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दम तोड़ती ‘मानव की संतानें’: जुमानी जुआंग की मौत और आदिवासी पलायन का कड़वा सच

तमिलनाडु की झींगा फैक्ट्री (Seafood Factory) में अमोनिया गैसी रिसाव में मारी गई जुमानी जुआंग की मौत से कई सवाल पैदा होते हैं. इनमें सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि जुगांग विकास ऐजेंसी क्या कर रही है?

तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले (Tiruvallur District) में रविवार को एक झींगा प्रोसेसिंग फैक्ट्री (Seafood Processing Factory) में हुए अमोनिया गैस लीक (ammonia gas leak) हादसे में दो महिला श्रमिकों की मौत हो गई. 

इनमें से एक 19 वर्षीय युवती जुमानी जुआंग (Jumani Juang) थी. जुमानी ओडिशा की रहने वाली थी और अपनी आजीविका के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर तमिलनाडु के एक कारखाने में काम कर रही थी.

जुमानी जुआंग ओडिशा के आदिवासी समुदाय जुआंग से थी. यह पूछा ही जा सकता है कि एक औद्योगिक हादसे में मारे गए एक मज़दूरी की जातीय पहचान क्यों चर्चा में लाई जाए.

यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि जुआंग एक ऐसा आदिवासी समुदाय है जिसे PVTG कहा जाता है. यानि यह समुदाय विशेष रुप से पिछड़ी जनजाति माना जाता है. इसकी घटती जनसंख्या एक चिंता का विषय माना जाता है. 

इस लिहाज से यह घटना केवल एक औद्योगिक हादसा नहीं है, बल्कि यह भारत के सबसे प्राचीन और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) में से एक, जुआंग जनजाति की बेबसी, उनकी खोती आजीविका और व्यवस्था की विफलता की एक दर्दनाक दास्तां है.

परंपरागत जीविका का अंत और पलायन की मजबूरी

‘जुआंग’ शब्द का अर्थ होता है “मानव की संतान”. ओडिशा के केंदुझर और ढेंकनाल की पहाड़ियों में रहने वाली यह प्रकृति-पुत्र जनजाति कभी पूरी तरह अपने वनों और ‘पोडु’ (झूम खेती) पर निर्भर थी.

लेकिन बदलते वक्त के साथ कड़े वन कानूनों, अंधाधुंध खनन और जंगलों के सिमटने ने इनकी पारंपरिक जीवनशैली को उजाड़ कर रख दिया. उन्हें जंगल में मिलने वाले उत्पाद खत्म हो गए और खेती के लिए जमीनें न के बराबर बचीं.

अर्थशास्त्र और आधुनिक दुनिया के नियम कहते हैं कि “पलायन में कोई बुराई नहीं है.” बेहतर अवसरों, शिक्षा और आर्थिक समृद्धि के लिए दुनिया भर में लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं.  

लेकिन जुआंग आदिवासियों का यह पलायन स्वैच्छिक नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व बचाने की मजबूरी’ है. यह पलायन किसी कॉर्पोरेट दफ्तर या सुरक्षित नौकरी के लिए नहीं होता, बल्कि यह उन्हें उन जगहों पर धकेलता है जहाँ मौत हर वक्त सिर पर मंडराती है।

मौत के कुएं: खदानें, ईंट-भट्टे और खतरनाक कारखाने

आज जुआंग समुदाय के हजारों युवा ओडिशा से बाहर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश या कर्नाटक जैसे राज्यों में पलायन कर रहे हैं. विडंबना यह है कि अपनी कम साक्षरता और सामाजिक रूप से कटे होने के कारण इन्हें केवल बेहद खतरनाक और असुरक्षित जगहों पर ही काम मिलता है. 

ये युवा या तो फेफड़ों को गला देने वाली कोयला और लोहा खदानों में काम करते हैं, या भीषण गर्मी में ईंट-भट्टों पर बंधुआ जैसी जिंदगी जीते हैं.

इसके अलावा तमिलनाडु की इस सीफूड फैक्ट्री जैसी जगहों पर, जहाँ औद्योगिक सुरक्षा मानकों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं और जहरीली गैसों (जैसे अमोनिया) के साए में इन्हें असुरक्षित हॉस्टलों में रखा जाता है.

19 साल की जुमानी जुआंग की मौत इसी सुरक्षा चूक और जानलेवा कामकाजी माहौल का नतीजा है. वह अपने पीछे यह सवाल छोड़ गई है कि क्या एक आदिवासी की जान की कीमत इतनी सस्ती है?

कागजी विकास एजेंसियां और जमीनी हकीकत

अफ़सोस की बात यह है कि सरकार ने इस विशेष जनजाति के विकास के लिए बकायदा ‘जुआंग विकास एजेंसी’ (JDA) का गठन कर रखा है. करोड़ों रुपये के बजट और प्रशासनिक अमले के बावजूद, यह एजेंसी स्थानीय स्तर पर इन आदिवासियों को सम्मानजनक और सुरक्षित रोज़गार उपलब्ध कराने में पूरी तरह नाकाम रही है. 

यह त्रासदी तब और अधिक चुभती है जब हम इसे हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के चश्मे से देखते हैं. अभी कुछ ही समय पहले देश की माननीय राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू (जो स्वयं ओडिशा के आदिवासी समाज से आती हैं) और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ओडिशा की यात्राएं की थीं. 

इन यात्राओं के दौरान बड़े-बड़े मंचों से आदिवासी कल्याण, “पीएम-जनमन” (PM-JANMAN) योजना और जनजातीय गौरव के कसीदे पढ़े गए। केंद्र सरकार ने जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए हजारों करोड़ रुपये के पैकेजों की घोषणाएं भी की गई थीं.

लेकिन जुमानी जुआंग की मौत पर ओडिशा के मुख्यमंत्री या किसी अधिकार का कोई बयान आपने देखा, सुना या पढ़ा नहीं होगा.

(इस स्टोरी में लगाई गई तस्वीर AI से तैयार की गई है. यह तस्वीर प्रतीकात्मक है.)

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