के लिए परिवार के बुजुर्ग पुरुष रात के समय प्रस्तावित स्थल पर जाते हैं. वे अपने साथ अरवा चावल (प्रांगा), महुआ की शराब (इर्पी कालू) और सियाली के पत्तों से बने कप (पैरी आका) ले जाते हैं.

वे वहां पत्तों के दोने (चौकुनी) में चावल और शराब डालकर अपने पूर्वजों को अर्पित करते हैं. अगली सुबह वे दोबारा स्थल की जांच करते हैं. अगर चावल के दाने सुरक्षित और व्यवस्थित मिलते हैं, तो स्थान को शुभ माना जाता है.  

लेकिन अगर चावल के दाने बिखरे हों, तो उसे बुरी आत्माओं (दोई पिडेरी) की उपस्थिति मानकर अशुभ माना जाता है.

शुभ स्थान पर वे धरती माता को मुर्गी की बलि देकर घर का निर्माण शुरू करते हैं.

घर की दीवारें साल की लकड़ी के तख्तों और बांस की खपच्चियों से बनाई जाती हैं जिन पर मिट्टी का लेप लगाया जाता है. छत पर जंगली घास का छप्पर होता है. घर की ऊंचाई 10 फीट से अधिक नहीं होती और दरवाजा लगभग 4 फीट ऊंचा होता है.

घर में एक या दो कमरे, एक अलग रसोई और पीछे मवेशियों के लिए गोशाला होती है.

घर के आगे और पीछे संकरा बरामदा होता है, जहां धान कूटने की ढेंकी होती है. आगे का बरामदा बैठक और आराम के लिए प्रयोग किया जाता है.

दीवारों को लाल मिट्टी से पोता जाता है. घर के भीतर हल, जूआ, कुदाल, हंसिया, सूप और शिकार के हथियार (धनुष-बाण, कुल्हाड़ी, भाला) रखे जाते हैं. वर्तमान में इंदिरा आवास योजना के तहत पक्के मकानों का निर्माण भी हो रहा है.

आजीविका एवं खान-पान

कंध मुख्य रूप से खेती-किसानी करते हैं. वे पहाड़ियों पर झूम खेती (‘दाही’) और घाटियों व निचले मैदानों में हल से खेती करते हैं. वे तीन प्रकार की भूमि पर खेती करते हैं- धीपा (ऊपरी भूमि), बरेना और सारदा. वे धान, रागी, मक्का, उड़द, अरहर, तिल, सरसों, सेम आदि उगाते हैं.

वन उत्पाद संग्रह इनकी आजीविका का बड़ा साधन है. वे इमारती लकड़ी, जलावन, बांस, केंदू पत्ते, सियाली की लताएं, महुआ के फूल, साल के पत्ते, हरड़ा, बहेड़ा, इमली, सल्प और खजूर का रस इकट्ठा करते हैं. केंदू और साल के पत्तों से दोने और पत्तल बनाकर बेचे जाते हैं.

पखाला (पानी भात) कंध जनजाति का मुख्य भोजन है. वे दिन में तीन बार भोजन करते हैं. सुबह पखाला, दोपहर में उबला चावल और रात में चावल के साथ सब्जी या साग लेते हैं. वे मक्का, कंदमूल, छत्रक (मशरूम), मछली, मुर्गी, मटन और जंगली सूअर का मांस भी खाते हैं.

महुआ की शराब, सल्प का रस (मडा कालू) और खजूर की ताड़ी इनके प्रिय पेय हैं. महुआ शराब का उपयोग औषधि और पूजा-अनुष्ठान में प्रसाद के रूप में भी होता है.

धार्मिक विश्वास एवं अनुष्ठान

कंध प्रकृतिवादी और जीववादी (Animism) होते हैं. इनकी सर्वोच्च देवी धरती माता (‘दर्णी पेनू’) हैं. इसके अलावा वे सरू पेनू (पर्वत देवता), सुगा पेनू (झरना देवता), पिजू पेनू (वर्षा देवता), नाजू पेनू (ग्राम देवता), बिले पेनू (सूर्य देवता), पिलानू पेनू (शिकार देवता) आदि की पूजा करते हैं.

धार्मिक अनुष्ठानों को जानी, झंकार, देहुरी, बाहका और माटी गुरु करते हैं. ‘माटी गुरु’ मुख्य रूप से धरती माता की पूजा करते हैं.

मेढ़िया पर्व (Meriah Festival) कंध जनजाति की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है. प्राचीन काल में इस अवसर पर नरबलि (Human Sacrifice) दी जाती थी, जिसे ब्रिटिश काल में प्रतिबंधित कर दिया गया. वर्तमान में नरबलि के स्थान पर पशुओं (भैंस या बकरे) की बलि दी जाती है.

कंध लोग विभिन्न अवसरों पर ‘धांगड़ी-धांगड़ा’ नृत्य और विवाह नृत्य प्रस्तुत करते हैं. वे सींग का बाजा (सिंगा), ढोल (धुला), शहनाई (महेरी), और गोल ड्रम (सांगु) जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग करते हैं. युवा लड़के और लड़कियां पारंपरिक वेशभूषा में एक साथ नृत्य करते हैं, जो उन्हें अपना जीवन साथी चुनने का अवसर भी प्रदान करता है.

कंध अत्यंत सीधे, सरल, ईमानदार और साहसी होते हैं. वे भूमि, जंगल, नदी और देवताओं के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं. वे धोखा देने वाले, भूमि हड़पने वाले और रिश्वतखोर लोगों से सख्त नफरत करते हैं. कंध समाज में महिलाओं को समान सम्मान और अधिकार प्राप्त है.

राजनीतिक व्यवस्था

पारंपरिक रूप से कंधों की अपनी राजनीतिक व्यवस्था थी. ब्रिटिश काल में ‘सरदार’ गांव का वंशानुगत मुखिया होता था, जो कानून-व्यवस्था बनाए रखता था. राजस्व वसूली का काम ‘बिसमांझी’ करता था.

सभी विवादों का निपटारा ‘दर्णी पेनू’ के स्थान पर बैठकर होता था.

वर्तमान में पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने से वार्ड मेम्बर, सरपंच और समिति अध्यक्ष विकास कार्यों की देखरेख करते हैं.

परिवर्तन एवं विकास

पिछले छह दशकों में सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों से कंध समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और बुनियादी ढांचे का काफी विकास हुआ है.

समेकित जनजातीय विकास अभिकरण (ITDA) द्वारा आधुनिक कृषि, उन्नत बीज, सिंचाई और बागवानी योजनाओं को बढ़ावा दिया गया है.

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति विकास विभाग द्वारा एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (EMRS), आश्रम स्कूल और सेवाश्रम स्थापित किए गए हैं, जिससे साक्षरता और जीवनशैली में व्यापक सुधार आया है.

स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से शिशु मृत्यु दर में भारी कमी आई है.

भुवनेश्वर स्थित जनजातीय कला एवं कलाकृति संग्रहालय (SCSTRTI) में कंध जनजाति के पारंपरिक औजारों, हथियारों, आभूषणों और हस्तशिल्प को संरक्षित प्रदर्शित किया गया है.

Exit mobile version