केरल: स्कूल बंद रहने पर भी आदिवासी बच्चों को मिलेगा भोजन, हेडमास्टर ने शुरु की योजना

इस स्कूल में ज़्यादातर बच्चे शबरीमला के जंगलों के अंदर बसे आदिवासी गांवों से आते हैं, और बेहद ग़रीब परिवारों से हैं. हेडमास्टर और स्कूल के टीचरों ने फ़ैसला लिया है कि जून में स्कूल के फिर से खोले जाने तक, इन आदिवासी बच्चों के घरों तक मुफ्त भोजन के पैकेट पहुंचाएंगे.

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केरल सरकार ने जब 2 अप्रैल से राज्य के स्कूलों को गर्मियों की छुट्टियों के लिए बंद करने की घोषणा की तो अट्टतोडु में गवर्नमेंट ट्राइबल एलपी स्कूल के हेडमास्टर बिजू थॉमस के दिमाग में सबसे पहला खयाल उनके छात्रों के बारे में आया. खासकर बच्चों के पेट के बारे में.

थॉमस यह जानते हैं कि इस स्कूल में पढ़ने वाले आदिवासी बच्चे स्कूल में बांटे जाने वाले मुफ़्त भोजन पर कितना निर्भर हैं. इस स्कूल में ज़्यादातर बच्चे शबरीमला के जंगलों के अंदर बसे आदिवासी गांवों से आते हैं, और बेहद ग़रीब परिवारों से हैं.

इनकी स्थिति को समझते हुए, हेडमास्टर और स्कूल के टीचरों ने फ़ैसला लिया है कि जून में स्कूल के फिर से खोले जाने तक, इन आदिवासी बच्चों के घरों तक मुफ्त भोजन के पैकेट पहुंचाएंगे.

इस पहले के लिए उन्हें रान्नी में स्थित एक चैरिटेबल ट्रस्ट का समर्थन मिल रहा है. साथ ही स्कूल ने इन भोजन पैकेटों को मंजतोडु और प्लापल्ली की दो आदिवासी बस्तियों में रोज़ बांटने के लिए एक कुडुम्बश्री कैंटीन शुरु की है.

स्कूल में पढ़ने वाले कुल 40 छात्रों में से 27 इन दो बस्तियों से हैं, जो शबरीमला के जंगलों के अंदर बसी हैं.

बिजू थॉमस ने एक अखबार को बताया, “जहां तक इन बच्चों की बात है, भोजन तक पहुंच इनके लिए रोज़ की एक चुनौती होने का साथ-साथ इनकी पढ़ाई में एक बाधा भी है. जब भी स्कूल बंद रहता है, यह बच्चे सिर्फ़ पढ़ाई से ही दूर नहीं होते, बल्कि भूख से इनका सामना होता है. सलिए हमने फ़ैसला किया है कि अगले दो महीनों के लिए बच्चों की दिन में कम से कम एक बार भोजन तक पहुंच सुनिश्चित करें.”

योजना के तहत इन दोनों बस्तियों में 60 भोजन के पैकेट बांटे जाएंगे, जिसमें उन परिवारों के दूसरे बच्चे भी शामिल होंगे जो दो वक्त का खाना खाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. रोज़ का खर्च लगभग 2,400 रुपए है, जिसका एक हिस्सा स्कूल के कर्मचारी अपने वेतन में से देंगे.

यह योजना एक ऐसे कार्यक्रम का एक विस्तार है जिसके तहत बच्चों को सभी स्कूल दिवसों में दिन में तीन बार पौष्टिक भोजन दिए जाने की कोशिश की जाती है. यह योजना रान्नी-पेरुनाड पंचायत के सहयोग से चलाई जा रही है, और छात्रों और उनके परिवारों से इसके बारे में अच्छी प्रतिक्रिया मिली है.

अब छुट्टियों के दौरान भी योजना के जारी रखे जाने से कम से कम इन दो आदिवासी बस्तियों के बच्चों को दिन में एक वक्त का पौष्टिक भोजन मिल सकेगा.

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