तेलंगाना में दलित, आदिवासी लोगों के खिलाफ़ अपराधों की 3000 से ज़्यादा याचिकाएं लंबित

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग का कार्यकाल तीन साल के बाद समाप्त हो जाता है, और इस साल फ़रवरी से आयोग का काम बंद पड़ा है.

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दलितों और आदिवासियों के खिलाफ़ किए गए अत्याचारों से जुड़ी 3000 से ज़्यादा याचिकाएं इस साल फ़रवरी से तेलंगाना अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग के पास लंबित पड़ी हैं, क्योंकि राज्य सरकार ने अभी तक नए आयोग का गठन नहीं किया है.

पिछले आयोग का कार्यकाल 26 फ़रवरी, 2021 को ख़त्म हो गया था और तब से यह काम नहीं कर रहा है. तब से अब तक 3000 से ज़्यादा याचिकाएँ आयोग तक पहुंची हैं, लेकिन इन्हें वेरिफ़ाई और प्रोसेस नहीं किया जा सका है.

इस संबंध में हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) कांग्रेस नेता मेडिपल्ली सत्यम द्वारा दायर की गई थी. याचिका पर सुनवाई करते हुए तेलंगाना हाई कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव के सोमेश कुमार, प्रमुख सचिव और समाज कल्याण विभाग के निदेशक और आयुक्त राहुल बोज्जा को नोटिस जारी कर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग के गठन में देरी पर जवाब मांगा है.

सत्यम ने आरोप लगाया है कि तेलंगाना सरकार संविधान का पालन नहीं करती है, और बार-बार प्रावधानों का उल्लंघन करती है. उन्होंने कहा कि राज्य बनने के तीन साल बाद हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद ही सरकार ने 2018 में एससी, एसटी आयोग का गठन किया था, लेकिन फिर से आयोग के पुनर्गठन के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ रहा है.

जनवरी 2018 में आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा की कई अपीलों के बाद, राज्य सरकार ने एरोला श्रीनिवास को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था. इसके अलावा बॉयिला विद्यासागर, एम रामबल नाइक, सनकपाका देवैया, कुर्सम नीलादेवी और चिलकामारी नरसिम्हा आयोग के सदस्य थे.

आयोग का कार्यकाल तीन साल के बाद समाप्त हो जाता है, और इस साल फ़रवरी से आयोग का काम बंद पड़ा है.

माला वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष बट्टुला राम प्रसाद ने द न्यूज़ मिनट से कहा, “एससी, एसटी आयोग के कार्यालय में याचिकाओं के ढेर लग रहे हैं लेकिन कोई फायदा नहीं है. यहां तक ​​कि किसी संबंधित ज़िले को याचिका आगे बढ़ाने के बाद उसपर कार्रवाई करने का निर्देश देने के लिए भी कोई नहीं है. कोई मामला कितना भी सनसनीखेज हो या मुद्दा कितना भी ज़रूरी हो, अधिकारियों को इन याचिकाओं को संबंधित अधिकारियों को भेजने में एक महीने से ज़्यादा समय लग रहा है क्योंकि आयोग मौजूद ही नहीं है.”

तेलंगाना सरकार इससे पहले भी दूसरे वैधानिक निकायों का गठन करने में विफ़ल रही है. एससी, एसटी आयोग की तरह ही, महिला आयोग कम से कम दो साल से काम नहीं कर रहा था. महिला अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए गए अभियान और तेलंगाना हाई कोर्ट के एक अल्टीमेटम के बाद आखिरकार दिसंबर 2020 में तेलंगाना सरकार ने सुनीता लक्ष्मा रेड्डी को आयोग का प्रमुख नियुक्त किया.

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