100 साल से वक़्त यहाँ थम गया है, कोरापुट में आदिवासियों के गाँव की कहानी

मानव सभ्यता के विकास के क्रम में यह एक अहम मशीन थी, जिसने इंसान के काम को आसान बनाया था, शायद जैसे पहिए का अविष्कार महत्वपूर्ण था, वैसे ही सभ्यता के लिए इस मशीन का निर्माण भी सभ्यता की एक बड़ी उपलब्धि रही होगी.

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कोरापुट का ताल्लुर गाँव जंगल में बसा है. गाँव को भी जंगल ही कह सकते हैं. इमली का जंगल, इमली के भारी भारी पेड़ों से गाँव भरा पड़ा है. इन पेड़ों पर इमली लदी हुई थी.

हम गाँव में आगे बढ़े तो किसी घर से ढेकी की आवाज़ आ रही थी. शायद कहीं ढेकी से धान या रागी कूटी जा रही थी. हमने अपने साथ मौजूद प्रफुल्ल जी को सबसे पहले हमें उसी घर ले चलने का आग्रह किया.

प्रफुल्ल जी कोरोपुट के एक प्राइमरी टीचर हैं. इन आदिवासी इलाक़ों में उनकी अच्छी जान-पहचान है. उनके साथ हम उस घर पहुँच गए. घर का मुख्य दरवाज़ा यानि गली से घर में प्रवेश का रास्ता बड़े से आँगन में ले जाता है.

दाईं तरफ़ रसोई है और बाईं तरफ़ ढेकी लगी थी. घर के पीछे की तरफ़ खुला है कोई दीवार या बाड़ नहीं है. यानि गली की तरफ़ से दीवार है और दरवाज़ा भी लगाया गया है और जंगल की तरफ़ घर खुला है.

आमतौर मुख्यधारा के समाज में खेतों या घर के पीछे की दीवार को उंचा और मज़बूत बनाया जाता है. लेकिन आदिवासियों में घर में जंगल जाने का रास्ता ज़रूर रखा जाता है.

ढेकी की यह आवाज़ ग्रामीण भारत से वास्ता रखने वाले किसी भी आदमी को पुराने वक़्त की याद दिला सकती है. एक वक़्त में भारत के गाँवों में शायद ज़्यादातर घरों में ढेकी होती थी.

मानव सभ्यता के विकास के क्रम में यह एक अहम मशीन थी, जिसने इंसान के काम को आसान बनाया था, शायद जैसे पहिए का अविष्कार महत्वपूर्ण था, वैसे ही सभ्यता के लिए इस मशीन का निर्माण भी सभ्यता की एक बड़ी उपलब्धि रही होगी.

इस मशीन ने औरतों की मेहनत को ख़ासतौर से कम कर दिया था. लेकिन 21 वीं सदी में भी अगर यह आदिम तकनीक इस्तेमाल हो रही है तो इसकी आवाज़ और लय बेशक आपको यादों की दुनिया में ले जाए, यह कोई अच्छी बात नहीं है.

आदिवासी भारत की बड़ी आबादी उसमें भी सिर्फ़ औरतें रोज़ घटों इन ढेकियों पर ख़ुद को गलाती हैं. 

ओड़िशा के कोरोपुट ज़िले के इस छोटे से गाँव में धुरवा या दुरवा आदिवासी रहते हैं. यहाँ इनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ी सिर्फ़ ढेकी नहीं है.

इनके ज़्यादातर औज़ार और तकनीक पुरातन ही है. मसलन अनाज साफ़ करने का सूप तो ठीक है, लेकिन छलनी भी बांस से ही बनाई गई है. 

ये औज़ार या ज़रूरत की दूसरी चीजें ये आदिवासी जंगल से मिलने वाले उत्पादों से बनाते हैं. मसलन बांस का इस्तेमाल आदिवासी ज़िंदगी के लगभग हर पहलू से जुड़ा है.

पर्यावरण के लिए चिंतत रहने वाली संस्थाएँ या व्यक्ति इस तरह की ज़िदगी पर खुश हो सकते हैं. मेलों का आयोजन करने वाले इन वस्तुओं को कला बता सकते हैं.

इस तरह की राय रखने वालों से कोई विवाद नहीं पर, आज की दुनिया में जितना समय और मेहनत इस काम में लगती है, क्या उत्पादन और उसका दाम उतना होता है….जितना आधुनिक कहे जाने वाले समाज में होता है. 

इन आदिवासियों के खाने में उबले हुए चावल के साथ रागी, उबला हुआ सीताफल और जंगल से मिलने वाला साग होता है. पौष्टिकता की नज़र से यह एक आदर्श भोजन है.

इसमें एक बूँद भी तेल इस्तेमाल नहीं किया जाता है. फिर आदिवासी भारत में कुपोषण और ख़ासतौर से महिलाओं और बच्चों में इतना ज़्यादा क्यों है.

क्यों आदिवासी भारत में आज भी राष्ट्रीय औसत से कम लोग जीते हैं. क्योंकि अभी भी यहाँ पीने का साफ़ पानी नसीब नहीं है.

शिक्षा और स्वास्थ्य की बेसिक सुविधाओं का अभाव है. दुरवा या धुरवा कहे जाने वाले इन आदिवासियों में साक्षरता दर क़रीब 40 प्रतिशत बताई जाती है….यानि 60 प्रतिशत लोग अपना नाम तक नहीं लिख सकते हैं. 

Harvester के युग में जब कई कई एकड़ की फ़सल कुछ घटों में साफ़ हो कर किसान के घर पहुँच जाती है, आदिवासी भारत में किसान का पूरा परिवार कई दिन खलिहान में लगा रहता है.

उसके पास औज़ार के नाम पर कुछ भी नहीं मतलब कुछ भी नहीं है. डंडों से पीट कर झाड़ी गई फ़सल को हाथों से साफ़ करने में कई कई दिन लग जाते हैं, तब जा कर कहीं दो चार क्विंटल धान या रागी घर में आता है. 

ये आदिवासी बेशक भारत गणराज्य के नागरिक हैं. संविधान की प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ में आदिवासी भी शामिल हैं. लेकिन आदिवासी बस्तियों में आपको भारत गणराज्य कहां मिलता है.

भारत गणराज्य से वो कभी कभार आस-पास के बाज़ार में मिलते हैं. जंगल से शिकाकाई, इमली और धूप जैसी चीज़ें बेचने ये आदिवासी आस-पास के बाज़ार में आते हैं.

ये आदिवासी आज भी नाममात्र को ही कपड़े पहनते हैं. औरतों के तन पर भी ज़्यादातर एक ही कपड़ा होता है. शुक्र है अपनी बस्तियों में इन्हें वैसी नज़रों का समाना नहीं करना पड़ता जो उनके खुले बदन को देखती हैं.

लेकिन जब ये औरतें भारत से मिलती हैं…तो अतिरिक्त कपड़ा इस्तेमाल करती हैं अपने बदन को ढँकने के लिए. 

किसी भी आदिवासी समूह को अनूसूचित जनजाति या फिर पीवीटीजी का दर्जा देने के कुछ मानदंड सरकार ने रखे हैं. पीवीटीजी उन आदिवासियों को कहा जाता है जो अभी भी मुख्यधारा के समाज से घुले मिले नहीं है और उनकी आर्थिक गतिविधियाँ सिर्फ़ ख़ुद को ज़िंदा रखने तक सीमित हैं.

उत्पादन को औज़ार और तकनीक पुरातन हैं और अभी भी जंगल पर निर्भर करते हैं. इस लिहाज़ से ओडिशा के दुरवा या धुरवा पीवीटीजी की श्रेणी में आने चाहिएँ. छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश में उन्हें यह दर्जा हासिल भी है.

लेकिन ओड़िशा का यह आदिवासी समूह अभी भी इस दर्जे से वंचित है.

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