Site icon Mainbhibharat

धरुआ आदिवासी: उत्पत्ति, इतिहास और सामाजिक बनावट

धरुआ (Dharua) या धरुआ गोंड भारत की प्राचीन जनजातीय समुदायों में से एक मानी जाती है. इस समुदाय  को गोंड जनजाति का एक उपसमूह बताया जाता है. 

धरुआ जनजाति का इतिहास, संस्कृति और सामाजिक जीवन भारतीय आदिवासी विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं.  यह समुदाय मुख्य रूप से ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों में रहता है.

धरुआ को ओडिशा के ही कई इलाकों में अलग अलग नाम से पुकारा जाता है. मसलन कहीं इनको दुरुआ तो कहीं धुर्वा भी कहा जाता है. इस आदिवासी समुदाय के नाम के उच्चारण के इस फ़र्क ने कई परिवारों के लिए अनुसूचित जनजाति (List of Scheduled Tribes) का प्रमाणपत्र पाना मुश्किल बना दिया था.

धरुआ आदिवासियों के ऐसे परिवारों के लिए वर्ष 2024 एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना. इस साल भारत सरकार ने लंबे समय से चली आ रही एक ऐतिहासिक विसंगति को दूर करने के लिए संसद में संशोधन विधेयक पास कराया. इस संशोधन के तहत दुरुआ (Durua), धुरुआ (Dhurua) और धुरावा (Dhurava) को अनुसूचित जनजाति सूची  में पहले से दर्ज धुरुआ, धुरुबा और धुर्वा समुदायों के उपसमूहों (Sub-sects) और पर्यायवाची नामों (Synonyms) के रूप में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया.

धरुआ समुदाय विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता रहा है. ओडिशा के कोरापुट, नवरंगपुर, मलकानगिरी और रायगड़ा जैसे जिलों में अनेक लोग स्वयं को दुरुआ या धुरुआ के रूप में पहचानते हैं. 

लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में कहीं धरुआ, कहीं धुर्वा और कहीं अन्य स्थानीय नाम दर्ज रहे हैं. 2024 के संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे यह आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया कि धरुआ समुदाय के विभिन्न स्थानीय नाम और उपसमूह वास्तव में एक ही जनजातीय समूह के हिस्से हैं. 

इस संशोधन के लागू होने के बाद दुरुआ, धुरुआ और धुरावा नाम से पहचाने जाने वाले समुदायों के सदस्य अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाली सभी सुविधाओं और अधिकारों के पात्र होंगे. 

इन अधिकारों और सुविधाओं में शिक्षा में आरक्षण, सरकारी नौकरियों में आरक्षण, छात्रवृत्तियां, छात्रावास सुविधाएं, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम से रियायती ऋण, राष्ट्रीय फेलोशिप, विदेश अध्ययन छात्रवृत्ति तथा अन्य जनजातीय कल्याण योजनाओं का लाभ शामिल है.

उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

धरुआ समुदाय को गोंड जनजाति की एक अंतर्विवाही (Endogamous) शाखा माना जाता है. विभिन्न मानवशास्त्रियों और औपनिवेशिक काल के शोधकर्ताओं ने इस समुदाय का उल्लेख अलग-अलग नामों से किया है.

ब्रिटिश काल के प्रसिद्ध मानवशास्त्री ई. टी. डाल्टन ने 1872 में सिंहभूम क्षेत्र में रहने वाले गोंड समुदायों का वर्णन करते हुए धरुआ लोगों का उल्लेख किया था. वहीं एच. एच. रिस्ले ने 1891 में धरुआ को गोंडों की एक उपजाति बताया, जो नदियों की रेत से सोना निकालने के कार्य में संलग्न रहती थी.

आर. वी. रसेल और हीरालाल ने 1916 में इस समुदाय को “धुर गोंड” के नाम से संबोधित किया। बाद में कई शोधकर्ताओं ने धरुआ को गोंड समुदाय का एक विशिष्ट समूह माना, जिसकी अपनी अलग सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान है.

धरुआ जनजाति मुख्य रूप से ओडिशा के दक्षिण-पश्चिमी जिलों में निवास करती है। मलकानगिरी, कोरापुट और नवरंगपुर जिले इनके प्रमुख निवास क्षेत्र हैं। इसके अतिरिक्त बोलांगीर, संबलपुर, कालाहांडी, नुआपाड़ा, मयूरभंज, बरगढ़ और बालासोर जिलों में भी इनकी आबादी पाई जाती है.

ओडिशा के अलावा झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में भी धरुआ समुदाय के लोग रहते हैं। विभिन्न राज्यों में निवास करने के कारण इनके रीति-रिवाजों और बोलियों में कुछ स्थानीय भिन्नताएं देखने को मिलती हैं.

सामाजिक संरचना

धरुआ समाज पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था (Customary Law System) से चलता है. परिवार उनके सामाजिक जीवन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है. इस आदिवासी समुदाय के भीतर विवाह के नियम और सामाजिक परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं. यहं विवाह आमतौर पर समुदाय के भीतर ही किए जाते हैं, हालांकि आधुनिक समय में सामाजिक बदलावों का प्रभाव भी दिखाई देता है.

धरुआ जनजाति की संस्कृति प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है. उनके त्योहार, गीत, नृत्य और धार्मिक विश्वास प्रकृति के प्रति सम्मान और सामुदायिक जीवन की भावना को दर्शाते हैं. फसल कटाई, वर्षा और कृषि चक्र से जुड़े अनेक उत्सव उनके जीवन का हिस्सा हैं.

Exit mobile version