अपने शरीर का भार भी नहीं उठता, बस्तर में कुपोषण की ऐसी मार

कोविड-19 महामारी से कदमपारा के आदिवासी बच्चों के स्वास्थ्य की नहीं भरपाई हो सकने वाला नुकसान हुआ है. क्योंकि महामारी की वजह से प्रशासन की ओर से हफ्ते में तीन बार दूध और अंडे की आपूर्ति कुपोषित बच्चों सहित कम से कम 47 बच्चों को बंद कर दी गई थी.

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लखेश्वरी किसी तरह रेंग कर चल सकती है क्योंकि उसके पैर इतने कमज़ोर हैं कि वो अपने पैरों के सहारे अपने 5.5 किलोग्राम के नाज़ुक शरीर का भार भी नहीं ढो सकती है. राज्य सरकार की ओर से गरीब बच्चों को दिए जाने वाले खाने को लेकर तैयार भोजन के पैकेट की आपूर्ति में महामारी के चलते बाधा पहुंची है और इस वजह से सूखकर कांटा हो चुकी और अविकसित 2.5 साल की लखेश्वरी कुपोषण की एक मिसाल है.

लखेश्वरी के पिता आशा राम अपने गांव कदमपारा से 27 किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर में एक निर्माण स्थल पर काम करते हैं. उन्हें इतनी ज़्यादा दूरी इसलिए तय करनी पड़ती है क्योंकि आस-पास काम ही नहीं है और इतनी दूर काम करके वह हर दिन महज़ 250 रुपये कमा पाते हैं.

आंगनबाडी कार्यकर्ताओं ने आशा राम को 2020 में उनकी बेटी के अविकसित रह जाने की जानकारी दी थी. वो याद करते हैं कि लॉकडाउन के दौरान किस तरह उनके हाथ से रोज़गार निकल गया था और दिन में महज़ एक बार ही खाना मिल पाता था.

पिछले दिन का जो भात बच जाता था वही उनका अगले दिन का भोजन होता था. ये गरीब परिवार जो मुश्किल से अपना भरण-पोषण कर पाता था. वो अपनी बेटी को जरूरी आहार कहां से दे सकता था और इस वजह से वह बीमारी और मौत का शिकार हो गई.

कदमपारा जहां कई ग्रामीण गंभीर रूप से लेकर मामूली कुपोषण के शिकार हैं. वहां पिछले दस सालों से एक ऐसा अस्पताल है जो किसी काम का नहीं रह गया है. अगर तोंगुडा अस्पताल चालू होता तो मलेरिया, पेचिश और डायरिया के मरीज़ों का इलाज वहां हो सकता था.

इस अस्पताल के बगल में कवालीकल पंचायत के आंगनवाड़ी केंद्र में नियुक्त आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हेमलता सेठिया कहती हैं कि इस अस्पताल में कुपोषण और भूखमरी के गंभीर मामलों का भी इलाज हो सकता था. पोषण पुनर्वास केंद्र नहीं होने से ग्रामीणों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

बस्तर जिला प्रशासन के एक अधिकारी का दावा है कि जनवरी 2019 से मई 2021 के बीच इस राज्य के 1.41 लाख कुपोषित बच्चों को बचाया गया है. इस अधिकारी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि हर गांव में कुपोषित बच्चों को मितानिन (छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य स्वयंसेवकों) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मदद से गुड़, दूध और अंडे दिए जाते हैं.

पिछले साल महात्मा गांधी की 151 वीं जयंती के मौके पर राज्य सरकार ने राज्य को कुपोषण मुक्त बनाने के उद्देश्य से बहुत ज्यादा प्रचार-प्रसार के बीच मुख्यमंत्री सुपोषण योजना की शुरुआत की थी.

हेमलता सेठिया ने न्यूज़क्लिक को बताया कि महामारी से कदमपारा के आदिवासी बच्चों के स्वास्थ्य की नहीं भरपाई हो सकने वाला नुकसान हुआ है. क्योंकि कोविड-19 महामारी की वजह से प्रशासन की ओर से हफ्ते में तीन बार दूध और अंडे की आपूर्ति कुपोषित बच्चों सहित कम से कम 47 बच्चों को बंद कर दी गई थी.

47 बच्चों में से 10 से ज्यादा बच्चों का विकास रुका हुआ था. एक दूसरी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने कहा कि खाने के लिए तैयार भोजन के पैक भी न तो पर्याप्त मात्रा में हैं और न ही गुणवत्ता के ख्याल से अच्छे हैं.

सामाजिक कार्यकर्ता शकील रिज़वी कहते हैं, “राज्य के बस्तर जैसे संसाधन संपन्न इन इलाकों में आदिवासी मलेरिया जैसी घातक बीमारियों के सबसे ज्यादा शिकार हुए हैं. वहीं इन आदिवासी बस्तियों में स्वास्थ्य देखभाल की कमी की वजह से कुपोषित लोगों की तादाद बढ़ रही है. ऊपर से बढ़ती महंगाई ने उनकी समस्याओं को और बढ़ा दिया है.”

उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया कि तकरीबन 10 गांवों में कुपोषित बच्चों का गैर-सरकारी आंकड़ा 150 है. जिसमें गंभीर तेज कुपोषण और मझोले तीव्र कुपोषण, दोनों ही तरह के कुपोषणों में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज़्यादा है.

रंधरीरस गांव की चार साल की सुभद्रा का पेट आगे की ओर लटका हुआ है और लीवर शायद बढ़ा हुआ है. ऐसे में लगता है कि वह मझोले स्तर के कुपोषण की शिकार है. इस अविकसित बच्ची का वजन 9 किलोग्राम है जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वजन-आयु मानक से 2 किलोग्राम कम है.

सुभद्रा के पिता दशरू नाग एक लकड़ी कारखाने में काम करते हैं और भूमिहीन दिहाड़ी मजदूर हैं. यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें प्रोटीन सहित उचित आहार मिल पाता है? इसके जवाब में वह व्यंग्य के साथ अपने तीर-धनुष की ओर इशारा कर देते हैं जो कि इस बात का संकेत है कि ऐसा तभी मुमकिन हो सकता है जब वह खरगोश या लोमड़ी का शिकार करें.

आंगनबाडी सुविधाएं नहीं मिल पाने से उनके सेहतमंद होने की राह में रुकावट पहुंच रही है और सुभद्रा फिर से गंभीर कुपोषण की चपेट में आ गई है.

कुपोषण के अलावा माओवादियों के इस गढ़ में आदिवासियों के लिए मलेरिया एक और समस्या है. यहां के घने जंगल खास तौर पर मानसून के दौरान मलेरिया परजीवियों के प्रजनन के लिए एक मुफीद जगह हैं जिसके नतीजे कई तरह के प्रकोप के रूप में सामने आते हैं.

जब बस्तर के जंगलों के बाहर रहने वाली आबादी महामारी के दौरान जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रही थी तब रंधारीरस का आदिवासी गांव मलेरिया की दूसरी लहर से जूझ रहा था. साठ साल के कल्लू नाग जिन्हें दोबारा संक्रमण हो गया था. वो कहते हैं कि कम से कम हर घर में एक व्यक्ति को मलेरिया के लक्षण और दस्त थे.

कहा जा रहा है कि गांव में लगातार मलेरिया के इस फैलने के पीछे का कारण प्राइमाक्विन की गोलियों का नहीं होना है. यह दवा इस समय एकमात्र मलेरिया-रोधी अनुशंसित दवा है.

चित्तलगुर बड़े पारा बस्तर के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान का एक भीतरी इलाका है जहां करीब 150 लोग रहते हैं. तीन महीने पहले इस इलाके में मलेरिया के कहर ने तबाही मचा दी थी. यहां सैकड़ों ऐसे मामले थे जिनमें  मलेरिया के लक्षण थे और जिसमें दो लड़कियों की मौत हो गई थी.

बस्तर के अन्य हिस्सों के उलट सरकार के मलेरिया-रोधी कार्यक्रम मलेरिया मुक्त बस्तर अभियान के तहत चित्तलगुर को शामिल नहीं किया गया है. नाम नहीं छापने की शर्त पर एक कर्मचारी ने न्यूज़क्लिक को बताया कि नजदीकी नांगुर सीएचसी में पर्याप्त मात्रा में मलेरिया परीक्षण किट और दवायें तक नहीं हैं.

बस्तर का यह इलाका केरल के उस इलाके से कहीं बड़ा है जो मलेरिया परजीवी प्लास्मोडियम वाइवैक्स और प्लास्मोडियम फ़ॉल्सीपेरम ग्रस्त कुछ इलाको में से एक है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में मलेरिया के 76 फीसदी मामले बस्तर संभाग में हैं.

जिसमें सात ज़िले (बस्तर, सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, कांकेर और कोंडगांव) आते हैं. 2019 में बस्तर संभाग में 13.12 से ज़्यादा वार्षिक परजीवी प्रकोप (एपीआई-मलेरिया) देश में सबसे ज़्यादा था. 

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