महाराष्ट्र : गढ़चिरौली में खनन पट्टा रद्द करने की मांग को लेकर आदिवासियों का आंदोलन शुरू

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि सुरजागढ़ खनन परियोजना को दिया गया पट्टा पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम यानी पेसा अधिनियम, 1996 और वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन है. उनका यह भी कहना है कि खनन पट्टा जारी होने से पहले उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया था.

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महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के एटापल्ली और भामरागढ़ तहसील के आदिवासी लोग पिछले तीन दिनों से एटापल्ली तहसील के सुरजागढ़ में लॉयड मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड की लौह अयस्क खदान के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं.

पंचायत राज (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, पेसा अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) और महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम जैसे विभिन्न कानूनों के घोर उल्लंघन का आरोप लगाते हुए एटापल्ली और भामरागढ़ में लौह अयस्क समृद्ध पहाड़ी इलाकों में कई अन्य कंपनियों को खदान को बंद करने के साथ-साथ कई अन्य कंपनियों को दिए गए खदान के पट्टे को रद्द करने की मांग को लेकर सोमवार को हजारों स्थानीय लोग इकट्ठे हुए.

जिला परिषद सदस्य सैनू गोटा के नेतृत्व में हजारों लोग सोमवार को एटापल्ली में अनिश्चितकालीन धरना देने के इरादे से इकट्ठे हुए थे.

राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, महाराष्ट्र के राज्यपाल और गढ़चिरौली के कलेक्टर को संबोधित एक ज्ञापन में सुरजागढ़ परम्परागत इलाका गोतुल समिति और जिला महाग्राम सभा स्वयत्ता परिषद के बैनर तले प्रदर्शनकारियों ने एटापल्ली में लौह अयस्क निष्कर्षण के लिए विभिन्न कंपनियों को दिए गए पट्टों को सूचीबद्ध किया है.

जिले की कोरची तहसीलों ने पट्टों के आवंटन में कई कथित अनियमितताओं की ओर इशारा किया है. उन्होंने कहा कि विभिन्न अधिनियमों के लिए सरकार को ग्राम सभा की अनुमति लेने की आवश्यकता होती है जिसकी कभी मांग नहीं की गई थी.

उन्होंने यह भी बताया कि खनन गतिविधि प्रदूषण का कारण बनेगी और इन क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को एफआरए द्वारा दिए गए सामुदायिक वन प्रबंधन के अधिकार में हस्तक्षेप करेगी. प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि जिन पहाड़ियों को ये पट्टे दिए गए हैं, वे “आदिवासी देवताओं के बीज” हैं. खनन गतिविधि को जोड़ना आदिवासी लोगों की धार्मिक प्रथाओं और संस्कृति पर हमला है.

प्रदर्शनकारियों ने लॉयड मेटल्स द्वारा उच्च प्रभाव वाले विस्फोटकों के संभावित इस्तेमाल पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इससे क्षेत्र में लोगों के साथ-साथ जानवरों के जीवन को भी ख़तरा हो सकता है. उन्होंने यह भी कहा है कि विस्फोटकों को गुप्त रूप से नक्सलियों तक पहुंचाया जा सकता था जिसका इस्तेमाल तब राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के लिए किया जा सकता था. उन्होंने कहा कि नक्सली विस्फोटक चोरी करने के लिए खदान स्थल पर छापेमारी भी कर सकते हैं जिससे बड़ा हादसा हो सकता है.

प्रदर्शनकारियों ने ज्ञापन में आगे कहा कि रोजगार पैदा करने के नाम पर खनन गतिविधियों को बढ़ाया जा रहा है. जबकि आदिवासी लोग और अन्य पारंपरिक वनवासी पहले से ही तेंदू, बांस और अन्य लघु वन संसाधनों की कटाई करके उनके द्वारा प्रदान किए गए अधिकारों के तहत अच्छा राजस्व अर्जित कर रहे हैं.

प्रमुख सामाजिक और पर्यावरण कार्यकर्ता और राष्ट्रीय एकता परिषद के अध्यक्ष पी वी राजगोपाल ने सोमवार को प्रदर्शनकारियों से मुलाकात की और आंदोलन को अपना समर्थन दिया. उन्होंने कहा कि आदिवासी लोगों और ग्राम सभाओं को जल, जंगल और जमीन के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकारों से वंचित करने का प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने उनसे वादा किया कि वह उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करेंगे.

यह पूछे जाने पर कि आंदोलन कब तक चलेगा, गोटा ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “हम यहां लंबे समय के लिए आए हैं. लोग अपने साथ चावल कई दिनों तक चलने के लिए लाए हैं.” गोटा ने कहा कि लगभग 1,200 प्रदर्शनकारी एटापल्ली में डेरा डाले हुए हैं.

गढ़चिरौली के कलेक्टर संजय मीणा ने कहा, “पेसा या एफआरए स्थानीय लोगों को सिर्फ मामूली खनिजों पर अधिकार देता है. लौह अयस्क एक प्रमुख खनिज है और पट्टा देने की पूरी प्रक्रिया एफआरए के अस्तित्व में आने से काफी पहले पूरी हो चुकी थी. लेकिन उन्हें शांतिपूर्ण आंदोलन का अधिकार है और हमारे अधिकारी पहले से ही उनसे बात कर रहे हैं ताकि उन्हें अपना आंदोलन वापस लेने के लिए राजी किया जा सके. कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं है.”

यह पूछे जाने पर कि प्रदर्शनकारी लौह अयस्क के खनन के खिलाफ क्यों आंदोलन कर रहे हैं. गोटा ने कहा, “ऐसी किसी भी खनन गतिविधि के लिए ग्राम सभा की अनुमति की आवश्यकता होती है. वही नहीं लिया गया है. जाहिर है यह हमारे अधिकारों का उल्लंघन है.” गोटा ने आरोप लगाया कि अधिकारी उन पर आंदोलन वापस लेने का दबाव बना रहे हैं।

टिप्पणी के लिए लॉयड के अधिकारियों से संपर्क नहीं किया जा सका.

जैसा कि द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा पहले रिपोर्ट किया गया था लॉयड खदान जिसने लगभग पांच साल पहले अपना संचालन शुरू किया था जो स्थानीय आदिवासी लोगों के साथ-साथ नक्सलियों के विरोध के कारण काफी हद तक निष्क्रिय हो गई थी.

पिछले कई वर्षों में कंपनी की परिवहन गतिविधियों के साथ-साथ अधिकारियों पर बड़े नक्सली हमलों के मामले सामने आए हैं. लेकिन कंपनी ने पिछले दो महीनों से खनन फिर से शुरू कर दिया है. जिससे क्षेत्र में 2,000-3,000 से अधिक लोगों को रोजगार मिला है कंपनी के अधिकारियों ने कहा था. उन्होंने कहा कि कंपनी ने विभिन्न विकास गतिविधियों जैसे सड़कों के निर्माण और मरम्मत और स्थानीय लोगों के लिए चिकित्सा उपचार की सुविधा भी शुरू की है.

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