आदिवासी प्रथा के तहत शिकार पर इतनी हाय-तौबा क्यों ?

7000-8000 लोगों में से मात्र 150-200 लोगों को ही शिकार में कामयाबी मिलती है. इस लिहाज़ से देखा जाए तो इस पूरे मसले को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है.

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पश्चिम बंगाल के जंगलमहल के जंगल में मार्च महीने में आदिवासियों ने कम से कम 200 जानवरों का शिकार किया है. वन विभाग की तरफ़ से दी गई जानकारी के अनुसार राज्य के मिदनापुर और झारग्राम ज़िले के जंगल में पिछले महीने आदिवासियों ने वार्षिक शिकार प्रथा के अनुसार जंगल में जानवरों को मारा था. 

वन विभाग ने बताया है कि आदिवासियों ने जिन जानवरों का शिकार किया है उनमें जंगली सुअर के अलावा ख़रगोश, साँप, पक्षी, बागड़ बिल्ला जैसे जानवर शामिल हैं.

वन विभाग का कहना है कि उसने आदिवासियों को काफ़ी समझाने की कोशिश की थी. विभाग का कहना था कि हमने आदिवासियों को बताया था कि पर्यावरण संतुलन के लिए ज़रूरी है कि इस प्रथा को बंद कर दिया जाए. 

वन विभाग का कहना है कि उनकी सारी कोशिशें बेकार हो गईं. क्योंकि आदिवासियों का कहना था कि यह उनकी धार्मिक आस्था और सामाजिक मान्यताओं का मामला है.

बताया जाता है कि पश्चिम बंगाल के मिदनापुर और झारग्राम में कम से कम 7000-8000 आदिवासी हर साल शिकार के लिए जंगल जाते हैं. यह आदिवासियों का एक वार्षिक आयोजन होता है.

सेंदरा आदिवासियों की सामाजिक मान्यताओं से जुड़ी प्रथा भी है

पश्चिम बंगाल में इसे अखंड शिकार के नाम से जाना जाता है. जबकि झारखंड और दूसरे कई राज्यों में इसे सेंदरा या सेंद्रा भी कहा जाता है. सेंदरा का मतलब ही शिकार होता है. 

दरअसल ज़्यादातर आदिवासी समुदायों में साल में एक बार अपने देवताओं और पुरखों की ख़ास पूजा करने का रिवाज़ है. इसके अलावा यह प्रथा आदिवासियों की सामाजिक मान्यताओं से भी जुड़ी है. शिकार के बाद गाँव के लोग रात भर नाचते गाते हैं. 

आदिवासियों की इस प्रथा को आज के युग में भी जारी रखने पर बार-बार चिंता व्यक्त की जाती रही है. यह कहा जाता रहा है कि इस प्रथा की वजह से जंगल में जो भी जानवर सामने आता है आदिवासी उसे ही मार देते हैं. इससे पर्यावरण के संतुलन को नुक़सान पहुँचता है.

आदिवासी समाज हो या फिर ग़ैर आदिवासी समाज, सभी को बदलते वक़्त के साथ क़दमताल करनी पड़ती है. उसमें बदलाव निश्चित हैं. इस लिहाज़ से आदिवासी समुदायों में भी बदलाव आए हैं. आदिवासी समुदायों में कई प्रथाएँ समय के साथ या तो समाप्त हो गई हैं या फिर वो प्रथाएँ अब प्रतीकात्मक रह गई हैं. 

लेकिन यह बदलवा अदालतों, क़ानूनों या ग़ैर आदिवासी समाज द्वारा आदिवासियों पर थोपा नहीं जा सकता है. यह बदलाव आदिवासी समाज के भीतर की चर्चा और संघर्ष और बाहरी प्रभाव से आता रहा है. 

जहां तक सेंदरा की वजह से पर्यावरण संतुलन बिगड़ने की बात है, तो शायद यह बात आंशिक रूप से ही सही है. क्योंकि आदिवासी साल में एक बार शिकार पर निकलता है.

7000-8000 लोगों में से मात्र 150-200 लोगों को ही शिकार में कामयाबी मिलती है. इस लिहाज़ से देखा जाए तो इस पूरे मसले को ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जाता है. 

पर्यावरण और वन्यजीवों की चिंता ठीक है लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि शिकार पर पाबंदी ने आदिवासियों के पोषण को सीधा सीधा प्रभावित किया है.

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