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मध्य प्रदेश में फिर से खुला वन मित्र पोर्टल, पट्टों की तलाश में आदिवासी परेशान

वन मित्र पोर्टल को फिर से खोलने से पहले पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 और एफआरए के नियमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में पिछले अप्रैल में 12 सदस्यीय टास्क फोर्स का गठन किया गया था. यह टास्क फोर्स अभी सिर्फ कागजों पर ही काम कर रही है.

हाल ही में मैं भी भारत की टीम की मुलाकात लहरीबाई से हुई. लहरीबाई को बैगा आदिवासियों के परंपरागत बीजों को बचाने के लिए जाना जाता है.

लहरीबाई मध्यप्रदेश के डिंडोरी ज़िले की समनापुर तहसील के एक गांव में रहती हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खुद लहरीबाई की तारीफ़ कई बार की है. उन्हें 2023 यानि मिलेट ईयर की ब्रांड एंबेसडर भी घोषित किया गया था.

इसके बावजूद लहरीबाई अपनी ज़मीन का पट्टा हासिल नहीं कर पाई है. आप समझ सकते हैं कि लहरीबाई का अगर ये हाल है तो बाकी आदिवासियों की स्थिति क्या होगा.

दरअसल, आजादी के 75 साल बाद और वन अधिकार अधिनियम के लागू होने के 15 साल बाद भी मध्य प्रदेश के आदिवासी कई तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं.

भारत में सबसे ज्यादा वनग्रामों की संख्या 925 मध्य प्रदेश में हैं. गृहमंत्री अमित शाह ने 22 अप्रैल 2022 को भोपाल में राज्य के वन समितियों का सम्मेलन में आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राज्य के 925 में से 827 वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में परिवर्तित करने की घोषणा की थी.

इनमें से 793 वनग्रामों को राजस्व ग्राम बनाने की कार्रवाई चल रही हैं, इसकी कलेक्टरों द्वारा अधिसूचना भी जारी हो गई हैं, 3 तीन वनग्राम (मंडला और डिंडौरी के) में कार्रवाई शुरू होना बाकी है. शेष 31 वनग्राम पहले से राजस्व ग्राम में शामिल हो चुके या डूब क्षेत्र में हैं.

इनमें से डिडौंरी जिले में भी 82 वनग्रामों को राजस्व ग्राम बनाने का फैसला लिया लेकिन करीब दो साल बाद भी जमीन पर कुछ बदलाव दिखाई नहीं दे रहा हैं.

आदिवासी कल्याण के लिए काम करने वाले संगठनों का दावा है कि वितरित पट्टों में से 90 फीसदी में भूमि की अनुचित कमी देखी गई है, चाहे आवेदन ऑफलाइन किया गया हो या ऑनलाइन.

हालांकि, यह समस्या न सिर्फ मध्य प्रदेश के 89 आदिवासी विकास खंडों में बल्कि झारखंड, राजस्थान, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे अन्य राज्यों में भी बनी हुई है.

बुरहानपुर में आदिवासियों को वन अधिकार पट्टा (भूमि स्वामित्व) प्राप्त करने में मदद करने वाली जन जागृति समिति की अध्यक्ष माधुरी बेन का कहना है कि आवेदकों को अब वन मित्र पोर्टल या ऐप के माध्यम से दावे दायर करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. यह और भी विनाशकारी साबित हुआ है.

वन मित्र पोर्टल

अनुसूचित जनजाति के सदस्य या समुदाय जो मुख्य रूप से आजीविका के लिए जंगलों या वन भूमि पर रहते हैं और उन पर निर्भर हैं, वो एफआरए 2006 के तहत अधिकारों का दावा कर सकते हैं.

कोई भी सदस्य या समुदाय जिसकी तीन पीढ़ियां (75 वर्ष) 13 दिसंबर, 2005 से पहले मुख्य रूप से वन भूमि में निवास करती थीं, वो पट्टे के लिए पात्र हैं. व्यक्तिगत पट्टे के लिए दस एकड़ तक की जमीन का दावा किया जा सकता है, जबकि सामुदायिक पट्टे के लिए कोई सीमा तय नहीं की गई है.

जब अस्वीकृतियां बढ़ने लगीं तो राज्य सरकार ने अस्वीकृत दावों की समीक्षा के लिए दिसंबर 2019 में मध्य प्रदेश वन मित्र पोर्टल और मोबाइल ऐप लॉन्च किया. दिसंबर 2019 से नवंबर 2022 तक वन मित्र पोर्टल पर कुल 6 लाख 27 हज़ार 513 आवेदन आए और 6 लाख 17 हज़ार 284 दावों (98%) का समाधान किया गया.

हालांकि, नए दावों के आने के कारण भ्रम की स्थिति का हवाला देते हुए पोर्टल 2020 में धीरे-धीरे बंद हो गया. पिछले साल मई तक पोर्टल कुल 55 जिलों में से केवल आठ में काम कर रहा था.

पिछले साल जुलाई में पोर्टल नए और अस्वीकृत दोनों दावों को सुनने के लिए फिर से खोला गया लेकिन इसका मतलब सिर्फ और अधिक परेशानी थी. क्योंकि संशोधन के लिए वापस भेजे गए दावे अभी भी ऑफ़लाइन सुने जाएंगे.

पोर्टल को फिर से खोलने से पहले पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 और एफआरए के नियमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में पिछले अप्रैल में 12 सदस्यीय टास्क फोर्स का गठन किया गया था. यह टास्क फोर्स अभी सिर्फ कागजों पर ही काम कर रही है.

टास्क फोर्स के सुझावों को नजरअंदाज किया गया

टास्क फोर्स के सदस्यों का कहना है कि उन्होंने सुझाव दिया था कि वन पट्टे की सुनवाई ग्राम सभा में ऑफ़लाइन आयोजित की जानी चाहिए क्योंकि नियम स्वयं कहते हैं कि निर्णय ग्राम सभा की सार्वजनिक बैठक में लिया जाना चाहिए.

सदस्यों का कहना है कि हमने सुझाव दिया था कि पारदर्शिता लाने के लिए वन मित्र पोर्टल की आवश्यकता है लेकिन इसे दावा दस्तावेजों, ग्राम सभा के फैसलों और पट्टों के रिकॉर्ड रखने तक ही सीमित रखा जाना चाहिए.

टास्क फोर्स का कहना है कि उन्होंने लगभग 10 महीने पहले शिवराज चौहान की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में पोर्टल के उपयोग से संबंधित मुद्दों को सरकार के समक्ष रखा था. उनमें से कुछ खराब नेटवर्क कवरेज, मोबाइल या लैपटॉप की अनुपलब्धता, अधिकांश आदिवासियों की खराब शिक्षा स्थिति और उपग्रह छवियों में स्पष्टता की कमी.

हालांकि, पिछले अप्रैल में ही प्रशासन ने अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (ATREE) और राष्ट्रीय महिला, बाल और युवा विकास संस्थान की मदद से डिंडोरी जिले के 20 वन गांवों में पट्टे के आवेदन मांगे थे.

इस अवधि के दौरान स्वीकृत भूमि स्वामित्वों में गलत नाम और भूमि खंड और खेत के आकार और स्थान में गलतियाँ पाई गईं.

एटीआरईई का कहना है कि क्योंकि ये वन विभाग द्वारा बसाए गए पुराने वन गाँव हैं, यहाँ के सभी खेत अलग-अलग पट्टों के लिए पात्र हैं. इसलिए हर खेत को चिह्नित करने और मापने का निर्णय लिया गया. मैप तैयार किए गए और फिर नए सिरे से दावे किए गए.

विशेष रूप से पिछले साल अप्रैल में शुरू हुए काम में बजाग तहसील के शीतलपानी और समनापुर तहसील के पोंडी में नए और संशोधन की आवश्यकता वाले 230 दावे ऑफ़लाइन दायर किए गए थे. पहले दिए गए 70 फीसदी दावों में संशोधन करना पड़ा. पोर्टल दोबारा खुलने के कारण शेष 18 गांवों में काम आगे नहीं बढ़ सका.

ऑफलाइन नए आवेदन रुके

ATREE के कॉर्डिनेटर का कहना है कि उन्होंने सबसे पहले शीतलपानी और पोंडी में प्राप्त भूमि स्वामित्वों की जांच की और महसूस किया कि इसमें सबसे अधिक संशोधन की जरूरत है. साथ ही गांव के बुजुर्गों और युवाओं की एक टीम बनाई. आदिवासियों को नक्शे, भूमि माप और अन्य तकनीकी जानकारी के बारे में जागरूक करने के लिए वर्कशॉप आयोजित कीं.

दोनों टीमों के साथ ATREE ने प्रत्येक व्यक्ति के खेतों को एक रजिस्टर में सूचीबद्ध किया. प्रत्येक व्यक्ति के खेत के स्थान और आकार को चिह्नित करने के लिए जीपीएस और एएमसीएचओ सीएफआर ओपन सोर्स एप्लिकेशन के साथ मोबाइल का उपयोग करके मैप तैयार किए गए थे.

प्रत्येक दावेदार के आधार, राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र का डिटेल जोड़ा गया. दावों को ऑफ़लाइन दोबारा प्रस्तुत किए जाने के बाद वन अधिकार समिति ने राजस्व और वन अधिकारियों के साथ भूखंडों की नपाई की.

दावों को ग्राम सभा की मंजूरी मिलने के बाद वे उप-मंडल और जिला समितियों के पास गए, जहां शीतलपानी के 134 दावों में से 90 को मंजूरी मिल गई. शेष को सुधार के लिए ग्राम सभा को लौटा दिया गया.

हालांकि, दावों के लिए मंजूरी मिलने वाले 90 दावेदारों में से केवल 51 को ही भूमि का स्वामित्व प्राप्त हुआ है. शेष रुके हुए हैं क्योंकि वे नए दावे हैं जिनके लिए जिला प्रशासन अब सिर्फ ऑनलाइन आवेदन की अनुमति देता है.

जिला प्रशासन ने ऑनलाइन प्रक्रिया की अनिवार्यता पर अंतिम निर्णय नहीं लिया है. जिला मजिस्ट्रेट ने ऑफ़लाइन प्रक्रिया की अनुमति देने के लिए अक्टूबर में राज्य सरकार को लिखा था, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं आई.

शीतलपानी के बैगा आदिवासियों का आरोप है कि हमारे गांव में अधिकांश लोगों के पट्टे में अभी भी संशोधन नहीं हुआ है. वन मित्र पोर्टल फिर से खोल दिया गया है और अधिकारी अब उन्हें केवल ऑनलाइन आवेदन करने के लिए मजबूर कर रहे हैं.

शीतलपानी के अन्य ग्रामीणों का कहना है कि कई बार पट्टा संशोधन आवेदन किया लेकिन बार-बार खारिज हो गया. वह बताते हैं कि हमने एटीआरईई के साथ मिलकर हर खेत और जमीन का नक्शा तैयार करने के लिए तीन महीने तक काम किया.

अधिकारियों ने हमें कई बार बताया कि हमारे आवेदन सही हैं लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उनके हाथ बंधे हुए हैं.

अधिकारियों का कहना है कि आपको केवल वन मित्र पोर्टल के माध्यम से आवेदन करना होगा, ऑफ़लाइन आवेदन करने से पट्टे नहीं दिए जाएंगे.

पिछले साल 13 जुलाई के जनजातीय कार्य विभाग के आदेश में कहा गया है कि नए आवेदन वन मित्र पोर्टल के माध्यम से भी सुने जा सकते हैं. लेकिन अधिकारियों ने इस बात पर जोर देने के लिए इसमें बदलाव किया है कि दावे केवल ऑनलाइन ही किए जा सकते हैं.

वैसे आदेश के मुताबिक ऑफलाइन आवेदन पर कोई प्रतिबंध नहीं था, फिर भी इसे बंद कर दिया गया.

दरअसल, वन मित्र ऐप और पोर्टल से नए नक्शे और माप प्राप्त करना आसान नहीं है. इससे पता चलता है कि प्रत्येक क्षेत्र को अलग से मापा जाना चाहिए. सैटेलाइट मैप ठीक से काम नहीं करता है.

जहां एक तरफ जनजातीय कार्य विभाग जबलपुर के डिप्टी कमिशनर जेपी सरवटे और डिंडोरी के असिस्टेंट कमिशनर नीलेश रघुवंशी मानते हैं कि केवल ऑनलाइन आवेदन ही स्वीकार किए जाते हैं क्योंकि जनजातीय कार्य विभाग ने नए आवेदनों की सुनवाई वन मित्र पोर्टल के माध्यम से करने का आदेश दिया है.

वहीं दूसरी तरफ जनजातीय कार्य विभाग के कमिशनर संजीव सिंह बताते हैं कि इस बार वन मित्र पोर्टल और ऐप के माध्यम से नए आवेदन भी सुने जा रहे हैं.

संजीव सिंह का कहना है कि हम ऑफ़लाइन और ऑनलाइन दोनों तरह के आवेदन की अनुमति देते हैं. अगर जिला अधिकारी आदिवासियों को ऑनलाइन आवेदन करने के लिए मजबूर कर रहे हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए. नए और अस्वीकृत दोनों आवेदनों की सुनवाई पोर्टल पर की जा रही है. संशोधन करने के लिए आवेदकों को ऑफ़लाइन आवेदन करना चाहिए.

हालांकि, आदिवासियों का दावा है कि ऑफ़लाइन प्रक्रिया काम नहीं कर रही है.

इस बीच जनजातीय कार्य विभाग के एडिशनल कमिशनर सतेंद्र सिंह बताते हैं कि पोर्टल दोबारा खुलने के बाद से 8,144 नए दावे प्राप्त हुए हैं. यह सुनिश्चित करने के लिए काम चल रहा है कि ऑफ़लाइन आवेदन रिकॉर्ड ऑनलाइन दिखाई दें. एक बार यह पूरा हो जाने पर हम ऑफ़लाइन आवेदन भी स्वीकार करेंगे.

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