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बगता जनजाति: उत्पत्ति, जीविका और आस्था की कहानी

भारत के आदिवासी समुदाय के सामाजिक संगठन, संस्कृति और भाषा के मामले में अपनी विशिष्ट जातीय विशेषताएं हैं. आज हम ऐसी ही ओडिशा की एक जनजाति (tribe) है ‘बगता’ (Bagata tribe).

इसके अलावा भोक्ता, भोगता और भगता कुछ ऐसे पर्यायवाची शब्द हैं जिनसे उन्हें जाना जाता है.

जबकी ओडिशा के पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में उन्हें कांपू के नाम से जाना जाता है.

‘बगता’ नाम बोक्ता शब्द से लिया गया माना जाता है, जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जो बुद्धिमान नहीं है.

हालांकि, बगता समुदाय के लोग किंवदंतियों और ऐतिहासिक परंपराओं का हवाला देते हुए अपने नाम की उत्पत्ति ‘भक्त’ से बताते हैं.

इस समुदाय के ज़्यादातर लोग मछली पकड़ने में कुशल होते हैं. इसलिए आज के युग में उन्हें मछुआरा समुदाय ही माना जाता है.

अपनी आस्था के अनुसार, बगता मुख्य रूप से अब हिन्दू धर्म का ही पालन करता है. इनमें से एक समूह हिन्दू समुदायों की तरह ही मृतकों का दाह संस्कार करता है. जबकि एक समूह शवों को दफ़नाता है.

बगता जनजाति के लोग मध्यम कद-काठी के होते हैं, जिनकी नाक चौड़ी और शारीरिक बनावट अच्छी होती है, जो दक्षिण और मध्य भारत की प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉइड जनजातियों के जैविक लक्षणों को दर्शाते हैं.

सीरोलॉजिकल जांच (Serology Test) से पता चलता है कि उनमें बी की तुलना में ए ब्लड ग्रुप का अनुपात थोड़ा अधिक है.

जनसंख्या

यह समुदाय जनसंख्या के आधार पर एक छोटा समुदाय ही कहा जाएगा. इनकी जनसंख्या ओडिशा के सभी अविभाजित 13 जिलों में फैली हुई है, लेकिन वे मुख्य रूप से सुंदरगढ़ जिले में केंद्रित हैं.

इसके बाद मयूरभंज, संबलपुर और बालेश्वर जिले आते हैं. इसके अलावा, कोरापुट जिले में भी बगता समुदाय की अच्छी-खासी संख्या पाई जाती है.

1961 की जनगणना के मुताबिक ओडिशा में बगता की कुल जनसंख्या 1,511 (756 पुरुष, 755 महिलाएं) थी, जो 1971 की जनगणना में घटकर केवल 262 (131 पुरुष, 131 महिलाएं) रह गई.

लेकिन ऐसा लगता है कि जनसंख्या में यह गिरवाट त्रुटिपूर्ण गणना के कारण हुआ था.

1981 की जनगणना में उनकी जनसंख्या लगभग 10 गुना बढ़कर 2,614 (1,310 पुरुष, 1,304 महिलाएं), 1991 की जनगणना में 4,806 (2,490 पुरुष और 2,316 महिलाएं).

2001 की जनगणना में 6,733 (3,331 पुरुष, 3,402 महिलाएं) हो गई, जिसमें प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,021 महिलाओं का लिंगानुपात दर्ज किया गया.

इस प्रवृत्ति को जारी रखते हुए, 2011 की जनगणना में उनकी कुल जनसंख्या 8,813 (4,323 पुरुष, 4,490 महिलाएं) और लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,039 महिलाओं के साथ सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई.

साक्षरता

1961 की जनगणना के अनुसार बगता समुदाय की साक्षरता दर केवल 8.4% थी. लेकिन 1981 की जनगणना के बाद से उनकी साक्षरता दर में लगातार वृद्धि हुई है.

1981 की जनगणना में पुरुष साक्षरता काफी बढ़कर 24.66% हो गई, जो 1991 में बढ़कर 42.62%, 2001 की जनगणना में 52.29% और 2011 की जनगणना में 64.31% तक पहुंच गई.

इसी तरह, 1981 में उनकी महिला साक्षरता दर केवल 6.44% थी, जो 1991 में बढ़कर 15.27%, 2001 में 25.17% और 2011 में ये बढ़कर 43.48% हो गई.

इससे पता चलता है कि ओडिशा सरकार द्वारा अपनाए गए मुफ्त शिक्षा कार्यक्रम का इस जनजाति और विशेष रूप से उनकी महिलाओं पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा है.

भाषा

उड़िया उनकी मातृभाषा है जिसके माध्यम से वे अपने लोगों के साथ-साथ बाहरी लोगों से भी बातचीत करते हैं. कुछ बगता लोग लरिया, सादरी और हिंदी भी बोल सकते हैं.

पहनावा और आभूषण

बगता समुदाय के पास कुछ अन्य जनजातियों की तरह अपनी पहचान बताने के लिए कोई विशेष पोशाक नहीं है. उनका व्यक्तिगत पहनावा पड़ोसी जाति के लोगों जैसा ही है.

पुरुष धोती, बनियान, कमीज या पायजामा पहनते हैं. उनके आभूषण बहुत साधारण और सामान्य हैं, जैसे कि धातु की अंगूठियां और गले में जंजीर, जो प्रथागत नहीं है बल्कि व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करती है. इसके अलावा, वे जनेऊ (पइता) भी पहनते हैं. छोटे बच्चे लंगोट पहनते हैं.

अन्य जनजातियों की महिलाओं की तरह बगता महिलाओं के पास भी कोई अलग पोशाक और आभूषण नहीं हैं. पड़ोसी जाति की महिलाओं की तरह, वे साड़ी, साया, ब्लाउज और बहुत कम आभूषण जैसे झुमके, अंगूठियां, बिछिया, हार आदि पहनती हैं.

बुजुर्ग महिलाओं की बाहों और पैरों पर गोदना बने होते हैं, जो अब युवा पीढ़ी के बीच चलन से बाहर हो गए हैं.

आवास, बस्ती और मकान

बगता लोग बहु-जातीय और एकल-जातीय दोनों प्रकार के गांवों में रहते हैं जो मैदानी इलाकों के साथ-साथ पहाड़ी इलाकों में भी स्थित हैं. उनके निवास क्षेत्र में आर्द्रता और मध्यम वर्षा के साथ मध्यम जलवायु होती है.

बहु-जातीय गांवों में वे अन्य जातियों और जनजातियों के साथ रहते हैं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखते हुए अलग-अलग मोहल्लों में निवास करते हैं. एक जनजातीय समुदाय होने के नाते, उनके साथ अनुसूचित जातियों या सामाजिक रूप से उच्च रैंक वाली जातियों और जनजातियों की तरह सामाजिक भेदभाव नहीं किया जाता है.

बगता जनजाति की बस्ती और मकान का ढांचा पड़ोसी समुदायों से अलग नहीं है. उनके पारंपरिक मकान साधारण कच्चे छप्पर, मिट्टी की दीवारें और खपरैल की छत वाले दो या दो से अधिक कमरों के मकान होते हैं जिनमें एक बरामदा होता है जो बहुत सारे काम के लिए  इस्तेमाल होता है. कमरों में से एक का उपयोग रसोई के रूप में किया जाता है जहां उनके गृह देवताओं और पूर्वजों का पवित्र स्थान होता है.

सभी पारिवारिक अनुष्ठानों में परिवार का मुखिया अदृश्य शक्तियों को शांत करने और परिवार के कल्याण के लिए उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भोजन, फूल और अगरबत्ती चढ़ाकर पूजा करता है. बकरी और मुर्गी जैसे मवेशियों को अलग बाड़े में रखा जाता है.

सामाजिक संगठन

एक अंतर्विवाही समूह (वह सामाजिक प्रथा है जिसमें कोई व्यक्ति अपने ही सामाजिक, धार्मिक, जाति, या नस्लीय समूह के भीतर विवाह करता है) के रूप में बगता समाज कई गोत्रों (वंश) में विभाजित हैं जैसे हथियाड़, बेलहाड़ (बंदर), समुदिया, बामिया, तिरुआर (पक्षी), सरनिया (बांसुरी), चुमियाड़ और कुआरदार.

गोत्र के प्रतीक हाथी, बंदर, पक्षी, बांसुरी आदि हैं. गोत्रों को पुनः कई कुटुंबों (वंशों) में विभाजित किया गया है जो विवाह संबंधों को नियंत्रित करते हैं. वे अपने गोत्र के नामों का उपयोग अपने उपनाम के रूप में करते हैं.

बगता वर्ण व्यवस्था में विश्वास करते हैं और स्थानीय सामाजिक पदानुक्रम में एक स्वच्छ जनजातीय समुदाय के रूप में अपने स्थान का दावा करते हैं। अन्य समुदाय भी उन्हें उच्च क्रम में एक उच्च जनजातीय समूह मानते हैं। पनो, गंडा, डोम्ब, मुची, घासी और हाडी जैसी अनुसूचित जातियों को बगता से सामाजिक स्थिति में नीचा माना जाता है।

उत्तराधिकार के पारंपरिक नियमों का पालन करते हुए पैतृक संपत्ति बेटों के बीच समान रूप से विभाजित की जाती है, लेकिन सबसे बड़े बेटे को एक अतिरिक्त हिस्सा (जेष्ठी भाग) मिलता है.

बेटियों को आमतौर पर पैतृक संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता है, लेकिन मां के आभूषणों से कुछ हिस्सा मिल सकता है.

पिता परिवार का मुखिया होता है और उसकी मृत्यु के बाद बड़ा बेटा उसका उत्तराधिकारी बनता है.

विवाह

बगता समाज विवाह के लिए अपने प्रथागत नियमों का सख्ती से पालन करते हैं. वे विवाह के लिए समुदाय अंतर्विवाह के साथ-साथ वंश बहिर्विवाह के नियमों का पालन करते हैं.

समुदाय द्वारा विवाह की आयु सीमित कर दी गई है, जो लड़कों के लिए बीस से पच्चीस वर्ष और लड़कियों के लिए अठारह से पच्चीस वर्ष तक होती है. अतीत में बाल विवाह का प्रचलन था, लेकिन अब यह प्रथा में नहीं है.

बगता आम तौर पर तीन प्रकार के विवाहों को प्राथमिकता देते हैं जैसे कि आपसी सहमति से विवाह, भागकर विवाह और सेवा द्वारा विवाह.

बातचीत से तय विवाह सामान्य हैं लेकिन कुछ मामलों में भागकर विवाह भी होते हैं. बातचीत से विवाह के मामले में, जब प्रस्ताव आते हैं तो पारंपरिक सामुदायिक परिषद के सदस्यों की उपस्थिति में इसे अंतिम रूप दिया जाता है.

प्राथमिकता के आधार पर लड़के को अपनी ममेरी या फुफेरी बहन (मामा की बेटी) से शादी करनी चाहिए. देवर-भाभी विवाह, विधवा पुनर्विवाह और बहुविवाह का प्रचलन है और तलाक की अनुमति है.

वधु मूल्य (ओली) की संस्था जो अतीत में प्रचलित थी, पड़ोसी हिंदू जातियों के साथ सांस्कृतिक संपर्क के कारण धीरे-धीरे दहेज (वरकटनम) को जगह दे रही है. हालांकि, दूल्हे के माता-पिता को दुल्हन को पर्याप्त आभूषण देने होते हैं.

विवाह समारोह दुल्हन के गांव में एक मंडप में आयोजित किया जाता है. स्थानीय ब्राह्मण या बगता समुदाय का ग्राम पुजारी विवाह अनुष्ठान संपन्न कराता है.

निर्बंध या पिंडानी (सगाई) अनुष्ठान, हस्तगांठी (वर-वधु के हाथों को जोड़ना), और पवित्र अग्नि (होम) जलाने की प्रथा की जाती है. चौठी (नुप्चियल) समारोह समाप्त होने से पहले और पूर्वजों की आत्माओं औरकुल देवताओं की पूजा करने के बाद दूल्हा और दुल्हन को एक-दूसरे को देखने या मिलने की अनुमति नहीं होती है. विवाह का समापन समारोह आठवें दिन आयोजित होने वाला ‘अष्ट मंगला’ उत्सव है.

माथे पर सिंदूर लगाना, लाख या शंख की चूड़ी का उपयोग शादीशुदा महिला की पहचान है. गले में मंगलसूत्र (थाली) लड़की की वैवाहिक स्थिति का प्रतीक है.

आजीविका

खेती-किसानी और ताजे पानी में मछली पकड़ना वे मुख्य स्रोत हैं जिनसे बगता काफी हद तक अपनी आजीविका प्राप्त करते हैं. वे छोटी जोत वाली भूमि के मालिक हैं और उस पर खेती करते हैं. साथ ही अपनी आय को पूरा करने के लिए वन उपज के संग्रह का भी सहारा लेते हैं.

कोरापुट जिले के कोटपाड़ क्षेत्र के बगता अपनी जीविका के लिए झूम खेती पर निर्भर हैं. जबकि कटक और बालेश्वर में वे ताजे पानी में मछली पकड़कर अपना गुजर-बसर करते हैं.

बगता मजदूरी भी करते हैं. यह देखा जा सकता है कि बगता समुदाय के लोगों ने अपने पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार विभिन्न प्रकार के व्यवसायों को अपनाया है.

हालांकि, कुछ बगता व्यापार और व्यवसाय में लगे हुए हैं. वे खजूर के पत्तों से अलग-अलग तरह की टोकरियां और चटाइयां तैयार करते हैं.

महिलाएं सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक क्षेत्रों में विभिन्न भूमिकाएं निभाती हैं लेकिन राजनीतिक स्तर पर नहीं. वे घर के सभी प्रकार के कामों में खुद को शामिल करती हैं जैसे पानी लाना, खाना बनाना, घर और मवेशियों के बाड़े की सफाई करना, बच्चों और पालतू जानवरों की देखभाल करना और मेहमानों का मनोरंजन करना.

बगता महिलाएं ईंधन की लकड़ी इकट्ठा करना, मजदूरी करना और खेत में पुरुष सदस्यों की मदद कर बाहरी काम भी करती हैं. वे पारिवारिक खर्च को नियंत्रित करती हैं. साथ ही बाजार में बिक्री के लिए अपने घर में मुर्मूरा (लाई/मुढ़ी) भी तैयार करती हैं.

खान-पान

बगता मांसाहारी होते हैं. वे मछली, बकरा, मुर्गा और अंडा खाते हैं लेकिन गाय या सुअर का मांस नहीं खाते हैं.

उनके बीच का वैष्णव वर्ग पूरी तरह से शाकाहारी है. चावल उनका मुख्य भोजन है और इसे दाल और सब्जी की करी के साथ लिया जाता है. अरहर और मूंग की दाल अनिवार्य रूप से उनके आहार का प्रमुख हिस्सा बनाती है.

व्यंजनों को छौंकने के लिए नाइजर के बीज के तेल (valasa nune) का उपयोग किया जाता है.

बगता जनजाति अपने इलाके में मिलने वाले मौसमी फलों के शौकीन होते हैं. उत्सव के अवसरों पर वे खीर और पीठा तैयार करते हैं. उनके बीच दालों, सब्जियों और फलों की खपत बढ़ गई है. कुछ बगता लोगों ने रात में चावल के बजाय चपाती खाने की आदत विकसित कर ली है.

कभी-कभी पुरुष स्थानीय बाजार से खरीदकर हंडिया (चावल की शराब), कुशनो, मोदो (महुआ की शराब) और ताड़ी पीते हैं. बगता चाय पीते हैं, तंबाकू पीते हैं और पान चबाते हैं.

सामाजिक नियंत्रण

बगता समाज में सामाजिक नियंत्रण की तंत्र दो-स्तरीय प्रणाली है – एक गांव के स्तर पर और दूसरा क्षेत्रीय स्तर पर.

प्रधान गांव के स्तर पर जाति सभा (पारंपरिक सामुदायिक परिषद) का प्रमुख होता है जिसे डाकुआ (संदेशवाहक) और भला भाई, गांव के बुजुर्गों द्वारा सहायता प्रदान की जाती है.

क्षेत्रीय परिषद को महासभा के रूप में जाना जाता है, जिसकी अध्यक्षता सभापति (अध्यक्ष), संपादक (सचिव) और कोषाध्यक्ष जैसे अधिकारी करते हैं जो परिषद के वित्तीय मामलों को संभालते हैं.

क्षेत्रीय परिषद के अंतर्गत विभिन्न गांवों के ग्राम प्रधानों और संदेशवाहकों के पद वंशानुगत होते हैं, जबकि अन्य पद चुनाव द्वारा, मुख्य रूप से ध्वनि मत से भरे जाते हैं.

सामुदायिक परिषद का मुख्य काम गांव और अंतर-गांव स्तर पर विवाह और अन्य प्रथागत जनजातीय मामलों को विनियमित करना और उसमें उत्पन्न होने वाले विवादों को निपटाना है. पारंपरिक मानदंडों का उल्लंघन, जाति परिषद के अधिकार का अपमान, गाय की हत्या आदि के मामलों में अपराधियों पर सख्त सजा लगाई जाती है. ऐसे मामलों में अपराधियों को भारी नकद जुर्माने या सामाजिक बहिष्कार (जाति बाहर) की सजा दी जाती है.

आज़ादी के बाद सरकार द्वारा वैधानिक ग्राम पंचायत प्रणाली की शुरुआत के साथ पारंपरिक सामुदायिक परिषद का महत्व धीरे-धीरे घट रहा है.

धार्मिक विश्वास और प्रथाएं

बगता जीववाद (animism) के साथ-साथ हिंदू धर्म में भी विश्वास करते हैं और हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं.

बूढ़ा और बूढ़ी के साथ इष्ट देवता को कुल देवता माना जाता है. ग्रामसिरी गांव की देवी हैं.

वे इलाके के हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों में भी जाते हैं. लक्ष्मी पूजा, काली पूजा, मकर संक्रांति, नुआखाई, पुष पुणेई, शीतल षष्ठी, जन्माष्टमी, कर्म आदि जैसे महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार उनके द्वारा पूरी भक्ति के साथ मनाए जाते हैं.

दशहरा के दिन वे मछली पकड़ने की टोकरियों और एक प्रकार के त्रिशूल की भी पूजा करते हैं. त्रिशूल शायद मछली पकड़ने का भाला है जिसका उपयोग बगता मछली पकड़ने के लिए करते हैं.

उत्सव के अवसरों पर घरों की सफाई की जाती है और दीवारों और आंगन को झोटी यानि आल्पना (चावल के आटे से बने डिजाइन) से सजाया जाता है. विशेष स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं और देवताओं को अर्पित किए जाते हैं.

पूजा करने के लिए पाहेन या कुटुंब गंगा (गांव के आदिवासी पुजारी) को आमंत्रित किया जाता है. लेकिन बदलते समय के साथ वे इस काम के लिए ब्राह्मण पुजारियों को बुला रहे हैं.

विभिन्न उत्सव के अवसरों और विवाह समारोहों के लिए बगता के पास कुछ पारंपरिक गीत हैं. इन अवसरों पर पुरुष और महिला दोनों भाग लेते हैं.

परिवर्तन और विकास

परंपरावादी बगता के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक अभिव्यक्तियां उनकी संस्कृति में गहराई से निहित हैं और इस प्रकार परंपरा से बंधी हैं. ये उनके समाज में सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक पहचान और ऐतिहासिक निरंतरता की धारणा से मजबूती से जुड़ी हुई हैं.

दूसरी ओर विकास का अर्थ आर्थिक विकास और सामाजिक विकास है. आर्थिक और सामाजिक विकास एक दूसरे के पूरक हैं.

जनजातीय विकास के संदर्भ में विकास एजेंसी या सरकार को आर्थिक और सामाजिक पहलुओं के बीच संतुलन बनाना होगा और संस्कृति-विशिष्ट होना होगा ताकि विकास प्रयासों का एक समग्र दृष्टिकोण हो सके.

अब बगता के संदर्भ में सरकार के विकास प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव पड़ा है भले ही बगता परंपरा से बंधे हों.

उनकी खराब आर्थिक स्थिति अब उनके रास्ते में कभी नहीं आती है और बगता अपने बच्चों को शिक्षित करने और विकास कार्यक्रमों को स्वीकार करने में रुचि दिखाते हैं. क्योंकि उन्हें एहसास हो गया है कि उनके बीच शिक्षा के प्रसार का लोगों की विकासात्मक जरूरतों की प्राथमिकताओं में एक महत्वपूर्ण स्थान है.

पहले उनकी कम आर्थिक स्थिति उनके बच्चों को प्राथमिक विद्यालय के स्तर से आगे जाने की अनुमति नहीं देती थी और लड़कियां ज्यादातर प्राथमिक स्तर पर ही पढ़ाई छोड़ देती थीं. अब यह स्थिति बदल गई है.

वे सरकार द्वारा शुरू किए गए विभिन्न विकास और कल्याणकारी कार्यक्रमों से अच्छी तरह वाकिफ हैं, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में सुधार हुआ है.

सरकार द्वारा आधुनिक कृषि की शुरुआत, उन्नत किस्म के बीजों की आपूर्ति, सिंचाई सुविधा और उनकी अधिशेष उपज के लिए बाजार सहायता ने उनमें विश्वास पैदा किया है, जिससे उनके बीच परिवर्तन आया है.

उनकी बीमारियों और स्वास्थ्य देखभाल के लिए स्वदेशी तरीकों के उपयोग में बदलाव आया है और वे अब इलाज के आधुनिक और पारंपरिक दोनों तरीकों का उपयोग कर रहे हैं. लेकिन इलाज के आधुनिक तरीकों की ओर अधिक झुकाव रखते हैं.

परिवार नियोजन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्मक और अनुकूल है लेकिन आमतौर पर महिलाएं नसबंदी करवाती हैं. बगता दो या तीन बच्चों वाले छोटे परिवार को पसंद करते हैं.

उन्होंने अपनी स्वच्छता की आदतों में सुधार किया है और नलसाजी, नल-कूपों, सेनेटरी कुओं और अन्य सुरक्षित स्रोतों से पीने का पानी प्राप्त करते हैं.

कुछ संपन्न लोगों के पास रेडियो, टेलीविजन, मोटरसाइकिल, आधुनिक फर्नीचर हैं और शिक्षित लोग समाचार पत्र पढ़ते हैं.

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