नरेन्द्र मोदी: किसान आंदोलन के बाद क्या आदिवासी आंदोलन की भी काट बनेंगे

बीजेपी की असली ताक़त है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जलवा. दाहोद के आदिवासी महासम्मेलन के बाद चर्चा ये है कि क्या गुजरात में भी प्रधानमंत्री यूपी दोहरा सकेंगे. क्या इस साल के अंत में होने वाले चुनाव में बीजेपी फिर सत्ता में लौट पाएगी? यूपी दोहराने से मतलब है कि जैसे किसान के आंदोलन की बड़ी जीत के बावजूद चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में जीत दिलाने प्रधान मंत्री कामयाब रहे क्या वैसा ही कुछ गुजरात में भी हो सकता है.

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज गुजरात में अपना तीन दिन का दौरे के आख़री दिन एक बड़े आदिवासी सम्मेलन को संबोधित किया. औपचारिक तौर पर यह गुजरात सरकार का कार्यक्रम था. लेकिन माना यह जा रहा है कि दरअसल यह आदिवासी समुदाय में बीजेपी की पहुँच और पकड़ को बढ़ाने का एक ज़बरदस्त प्रयास था.

गुजरात सरकार ने इस आयोजन में दो लाख आदिवासी लोगों के शामिल होने का दावा किया है. इस आयोजन के लिए प्रशासन रात दिन लगा रहा और इसके लिए एक भव्य पंडाल बनाया गया. इस पंडाल के बारे में भी दावा किया गया कि ऐसा भव्य और विशाल पंडाल आज तक कम से कम एशिया के किसी देश में कभी नहीं बना था.

बीजेपी अब भव्य समारोह करने में एक्सपर्ट बन चुकी है. लेकिन बीजेपी की असली ताक़त है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जलवा. इस महासम्मेलन के बाद चर्चा ये है कि क्या गुजरात में भी प्रधानमंत्री यूपी दोहरा सकेंगे. क्या इस साल के अंत में होने वाले चुनाव में बीजेपी फिर सत्ता में लौट पाएगी?

दाहोद में नरेन्द्र मोदी की सभा का पंडाल

यूपी दोहराने से मतलब है कि जैसे किसान के आंदोलन की बड़ी जीत के बावजूद चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में जीत दिलाने प्रधान मंत्री कामयाब रहे क्या वैसा ही कुछ गुजरात में भी हो सकता है. 

गुजरात में हाल ही में आदिवासियों ने एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया था. यह आंदोलन पार-तापी परियोजना के विरोध में था. इस सिलसिले में आदिवासियों के संगठनों ने बड़ी रैलियाँ निकालीं. इस विरोध के कारण गुजरात सरकार को यह घोषणा करनी पड़ी की इस परियोजना पर फ़िलहाल काम रोक दिया गया है.

गुजरता सरकार ने फ़िलहाल पार-तापी परियोजना को निलंबित किया है, रद्द नहीं. आदिवासी संगठनों ने गुजरात सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए इस घोषणा के बाद भी प्रदर्शन किया था. इससे पहले भी सरदार वल्लभ भाई पटेल के मूर्ति के इलाक़े के आस-पास एक पर्यटक स्थल बनाने के प्रस्ताव के विरोध में केवड़िया में आदिवासी विरोध प्रदर्शन करते रहे हैं.

क्या मोदी बीजेपी के लिए आदिवासियों को जीत पाएँगे 

आदिवासियों के बारे में यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि उन्हें कोई आसानी से हरा नहीं पाया है. बल्कि यह कहना होगा कि उन्हें हरा कर भी उन्हें जीता नहीं जा सकता है. क्योंकि आदिवासी जब मैदान में उतरता है तो वो लड़ाई की समय सीमा या उसकी क़ीमत तय नहीं करता है.

हालाँकि दौर बदला है और लड़ाई के तरीक़े भी बदले हैं. लेकिन आदिवासियों के मूल स्वभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. बीजेपी यह बात बहुत अच्छे से जानती है. इसलिए बीजेपी ने अपने सबसे लोकप्रिय नेता और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह आस लगाई है कि वो राज्य के आदिवासियों को मनाएँ.

इस बारे में अहमदाबाद में कई दशक से पत्रकारिता कर रहे रथिन दास कहते हैं कि बेशक दाहोद रैली आदिवासियों को मनाने की कोशिश है. गुजरात की बीजेपी सरकार यह कोशिश काफ़ी समय से कर रही है. वो कहते हैं इस बात में कोई दो राय नहीं है कि नरेन्द्र मोदी का आदिवासियों को संबोधित करना मायने रखता है.

लेकिन वो यह भी मानते हैं कि आदिवासी बीजेपी से काफ़ी नाराज़ हैं. वो कहते हैं, “ पार-तापी रीवर लिंकिंग प्रोजेक्ट तो तात्कालिक मुद्दा है ही. इस पर सरकार को आदिवासियों के विरोध की वजह से पीछे हटना पड़ा है. लेकिन और भी कई मुद्दे हैं जिन पर आदिवासी बीजेपी से नाराज़ हैं. पटेल के स्टेच्यु के मसले पर भी आदिवासी सरकार से खुश नहीं हैं.” 

दादरा नगर हवेली के दिवंगत सांसद मोहन डेलकर के बेटे अभिनव डेलकर भी पार-तापी परियोजना के विरोध में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था. अभिनव डेलकर ये मानते हैं कि बीजेपी गुजरात के आदिवासी इलाक़ों में पैठ बनाने की कोशिश में है. 

अभिनव अपनी सांसद माँ कलावती डेलकर

लेकिन वो कहते हैं कि यह बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा. उनका कहना है कि आदिवासी आसानी से बीजेपी पर विश्वास नहीं कर सकते हैं. अभिनव डेलकर कहते हैं कि बीजेपी ने आदिवासियों के साथ लगातार धोखा ही किया है.

वो उदाहरण देते हैं कि उनके पिता ने अपनी मौत के लिए बीजेपी के नेताओं को ज़िम्मेदार ठहराया था. लेकिन उस मामले में भी कुछ नहीं किया गया है. वो मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कोशिशों के बावजूद गुजरात का आदिवासी बीजेपी पर भरोसा नहीं कर पाएगा. 

कांग्रेस के आदिवासी नेता राजेश वसावा कहते हैं कि पिछले कम से कम एक दशक में गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में आदिवासियों में अपने अधिकारों को ले कर जागरूकता आई है. यह बीजेपी के लिए ख़तरे की घंटी है.

बीजेपी ने लंबे समय से गुजरात शासन किया है और इस दौरान लगातार बीजेपी ने ऐसे काम किये हैं जिनसे आदिवासियों की जीविका और पहचान दोनों ही ख़तरे में पड़े हैं. इसलिए बीजेपी से आदिवासी नाराज़ हैं. 

कांग्रेस नेता राजेश वसावा

बीजेपी ने देखा है कि गुजरात के दक्षिण छोर से शुरू हो कर पार-तापी परियोजना का विरोध गांधी नगर तक पहुँचा है. 

राजेश वसावा कहते हैं, “ बीजेपी के स्थानीय आदिवासी नेताओं में साहस नहीं है कि वो जनता के बीच में जाएँ. उन्हें लोग खदेड़ कर भगा रहे हैं. इसलिए अब बीजेपी प्रधान मंत्री मोदी के ज़रिए माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है.” 

उन्होंने बताया की दाहोद के अलावा धर्मपुर में भी प्रधानमंत्री मोदी का कार्यक्रम प्लान किया गया है. वो कहते हैं कि गुजरात के विधान सभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी चेहरा नहीं होंगे. इसलिए बीजेपी के लिए गुजरात में काम आसान नहीं होगा.

वो इतना ज़रूर मानते हैं कि मोदी और बीजेपी प्रचार में काफ़ी आगे हैं. उन्होंने दावा किया दाहोद की सभा में भी जो भीड़ बताई गई है, वो दावे सही नहीं हैं. 

गुजरात में चुनाव और आदिवासी आबादी का महत्व

गुजरात की कुल आबादी का कम से कम 15 प्रतिशत आदिवासी है. राज्य की कुल 182 सीटों में से 27 जनजाति समुदायों के लिए आरक्षित हैं. इसके अलावा भी कई अनुरक्षित सीटों पर आदिवासी मतदाता प्रभाव डालते हैं. 

गुजरात के आदिवासी इलाक़ों में कांग्रेस पार्टी का परंपरागत असर रहा है. 2017 के चुनाव में भी कांग्रेस पार्टी ने कुल आरक्षित सीटों में से 14 सीट जीतने में कामयाबी पाई थी. इसके अलावा दो सीटों पर भारतीय ट्राइबल पार्टी के विधायक जीते थे. 

बीजेपी को 2017 में सिर्फ़ 9 सीटें ही मिल पाई थीं. गुजरात के पिछले विधान सभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी को अच्छी टक्कर दी थी. कांग्रेस पार्टी ने 2017 के विधान सभा चुनाव में कुल 77 सीटें जीत ली थीं. 

पिछले 5 साल में बीजेपी और आदिवासियों का कई मसलों पर आमना सामना होता रहा है. लेकिन इस मुक़ाबले में जब भी ज़रूरत पड़ी है बीजेपी पीछे हटने में हिचकिचाई नहीं है. 

आदिवासियों को दिए सरकार में अहम पद

आदिवासियों के ग़ुस्से को शांत करने के लिए बीजेपी ने कई कदम उठाए हैं. इस सिलसिले में पार्टी ने आदिवासी नेताओं को सरकार में कई अहम पद दिए हैं. बीजेपी ने अपनी सरकार में कम से कम 5 आदिवासी नेताओं को जगह दी है. 

इसके अलावा सांसद गीताबेन राठवा को BSNL का चेयरमैन भी बनाया है. लेकिन बीजेपी को इस बात का अहसास है कि आदिवासियों की नाराज़गी दूर करने के लिए इतना शायद काफ़ी ना हो.

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