केरल में आदिवासी प्रथाओं को ज़िंदा रखने की कोशिश

देशभर के आदिवासी क्षेत्रों में भोजन और चिकित्सा के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैव संसाधनों, विशेष रूप से पौधों, का उपयोग अभी भी किया जाता है. यह भी सच है कि आधुनिक दवाओं में से कई इसी पारंपरिक ज्ञान की मदद से बनाई गई हैं.

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केरल में आदिवासी और दूसरे स्थानीय समुदायों की परंपराओं और प्रथाओं को जीवित रखने पर काम हो रहा है.

आदिवासी प्रथाओं का डॉक्यूमेंटेशन करने के लिए, जवाहरलाल नेहरू ट्रॉपिकल बोटैनिकल गार्डन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (Jawaharlal Nehru Tropical Botanical Garden and Research Institute – JNTBGRI), और केरल स्टेट काउंसिल फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड एनवायरनमेंट (Kerala State Council for Science, Technology and Environment – KSCSTE) ने ‘पारंपरिक और लोक प्रथाओं के जर्नल’ को पुनर्जीवित किया है.

यूजीसी (UGC)-अनुमोदित इस जर्नल का उद्देश्य वैज्ञानिक समुदाय और समाज के बीच संबंध तैयार करना है. उम्मीद है कि इस जर्नल से आम लोग और शोध संस्थान देशभर के पारंपरिक ज्ञान को डॉक्यूमेंट करने के लिए प्रोत्साहित होंगे.

देशभर के आदिवासी क्षेत्रों में भोजन और चिकित्सा के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैव संसाधनों, विशेष रूप से पौधों, का उपयोग अभी भी किया जाता है. यह भी सच है कि आधुनिक दवाओं में से कई इसी पारंपरिक ज्ञान की मदद से बनाई गई हैं.

दुनियाभर में आदिवासियों का भोजन और चिकित्सा प्रणाली प्रकृति से जुड़ा है

आज के आधुनिक दौर में भी दुनियाभर के आदिवासी समुदायों की कई ज़रूरतें जंगलों से पूरी होती हैं. आदिवासी अक़सर जंगल से मिलने वाले जैविक संसाधनों और उससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान का उपयोग अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में करते हैं.

आदिवासियों के बीच प्रकृति-मानव-आत्मा की अवधारणा बहुत पुरानी है. भारत में कई आदिवासी समुदायों का जन्म उनके आसपास की जैविक विविधता से हुआ है. आदिवासियों की संस्कृति के कई पहलू सीधे कुछ पेड़-पौधों से जुड़े हैं.

ज़ाहिर सी बात है कि आधुनिक भारत में जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान और आदिवासियों का गहरा संबंध है.

लेकिन, आदिवासियों के मुख्यधारा में धीरे-धीरे सम्मिलित होने से इस पारंपरिक ज्ञान के लुप्त होने का ख़तरा है. यह जर्नल इसी को रोकने की एक कोशिश है.

आधुनिक समाज आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान से बहुत कुछ सीख सकता है

जर्नल में केरल के अलावा, हिमाचल प्रदेश के ट्रांस-गिरी क्षेत्र में प्रचलित देसी रीति-रिवाज़ और परंपराएं, और आंध्रप्रदेश के आदिलाबाद ज़िले के आदिवासियों द्वारा उपयोग की जाने वाली स्त्री रोग संबंधी समस्याओं के हल भी शामिल होंगे.

यह जर्नल पहली बार 2013 में आयुष मंत्रालय की वित्तीय मदद से प्रकाशित किया गया था. इसके बाद KSCSTE ने इसके छह और इश्यू निकाले, और इसकी प्रिंटिंग बंद हो गई.

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