ब्राइड प्राइस, बाल विवाह और बहु विवाह की फाँस में भील, भिलाला और बारेला

वक़्त के साथ भील आदिवासी परिवारों में वधु मूल्य जो एक समय प्रतीकात्म होता था, सौदेबाज़ी में तब्दील हो गया है. साधन संपन्न लोगों ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. जिनके पास पैसा और ताक़त है वो बहुविवाह करते हैं और क़ीमत चुका देते हैं.

1
2710

20 साल पहले रैवला सिंह टिकेन्द्री को अपने घर लाए थे. 20 साल, किसी भी रिश्ते के लिए लंबा समय होता है. टिकेन्द्री आज घर की मालकिन है, परिवार के लगभग हर फ़ैसले में उसकी सलाह मायने रखती है. 

रैवला का परिवार एक खाता पीता बारेला आदिवासी परिवार है. उनके पास पर्याप्त ज़मीन है और टिकेन्द्री का हर शौक़ इस परिवार में पूरा हुआ है. लगभग हर फ़सल पकने के बाद टिकेन्द्री अपने मनपसंद चाँदी के ज़ेवर ख़रीदती हैं. लेकिन 20 साल टिकेन्द्री के लिए एक ऐसा नंबर है जो उनके मन में कहीं एक टीस भी पैदा करता है. 

वो अपने पति रैवला से कम से कम 20 साल छोटी हैं. ख़ुशमिज़ाज टिकेन्द्री बातों बातों कई बार यह बात भी कह डालती हैं. वो कहती हैं, “मेरी उम्र इतनी थोड़ी है, ये तो मुझसे बहुत बड़े हैं. मेरी ही बहन से उनकी शादी हुई थी. मेरी तो मर्ज़ी नहीं थी. पर क्या करें हमारे यहाँ तो ऐसा ही होता है.”

टिकेन्द्री रैवला सिंह की पत्नी हैं, लेकिन 20 साल पहले जब वो इस परिवार में आई थीं तो ब्याह कर नहीं लाई गई थीं. लगभग 15 साल की टिकेन्द्री को रैवला भगा लाए थे. रैवला उस वक़्त शादीशुदा थे और उनकी शादी भी टिकेन्द्री की सगी दीदी यानि बड़ी बहन से हुई थी. 

टिकेन्द्री के परिवार ने एतराज़ किया और पंचायत बुलाई. बताया जाता है कि पंचायत में काफ़ी गर्मागर्मी भी हुई थी. लेकिन पंचायत को फ़ैसला रैवला सिंह के हक़ में ही देना पड़ा. इसकी दो स्पष्ट वजह थीं, पहली रैवला सिंह टिकेन्द्री के बदले उसके पिता को मुँह माँगी चाँदी देने को तैयार हो गए थे, दूसरी वजह थी कि रैवला सिंह से ताक़त में टिकेन्द्री के पिता कहीं नहीं टिकते थे. 

पंचायत का फ़ैसला हुआ और टिकेन्द्री को रैवला की पत्नी मान लिया गया. इस पूरे मामले में टिकेन्द्री और उनकी दीदी की राय लेने की कोई ज़रूरत नहीं समझी गई थी. टिकेन्द्री चाहती है कि भील, भिलाला, बारेला आदिवासी समाज में बदलाव आना चाहिए और थोड़ा बहुत बदलाव आया भी है. 

वो कहती हैं “हमारे यहाँ लोग समझते नहीं हैं, बच्चों को पढ़ाना लिखाना चाहिए, लेकिन क्या करें. पहले तो आंगनबाड़ी में 8वीं पास को नौकरी मिल जाती थी. अब नहीं मिलती. पढ़े लिखे लोग आराम की ज़िंदगी जीते हैं. लेकिन हमारे समाज में तो छोटे बच्चों की ही शादी कर देते हैं. “

थरड़पुरा नाम के गाँव में रैसला से मुलाक़ात हुई. खेती किसानी करने वाले रैसला दसवीं क्लास में थे जब उन्होंने स्कूल छोड़ दिया. वजह पूछने पर कहते हैं कि घर में खेती सँभालनी थी इसलिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी. 

लेकिन जब बातचीत होती रहती है तो पता चलता है कि शादी करने के लिए उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी. शादी माँ बाप ने तय नहीं की थी बल्कि वो अपनी ही क्लास में पढ़ने वाली एक लड़की को एक दिन घर ले आए. 

उसके बाद वही हुआ जो समाज में होता है. लड़की के माँ बाप आए और पंचायत में एक रक़म तय कर दी गई जो रैसला ने चुका दी. रैसला की कहानी में एक पॉज़िटिव बात ये है कि उनकी पत्नी शादी के बाद भी पढ़ रही हैं. रैसला बताते हैं “वो ग्वालियर में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही हैं. मैं ही उनकी पढ़ाई का ख़र्च दे रहा हूँ.” 

वो कहते हैं कि उनका एक बच्चा है, बच्चा उनके ही साथ रहता है. 

भील आदिवासी समाज में लड़के और लड़की को अपनी पसंद से शादी करने की पूरी छूट होती है. मेलों, शादी ब्याह, स्कूल या फिर खेतों में काम करते समय मेल मुलाक़ात पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं होती है. 

इसके अलावा अपनी मर्ज़ी से शादी करने वाले लड़के या लड़की को किसी तरह के दंड नहीं दिया जाता है. इसके अलावा अपनी मर्ज़ी से शादी करने वाले लड़के या लड़की के परिवार की प्रतिष्ठा में भी किसी तरह की हानि भी नहीं होती है. प्

प्रेम और अपने जीवन साथी चुनने की यह आज़ादी बेशक क़ाबिले तारीफ़ बातें लगती हैं. लेकिन इसके कई ऐसी बातें हैं जो आपको सोचने पर मजबूर भी करती हैं. 

चिजबा गाँव के सरपंच धन्नालाल मोरे कहते हैं, हमारे समुदाय में अगर आदमी शादीशुदा भी है तो भी वो शादी कर सकता है पर उसे क़ीमत चुकानी पड़ती है. हमारे यहाँ शादी में लड़के का परिवार शादी में लड़की के परिवार को 25 हज़ार रूपए देता है. लेकिन अगर आदमी शादीशुदा है और लड़की को ले जाता है तो फिर उसे ज़्यादा पैसा देना पड़ता है.”

दरअसल वक़्त के साथ भील आदिवासी परिवारों में वधु मूल्य जो एक समय प्रतीकात्म होता था, सौदेबाज़ी में तब्दील हो गया है. साधन संपन्न लोगों ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है. जिनके पास पैसा और ताक़त है वो बहुविवाह करते हैं और क़ीमत चुका देते हैं. 

लेकिन जिनके पास पैसा और साधन नहीं होता है, उस वर्ग में लड़के का परिवार क़र्ज़ में डूब जाता है. हमने कई मामले ऐसे सुने जब लड़का किसी लड़की को भगा लाया और पंचायत ने 2 लाख रूपए ब्राइड प्राइड तय कर दिया. इस सूरत में परिवार बड़े किसान या सेठ से क़र्ज़ लेता है. 

लड़की के परिवार को क़ीमत चुकाने के बाद पूरा परिवार मज़दूरी पर निकल जाता है और बरसों तक क़र्ज़ चुकाने के लिए मज़दूरी करता है, उनकी हालत बिलकुल बँधुआ मज़दूर की होती है. भगा कर लाई गई लड़की भी शादी के अगले ही दिन से मज़दूरी पर लग जाती है. 

झाबुआ के एक भील आदिवासी गाँव में हमारी मुलाक़ात कमल खराड़ी के परिवार से हुई. उनके घर पर हम भील आदिवासियों के खान-पान के बारे में एक रिपोर्ट तैयार करने के सिलसिले में पहुँचे थे. 

लेकिन बातों बात उनकी पत्नी ने हमें बताया कि उनके बेटे की शादी तय हो गई है. बेटा अभी ने अभी नौवीं क्लास पास की है. जब हमने उनसे इतनी जल्दी शादी करने की वजह पूछी तो उनका कहना था कि अगर लड़का किसी लड़की को ले आया तो परिवार को इसके लिए भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है. 

जब परिवारों के बीच रिश्ते तय होते हैं तो मुश्किल से 25-50 हज़ार रूपए ही ख़र्च होते हैं. 

भील समाज की बहादुरी, रिश्तों में गर्मजोशी, मेहनती जो पानी को मोहताज ज़मीन से फ़सल उगाते हैं. जो प्रेम करने वाले अपने बच्चों की हत्या नहीं करते, कठिन हालातों में भी मुस्कराते हैं. ये बातें इस समाज को बेहद ख़ास बनाती हैं. 

शादी की सही उम्र, बहु विवाह या फिर ब्राइड प्राइस इन सब मामलों पर बात करते हुए भील समाज को किसी और समाज के नज़रिए से देखना या फिर तथाकथित आधुनिक समाज के जीवन मूल्य पर इन मसलों को तोलना ग़लत नतीजों पर पहुँचा सकता है. 

इसके बावजूद मध्य प्रदेश के कई ज़िलों में भील आदिवासी परिवारों से मिलने के बाद यह महसूस ज़रूर हुआ कि इस समाज के लिए ये मसले हैं और इनसे नज़रें नहीं चुराई जा सकती हैं.  

1 COMMENT

Leave a Reply to भील पंचायत में 4 मौतें, पुलिस को नहीं दी गई ख़बर - mainbhibharat Cancel reply

Please enter your comment!
Please enter your name here