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महाराष्ट्र: पलायन करने वाले आदिवासी बच्चों में कुपोषण से निपटने के लिए पायलट परियोजना शुरु

प्रोजेक्ट से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि राज्य सरकार की योजनाओं के लाभ उन बच्चों तक भी पहुंचें जो अपने माता-पिता के साथ अपने ज़िलों से बाहर चले जाते हैं.

अंतर-ज़िला माइग्रेशन की निगरानी के लिए महाराष्ट्र सरकार की पायलट परियोजना बुधवार को शुरु हो गई. इस योजना के तहत प्रवासी बच्चों की सूची तौयार की जानी है, ताकि वो सरकारी कल्याणकारी स्कीमों के सुरक्षा जाल से बाहर न हों.

यह परियोजना फ़िलहाल महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल अमरावती, पालघर और नंदुरबार समेत चार ज़िलों में लागू की जाएगी, और राज्य सरकार के अलग-अलग विभाग इसके लिए समन्वय में काम करेंगे.

प्रोजेक्ट से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि राज्य सरकार की योजनाओं के लाभ उन बच्चों तक भी पहुंचें जो अपने माता-पिता के साथ अपने ज़िलों से बाहर चले जाते हैं.

महाराष्ट्र के कई ज़िलों में बच्चों में कुपोषण एक गंभीर समस्या है, जिसने इससे निपटने के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाएं शुरू की गई हैं.

अध्ययन में पाए गए आंकड़े

इस साल की शुरुआत में अमरावती ज़िले के आदिवासी-बहुल मेलघाट में एक सर्वे किया गया, जिसमें पाया गया कि जो बच्चे अपने माता-पिता के साथ ज़िले से बाहर माइग्रेट करते हैं, वो अक्सर इन योजनाओं के लाभ के दायरे से बाहर हो जाते हैं. और जब तक वो अपने गांवों में लौटते हैं, तब तक कुपोषण के खिलाफ़ लड़ाई में की गई सभी प्रगति खो चुके होते हैं.

इस साल जून में, राज्य सरकार ने इस समस्या को हल करने के तरीकों और साधनों का अध्ययन करने और एक सॉफ्टवेयर-आधारित समाधान ढूंढने के लिए एक विशेष समिति का गठन किया.

समिति ने प्रवासियों को ट्रैक करने के लिए ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों प्रणाली इस्तेमाल करने का फैसला किया. ऑनलाइन सिस्टम में प्रवासी बच्चों के बारे में डाटा होगा, जिससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि योजनाओं का फ़ायदा (विशेष पौष्टिक भोजन, अंडे) बच्चों के लिए किसी भी ज़िले में जारी रहेगा.

परियोजना का ज़ोर इस बात पर है कि जो फ़ायदे बच्चों को उनके गृह ज़िलों में मिलते हैं, वही उन्हें दूसरे ज़िलों में प्रवास करने के बाद भी पहुंच सकें.

अगले एक महीने के लिए चार पायलट ज़िलों – पालघर, चंद्रपुर, अमरावती और नंदुरबार – के अधिकारी परियोजना की प्रगति पर रिपोर्ट करेंगे. पायलट कार्यक्रम प्रवास के सभी पहलुओं की जाँच करेगा और पूरे राज्य के लिए एक समाधान ढूंढेगा.

तेलंगाना सरकार इसी तरह बच्चों की ट्रैकिंग करती है, और महाराष्ट्र प्रोजेक्ट के लिए उसकी प्रणाली का अध्ययन किया गया है. सॉफ्टवेयर के अलावा, प्रवासियों को पोशन कार्ड भी दिया जाएगा, जिसमें बच्चों के सभी डीटेल्स होंगे, ताकि वो योजनाओं का फ़ायदा हर ज़िले में उठा सकें.

इस योजना के कार्यान्वयन में बाधाओं में से एक ट्राइबल सब-प्लान इलाक़ों में से गैर-आदिवासी इलाक़ों में फ़ायदे को शिफ़्ट करना है. इस तरह का ट्रांसफर संभव नहीं है, लेकिन इस पर भी बातचीत कर इसका हल ढूंढा जा रहा है.

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  1. […] बच्चों के मामले में, नंदुरबार, जो एक आदिवासी बहुल इलाक़ा है, में 48.26 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट और 15.12% […]

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