बस्तर के जंगल में शिकार छोटा था पर सीख बहुत बड़ी थी

उनके हाथ में एक पतले से बांस की लंबी डंडी भी थी. जंगल में थोड़ी दूर अंदर आने के बाद वो इस डंडी को पेड़ों के तनों की खोह में डालते और बाक़ी सभी पेड़ को घेर लेते. पेड़ को घेर कर ये लोग गुलेल पर गोली चढ़ा कर निशाना साधते. जब सब तैयार होते तो वो डंडी को खोह में हिलाते और सभी एक साथ शोर मचाते.

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2 नवंबर को हमारी टीम आमाटोला गाँव से रायपुर के लिए निकली. आमाटोला में लक्ष्मण मंडावी के घर पर हम लोग तीन दिन से टिके थे. उनके घर पर रह कर ही आस-पास के जंगल और बस्तियों में घूमना हो रहा था.

लक्ष्मण और उनके परिवार ने गाँव से एक ट्रैक्टर का इंतज़ाम करवा दिया था. इसलिए हम मोटरसाइकलों पर सामान के साथ धक्के खाने से बच गए थे. हमारा कुछ सामान कंदाड़ी गाँव की सरपंच के घर पर ही पड़ा था. रास्ते में वो सामान भी उठा लिया और आगे बढ़े.

जब हम नदी की तरफ़ बढ़ रहे थे, तो एक छोटी सी रेहड़ी पर चाय का सामान नज़र आया तो हम वहाँ रूक गए. अभी चाय पी ही रहे थे कि वहाँ पर गज्जू पहुँच गए. गज्जू से हमारी मुलाक़ात पहले ही दिन हो गई थी.

लेकिन अगले दिन हम आमाटोला निकल गए थे तो उनसे ज़्यादा बातचीत नहीं हो पाई थी. हम चाय पीते हुए गज्जू से गप्प लगाने लगे थे. इसी बीच हमने देखा कि कुछ बच्चे और उनके साथ एक 16-17 साल का लड़का छोटे छोटे बैग कंधे पर टांगे, हाथ में गुलेल लिए जंगल की तरफ़ निकल रहे हैं. गज्जू भी उनके साथ हो लिए, यही मौक़ा था जब मेरे कैमरामैन साथी दम साधे खड़े थे.

ट्रैक्टर पर लक्ष्मण और अपने कैमरामैन साथी सुधीर के साथ

लेकिन हुआ वही जिसका उन्हें डर था, मैंने उनकी तरफ़ घूम कर कहा कि हम भी इनके साथ जंगल जाएँगे. सारा सामान ट्रेक्टर पर रस्सी से किसी तरह से जकड़ कर बांधा हुआ था. क्योंकि ट्रॉली नहीं थी.

दोनों मुस्कराते हुए ट्रैक्टर की तरफ़ बढ़ गए और कैमरा निकाल लाए. हमारी पूरी टीम गज्जू और विकास (16-17 साल का लड़का) के साथ जंगल की तरफ़ चल पड़े. रास्ते में उनसे बातचीत का सिलसिला चलता रहा.

गज्जू ने बताया कि आदिवासी जब भी घर से निकलते हैं तो उनके कंधे पर यह थैली और हाथ में गुलेल मिलना साधारण बात है. इसके अलावा आदिवासी के कंधे पर कुल्हाड़ी भी ज़रूर मिलेगी.

कंधे पर जो थैली है उसमें छोटे छोटे गोल पत्थर होते हैं जो गुलेल की गोली का काम करते हैं. उन्होंने बताया कि जंगल में कहीं कोई चिड़िया या चूहा मिल जाता है तो उसे गुलेल से मार लेते हैं.

उनके हाथ में एक पतले से बांस की लंबी डंडी भी थी. जंगल में थोड़ी दूर अंदर आने के बाद वो इस डंडी को पेड़ों के तनों की खोह में डालते और बाक़ी सभी पेड़ को घेर लेते. पेड़ को घेर कर ये लोग गुलेल पर गोली चढ़ा कर निशाना साधते. जब सब तैयार होते तो वो डंडी को खोह में हिलाते और सभी एक साथ शोर मचाते.

लेकिन कई पेड़ों पर ऐसा करने के बाद भी उनके हाथ कुछ लगा नहीं था. हम जंगल में आगे बढ़ते जा रहे थे. कुछ देर बाद हम एक और पेड़ के पास रूक गए. उन सभी ने पेड़ के उपर देखा और कहा कि यहाँ पर मूसे का घोंसला है.

जी हाँ, बच्चा देने से पहले चूहे भी पत्ते जमा कर पेड़ की खोह में एक नरम घोंसला बनाते हैं. इसके बाद विकास पेड़ पर चढ़ गए, और बाक़ी ने अपनी पोजिशन ले ली. हाँ पूरी कार्यवाही शुरू होने से पहले नीचे की बाँबी के बिलों को पत्तों से बंद कर दिया गया.

क्योंकि अगर चूहे को मौक़ा मिलता तो वो बिल में घुस जाते. विकास ने जैसे ही खोह में बांस डाला चूहों ने बाहर दौड़ना शुरू किया. इधर से गुलेल चली और दो चूहे टप से नीचे गिर गए. कुल मिला कर इस टीम के हाथ तीन चूहे लगे थे.

इस शिकार के साथ हम लोग गज्जू के घर लौटे और फिर चूहे की चटनी बनी. गज्जू ने चटनी बना कर पत्तों में सभी बच्चों को बाँटी. मुझे भी उन्होंने थोड़ी सी चटनी दी और कहा कि आख़िर मैं भी तो उनके साथ शिकार पर गया था.

शिकार तो छोटा था और चटनी भी थोड़ी थी. लेकिन सीख बड़ी थी, मिल कर काम करो और बाँट कर खाओ.

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