सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले मौजूद हैं फिर भी आदिवासी की ज़मीन लुट जाती है

अट्टपाड़ी शायद केरल के बहुत कम जगहों में से एक है जहां बड़ी मात्रा में बंजर भूमि है. यहां की अधिकांश भूमि विवाद में है. गांव सर्वेक्षण रिकॉर्ड बताते हैं कि यहां के आदिवासियों के जमीन तमिलनाडु और केरल के अन्य हिस्सों के कई अप्रवासी व्यापारियों के कब्जे में हैं.

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केरल के पलक्कड़ जिले के अट्टपाड़ी में इरुला आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले पेरुमल और उनके भाई का परिवार सरकार से मिले पक्के मकान को छोड़ कर अब अगाली के शोलयार ग्राम पंचायत में तिरपाल और बांस से बनी दो अस्थायी झोपड़ियों में रहते हैं.

दरअसल यह परिवार कुछ महीने पहले ही इन झोंपड़ियों में आ कर बसा है. क्योंकि उनको डर है कि उनकी जमीन पर कब्जा किया जा सकता है. यह ज़मीन उनके पुरखों की है और कई पुश्तों से यह परिवार इस ज़मीन पर खेती करता रहा है.

अट्टपाड़ी में कई आदिवासी परिवारों के ऐसे अनुभव है, जिनकी भूमि वर्षों से शक्तिशाली अप्रवासियों द्वारा हड़प ली गई थी. पेरुमल कहते हैं, “हम यहां बिजली या पानी के इंतज़ाम के बिना भी रहते हैं. क्योंकि हम बस अपनी जमीन को सुरक्षित रखना चाहते हैं. हम नहीं चाहते कि दबंग लोग आएँ और रातों रात हमारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा हो जाए. वो कहते हैं कि अगर कोई हमारी जमीन पर क़ब्ज़ा कर के इमारत बनाना चाहेगा तो उन्हें पहले हमें मारना होगा.”

अट्टपाड़ी शायद केरल के बहुत कम जगहों में से एक है जहां बड़ी मात्रा में बंजर भूमि है. यहां की अधिकांश भूमि विवाद में है. गांव सर्वेक्षण रिकॉर्ड बताते हैं कि यहां के आदिवासियों के जमीन तमिलनाडु और केरल के अन्य हिस्सों के कई अप्रवासी व्यापारियों के कब्जे में हैं.

क्षेत्र के आदिवासी लोगों का कहना है कि इन जमीनों पर अपना अधिकार साबित करने वाले इन अप्रवासियों के स्वामित्व वाले दस्तावेजों को कुछ सरकारी अधिकारियों की मदद से गढ़ा गया था.

अट्टपाड़ी के एक आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता मुरुगन बताते हैं, “ये आदिवासी लोगों के स्वामित्व वाली भूमि हैं. उन्होंने इसे कुछ वर्षों के लिए अमीर अप्रवासियों को पट्टे पर दिया था. लेकिन फिर उन्होंने दस्तावेजों को गढ़ा और जमीनों को अपने कब्जे में ले लिया.

अगर हम गांव के सर्वे रिकॉर्ड की जांच करें तो हम अभी भी भूस्वामियों के मूल नाम का पता लगा सकते हैं. उदाहरण के लिए, सर्वेक्षण के दस्तावेजों में नाम मरुथा होगा, लेकिन टाइटल डीड्स मारुथन गौंटर कहेंगे.”

अलगाव का एक लंबा इतिहास

अट्टपाड़ी में अलग-अलग भूमि के लिए लड़ाई का एक लंबा इतिहास रहा है. केरल अनुसूचित जनजाति (भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंध और पृथक भूमि की बहाली) अधिनियम, 1975 के अनुसार, “किसी भी अन्य कानून या किसी अनुबंध, प्रथा, किसी निर्णय, डिक्री या किसी कोर्ट का आदेश, सक्षम प्राधिकारी की लिखित पूर्व सहमति के बिना अनुसूचित जनजाति के सदस्य के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को इस अधिनियम के प्रारंभ होने पर या उसके बाद अमान्य होगा.”

हालांकि, जनजातीय भूमि अलगाव अधिनियम के तहत, 24 जनवरी, 1986 तक पंजीकृत दो हेक्टेयर से कम की सभी आदिवासी भूमि की कानूनी वैधता है. आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इस खामी का फायदा उठाकर अप्रवासी फर्जी दस्तावेज बनाते हैं, जिससे ऐसा लगता है कि खरीदारी 1986 से पहले की गई थी.

ग्राम सर्वेक्षण रिकॉर्ड के मुताबिक, कोट्टाथारा गांव में सर्वेक्षण संख्या 520/2 के तहत भूमि कुल्लन के पुत्र नंजन के स्वामित्व में है. लेकिन नंजन के बेटे, 50 वर्षीय वलैथिरी का कहना है कि जमीन अब परिवार के पास नहीं है. इसके बजाय यह तमिलनाडु के कुछ लोगों की कब्जे में है.

वलैथिरी कहते हैं, “वे कुछ दिन पहले जमीन नापने आए थे. लेकिन हम सबने एक साथ आकर विरोध किया और कार्यवाही पर रोक लगा दी. भूमि मेरे पूर्वजों के स्वामित्व में थी. मेरे पिता और उनके भाई बदिरन का नाम सर्वेक्षण संख्या 523/2 के अभिलेखों में भी है. उन्होंने कड़ी मेहनत से इस भूमि पर खेती की है. लेकिन जमीन को पट्टे पर देने के बाद हमने इसे खो दिया.”

राजस्व विभाग के सर्वे विभाग के रजिस्टर में भी बदिरन का नाम है. दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आदिवासी परिवार इस भूमि पर बस गए थे, जहां वे रागी और मक्के खेती करते थे.

ऐसी ही स्थिति बोधन और मसानी के बच्चों की है, जिनकी सर्वेक्षण संख्या 237 के तहत भूमि मानी जाती है. उनका कहना है कि मसानी को जमीन 1975 में मिली थी. लेकिन अब उस पर किसी और का कब्जा है जिसे वे जानते भी नहीं हैं. वेलैथिरी कहते हैं कि ये यहां की मुख्य समस्या है.

वे कहते हैं, “ज्यादातर समय, हम यह भी नहीं जानते कि हमारी जमीन किसने ली या वर्तमान मालिक कौन हैं. क्योंकि वे जानते हैं कि जमीन उनकी नहीं है इसलिए ये लोग कई सालों तक देखने भी नहीं आते. इस बीच हम जमीन को अपना समझकर खेती करते रहेंगे. वर्षों बाद वे अचानक प्रकट होंगे और भूमि को अपना होने का दावा करेंगे.”

1951 में अट्टपाड़ी ब्लॉक पंचायत के आंकड़ों के मुताबिक, इस क्षेत्र की 90.26 फीसदी आबादी आदिवासी लोग थे. जबकि 2011 में यहां आदिवासी आबादी 44 फीसदी तक कम हो गई है. जबकि अप्रवासी आबादी 56 फीसदी से उपर पहुँच चुकी है. जिससे आदिवासी समुदायों को अल्पसंख्यक बना दिया गया. वर्तमान में अट्टपाड़ी में 192 आदिवासी बस्तियां हैं. इन आदिवासी बस्तियों में इरुलर, मुदुकर और कुरुम्बर जनजातियां शामिल हैं.

इरुलर समुदाय के एक आदिवासी शख्स प्रकासन कहते हैं, “एक समय में पूरा अट्टपाड़ी सिर्फ आदिवासी भूमि थी. सिर्फ जनसंख्या परिवर्तन को देखते हुए हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि अप्रवासी आदिवासी भूमि को अवैध रूप से हथिया रहे हैं. पिछले 10 वर्षों में भी सिर्फ अप्रवासी आबादी में वृद्धि हुई है.”

एकीकृत जनजातीय विकास कार्यक्रम (ITDP) के एक अध्ययन में कहा गया है कि अट्टपाड़ी में 10,106.19 एकड़ आदिवासी भूमि को 1977 तक अलग कर दिया गया था.

मुरुगन कहते हैं कि पहले अप्रवासी आदिवासी लोगों को उनकी जमीन हड़पने, उनके हस्ताक्षर लेने और फिर उन्हें डराने के लिए शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते थे. ज्यादातर मामलों में उन्होंने जमीन हड़पने के लिए लीज एग्रीमेंट का फायदा उठाया.

1987 में दो आदिवासी लोगों, पोन्नी और काकी द्वारा उनकी भूमि के अतिक्रमण को लेकर दायर एक मामले के संबंध में केरल हाईकोर्ट ने 2000 में एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के अनुसार यह ज़मीन आदिवासियों की थी.

हालांकि इस मामले में अतिक्रमणकारियों, राजलक्ष्मी और इस्माइल रावथर ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रख. जिसमें कहा गया था कि आदिवासी भूमि केवल आदिवासी लोगों की है. यह मामला 2011 में सामने आया था.

मुरुगन कहते हैं कि लेकिन ऐतिहासिक फैसले के बाद भी सरकार की ओर से अलग-अलग संपत्तियों को बहाल करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया. इसके अलावा अट्टपाड़ी के आदिवासी लोग बताते हैं कि कई सरकारी कार्यालय भी आदिवासी भूमि पर बने हैं जो कि कानूनी भी नहीं है.

बहुराष्ट्रीय निर्माता सुजलॉन एनर्जी के लिए जमीन खरीदने और पवन चक्कियों की स्थापना करने वाली पुणे की कंपनी सरजन रियलिटी लिमिटेड के संबंध में एक विवाद छिड़ गया था, जिसने अट्टपाड़ी में हुए कुछ प्रमुख अतिक्रमणों पर प्रकाश डाला था.

2013 में एक विजिलेंस जांच में पाया गया कि सरजन रियलिटी द्वारा पंजीकृत 13 दस्तावेजों, जिन्होंने 2005 और 2008 के बीच क्षेत्र में जमीन खरीदी थी, में आदिवासी भूमि शामिल थी. 2010 में, ओट्टापलम राजस्व मंडल अधिकारी द्वारा एक अन्य जांच के दौरान, यह पाया गया कि सरजन रियलिटी और 29 व्यक्तियों ने इस क्षेत्र में 105.2 हेक्टेयर भूमि खरीदी थी, जिसमें से 72.8 हेक्टेयर तक आदिवासी लोगों की थी, जबकि 17.09 हेक्टेयर वन भूमि थी.

डाउन टू अर्थ ने तब रिपोर्ट किया था कि कंपनी ने पोपी अम्ब्रेला मार्ट, अन्ना एल्युमिनियम, भीमा ज्वैलरी, केरल स्टील एसोसिएट्स और मुंबई की एशियन स्टार कंपनी सहित कई व्यावसायिक घरानों को 0.4 हेक्टेयर बेचा.

द न्यूज मिनट की भी एक रिपोर्ट कहती है कि जब उन्होंने कुछ अट्टपाड़ी परिवारों का दौरा किया तो पाया कि वहाँ पर कई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. शोलयार पंचायत की कलियम्मा, जो अपने परिवार के साथ अट्टपाड़ी हिल्स एरिया डेवलपमेंट सोसाइटी (AHDS) परियोजना द्वारा बनाए गए घरों में रहती है, अपनी कहानी साझा करती है.

कलियम्मा कहती हैं, “हम सात एकड़ जमीन पर खेती करते थे. हमने वहां बकरियां और गायों को पाला. लेकिन फिर जिन लोगों ने हमसे ज़मीन लीज़ पर ली थी उन्होंने हमें ज़मीन छोड़ने के लिए मजबूर किया. उन्होंने हमें एक भी पैसा नहीं दिया. यह सब बल द्वारा किया गया था. हम जमीन के असली मालिक हैं.”

शोलायर के एक अन्य मूल निवासी मारुथन और भी विचित्र अनुभव से गुजर रहे हैं. उनके परिवार की पैतृक संपत्ति, उनके दादा के स्वामित्व वाली जमीन अब बाहरी लोगों द्वारा बिक्री के लिए रखी गई है. वह असहाय होकर देखता था कि उसकी संपत्ति के बाहर ‘बिक्री के लिए’ साइनबोर्ड लगाया गया था.

मरुथन कहते हैं, “हमें अधिकारियों से कोई मदद नहीं मिली. यह माफिया अधिकारियों को रिश्वत के तौर पर हजारों रुपये देने की क्षमता रखता है. हमारे परिवार ने मेरे पिता के समय से इस मामले पर कई शिकायतें दर्ज की हैं. फिलहाल मेरी शिकायत है जो इस भूमि के अतिक्रमण को रोकने की मांग कर रही है. मेरे पिता गांव के एक अधिकारी को भी किराए की गाड़ी कर के घटना स्थल पर लाए थे. अधिकारी ने साइट का दौरा किया और वापस चले गए, कई हफ्तों के बाद जवाब मिला कि जमीन हमारी नहीं थी.”

हालांकि, कोट्टाथारा गांव के एक राजस्व अधिकारी, जिसके अंतर्गत अट्टपाड़ी आता है, टीएनएम को बताता है कि इस क्षेत्र में भूमि हथियाने का कोई नया मामला सामने नहीं आया है.

अधिकारी का कहना है, “कुछ पुराने मामले अभी भी विचाराधीन हैं. लेकिन उन मामलों में भी जाली दस्तावेज बनाकर जमीन पर कब्जा नहीं किया गया था. आदिवासी लोगों से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाकर इसे गैर-आदिवासी लोगों को सौंप दिया गया था.”

उन्होंने कहा कि इन सबके पीछे कोई माफिया नहीं है, न ही आदिवासी लोगों के साथ विश्वासघात किया गया है और न ही उन दस्तावेजों पर दस्तखत किए गए हैं जो उनकी जमीन गैर-आदिवासी लोगों को सौंपते हैं.

1 COMMENT

  1. जोहार यह पढ़कर मुझे बहुत दुख लगा क्योंकि भारत देश के चारों दिशाओं में सरकार और प्रशासन की मिलीभगत से आदिवासियों का जल और जंगल जमीन लूटा जा रहा है जो उनका बपौती संपत्ति रहते हुए भी उस जल और जंगल जमीन पर गैर आदिवासी लोग दबंग यह तरीका से आदिवासियों का जमीन लूटा जा रहा है या सरासर गलत है इस पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार और सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट हस्तक्षेप करना चाहिए

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