‘आत्मघाती प्रवृति’ के इदु मिश्मी समुदाय पर सरकार का जवाब साफ़गोई या निर्लज्जता

इस समुदाय में एक बेटा अपने पिता की मृत्यु के बाद अपनी सौतेली माँ से शारीरिक संबंध बना सकता है और शादी कर सकता है. इस मामले में सौतेली माँ को ना कहने का अधिकार नहीं है. इस समुदाय के सामाजिक नियम औरतों को स्वतंत्रता नहीं देते हैं. इस समुदाय के नियम के अनुसार अगर कोई औरत विधवा हो जाती है तो उसके पति के बड़े या छोटे भाई का उस औरत पर अधिकार हो जाता है

0
802

“अरुणाचल प्रदेश के इदु मिश्मी (Idu Mishmi) जनजाति समूह (indigenous Group) में आत्मघाती प्रवृति है. यह जनजाति अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी के अनिनी में रहती है. अनिनी, दिबांग घाटी ज़िले का मुख्यालय है. इदु मिश्मी समुदाय में आत्मघाती प्रवृति से निपटने के लिए अब तक कोई महत्वपूर्ण सरकारी उपाय या पहल नहीं की गई है.”

संसद में जनजातीय कार्य मंत्रालय की तरफ़ से दिए गए जवाब को आप चाहें तो साफ़गोई का उदाहरण मान सकते हैं, या फिर निर्लज्जता भी कह सकते हैं.

इदु मिश्मी जनजाति में आत्महत्याओं के मामले से चिंतित एक सांसद ने राज्य सभा में सरकार से सवाल पूछा था. सवाल पूछने वाले सांसद राज्य सभा सदस्य राकेश सिन्हा हैं. उन्होंने सरकार से तीन बातों का उत्तर माँगा था. 

उनके सवाल के पहले भाग में पूछा गया था कि क्या अनिनी के जनजातीय लोगों में और दिबांग घाटी में आत्महत्या की दर अधिक है.

इसी सवाल के अगले भाग में उन्होंने एक और बात पूछी थी, उन्होंने जानना चाहा था कि अगर वहाँ लोगों में आत्महत्या की दर अधिक है तो क्या ऐसे लक्षणों के मनोवैज्ञानिक या अन्य कारणों को समझने की कोशिश की गई है. 

सांसद राकेश सिन्हा ने सरकार से यह भी पूछा कि सरकार ने इस जनजाति के लोगों में आत्महत्याओं को रोकने के लिए या फिर वहाँ के लोगों के उपचार के लिए क्या क्या कदम उठाए हैं. सरकार ने जो जवाब दिया है वो आप उपर पढ़ चुके हैं. 

केन्द्र सरकार ने संसद में जानकारी देते हुए बताया है कि स्वयं केन्द्र या फिर राज्य सरकार ने तो इस मामले में कुछ ऐसा किया नहीं है जिसका उल्लेख किया जा सके.

इदु मिश्मी समुदाय की महिलाओं में आत्महत्या के मामले अधिक पाए गए हैं

अलबत्ता इदु मिश्मी सांस्कृतिक और साहित्यिक सोसायटी (IMCLS) ने ज़रूर कुछ गाँवों में जागरूकता के लिए कुछ कोशिश की है. इस संगठन ने इस जनजाति के लोगों को जीवन के प्रति सम्मान दिखाने की अपील की है.

इस कोशिश में लगे इस संगठन को किसी तरह की आर्थिक मदद या किसी तरह का समर्थन केन्द्र या राज्य सरकार की तरफ़ से दिया गया. इस सिलसिले में भी कोई जानकारी नहीं मिलती है. 

अफ़सोस की बात ये है कि केन्द्र और राज्य सरकार यह जानती भी है और मानती भी है कि यह एक गंभीर मसला है. एक जनजाति जिसकी संख्या बहुत अधिक नहीं है उसमें यह प्रवृत्ति एक चिंता है.

यह मसला भी कोई नया नहीं है. क़रीब दस साल पहले इस सिलसिले में कुछ ठोस आँकड़े भी सामने आए थे.

2011 की जनगणना में इदु मिश्मी जनजाति की कुल जनसंख्या 13000 बताई गई है. 1971 से 2010 यानि क़रीब 4 दशक के आँकड़ों में यह पाया गया था कि इस दौरान इस जनजाति में कम से कम 226 लोगों ने आत्महत्या की थी.

इस जनजाति में आत्महत्याओं के मामले में एक और ख़ास बात सामने आई थी. इन आत्महत्याओं के मामले में यह पाया गया कि यहाँ पर पुरूषों की तुलना में औरतों में आत्महत्या ज़्यादा थी. एक शोध में पाया गया कि कुल 226 आत्महत्या के मामलों में से 115 औरतें और 101 पुरुष थे. 

कपड़ा बुनाई और बांस के उत्पादों मिश्मी समुदाय की रोज़ी रोटी का साधन हैं

राजीव गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय इटानगर में इस मामले पर पीएचडी करने वाले तरुण मेने ने इस मसले पर शोध के दौरान कई जानकारी जुटाने की कोशिश की थी.

उन्होंने अपने शोध में पाया कि यहाँ पर आत्महत्या के जो औपचारिक आँकड़े हैं, आत्महत्या के मामले उनसे कहीं अधिक हो सकते हैं. उन्होंने पाया था कि कई जनजातीय इलाक़ों में पुलिस की मौजूदगी ही नहीं है. इसलिए ये मामले रिपोर्ट ही नहीं होते हैं. 

मेने ने पाया था कि यहाँ औरतों और आदमियों में आत्महत्याओं के मामलों का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात या फिर अरुणाचल प्रदेश के अनुपात से अलग है. मसलन इस जनजाति में आत्महत्या के मामलों में औरतों और मर्दों के बीच का अनुपात 47:53 था जबकि राष्ट्रीय औसत उस समय 64:36 थी.

इस शोध में पाया गया था कि आत्महत्या के मामलों की संख्या अविवाहितों में अधिक है. आत्महत्याओं के मामलों की पड़ताल में पाया गया कि इनमें से लगभग आधे लोग थे जिनकी शादी नहीं हुई थी.

इसके बाद विवाहित लोगों की संख्या थी जो क़रीब 40.8 प्रतिशत थी. जबकि 9 प्रतिशत विधवाओं की संख्या थी जिन्होंने आत्महत्या का रास्ता चुन लिया था. 

इदु मिश्मी समुदाय में आत्महत्याओं के मामले में तरूण मेने किसी निश्चित नतीजे पर तो नहीं पहुँचे थे. लेकिन उनका कहना था कि इस समुदाय को अपनी सामाजिक व्यवस्था और नियमों पर फिर से विचार करना चाहिए.

मसलन वो कहते हैं कि इस समुदाय के सामाजिक नियम औरतों को स्वतंत्रता नहीं देते हैं. इस समुदाय के नियम के अनुसार अगर कोई औरत विधवा हो जाती है तो उसके पति के बड़े या छोटे भाई का उस औरत पर अधिकार हो जाता है.

परिवार के बाहर विधवा औरत को शादी करने की अनुमति नहीं होती है. अगर कोई औरत इस नियम के ख़िलाफ़ जाना चाहती है तो उस औरत के पिता को वधू मूल्य के तौर पर ली गई रक़म या वस्तुएँ वापस करनी पड़ती हैं.

इस समुदाय में एक बेटा अपने पिता की मृत्यु के बाद अपनी सौतेली माँ से शारीरिक संबंध बना सकता है और शादी कर सकता है. इस मामले में सौतेली माँ को ना कहने का अधिकार नहीं है. 

इदु मिशमी समुदाय की आर्थिक गतिविधियाँ बेहद मामूली होती हैं और यह समुदाय ख़ुद को ज़िंदा रखने भर के लिए कमाता है. हालाँकि अब कुछ कुछ बदलाव आता बताया जा रहा है. लेकिन अभी भी इस समुदाय में आर्थिक संपन्नता कम ही परिवारों में मिलती है. 

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यह एक उलझा हुआ मसला है. इसके सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक कारण हो सकते हैं.

लेकिन इस मामले में सरकार की उदासीनता बेहद चिंता की बात है. बेशक समाज में जागरूकता और अपने भीतर बदलाव पर विचार इस मसले के हल की पहली शर्त है. लेकिन इसके लिए प्रेरित करने की पहल सरकार को करनी चाहिए.  

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here