माँ कौन है और कौन है बच्चा, पहचानो तो ज़रा

ग्लोबल हंगर इंडेक्स के मापदंड और नतीजों पर सरकार ने सवाल उठाए हैं. लेकिन हमने अपनी ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान जो देखा है उसके बाद हमें किसी रिपोर्ट या आँकड़ों की ज़रूरत नहीं है. हाँ इतना ज़रूर पूछते हैं कि ये हालात क्यों हैं?

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ग्लोबल हंगर इंडेक्स (Global Hunger Index) में भारत 116 देश की सूचि में 101वें स्थान पर है. यानि भारत उन देशों में शामिल है जहां भूख और कुपोषण की स्थिति बेहद गंभीर या कहना चाहिए कि ख़तरनाक स्तर पर है.

भारत सरकार ने इस रैंकिंग पर सवाल उठाया है. सरकार ने कहा है कि इस इंडेक्स के जो मापदंड रखे गए हैं वो ही गड़बड़ हैं. ख़ैर ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रैंकिंग और सरकार की आपत्ति पर बहस होगी.

यह हो सकता है कि सरकार की बात सही हो और अलग मापदंड अपनाए जाने पर भारत की रैंकिंग कुछ सुधर जाती. लेकिन क्या एक देश, सरकार या समाज के तौर पर हम यह दावा कर सकते हैं कि भारत में अब कोई भूखा सोने को मजबूर नहीं है.

क्या यह सरकार यह दावा कर सकती है कि देश में भूख और कुपोषण उसकी चिंता में शामिल है. ख़ासतौर से कोविड और लॉक डाउन के दौरान यह इंतज़ाम किया गया है कि कोई भूखा ना सोए.

इस मामले में हम कोई दावा नहीं करना चाहते हैं लेकिन हाँ इस सिलसिले में कई शोध प्रकाशित हो चुके हैं. ये शोध बताते हैं कि इस दौरान यानि पिछले एक-डेढ़ साल में भारत में लोग भूखे भी सोए हैं और कुपोषण से लड़ने का काम भी लगभग बंद हो गया था. इस सिलसिले में हमने कई कहानी छापी भी हैं.

हम फ़िलहाल आपके सामने कुछ फ़ोटो ला रहे हैं. ये फ़ोटो हमारी मैं भी भारत की यात्रा के दौरान ओडिशा के मयूरभंज ज़िले में ली गई हैं. इससे आपको ज़मीनी सच्चाई का कुछ अंदाज़ा होगा.

लोधा आदिवासी औरत अपने बच्चे के साथ

यह पहली तस्वीर हमने मयूरभंज ज़िले के जसीपुर ब्लॉक के एक गाँव में ली थी. आप इस तस्वीर में एक माँ और उसके बच्चे को देख कर अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दोनों ही कुपोषित हैं. इस तस्वीर को देख कर बताएँ कि क्या इस लड़की की उम्र या उसका शरीर इस लायक़ है कि उसे माँ बनना चाहिए था.

बच्चे के सूखे हाथ और टांगे, बढ़ा हुआ पेट साफ़ साफ़ बताता है कि बच्चा कुपोषित है.

यह तस्वीर मांकडिया बस्ती में ली गी थी

इस तस्वीर को भी देख कर बताएँ, क्या उम्र होगी इस माँ की जिसके गोद में यह बच्चा है. बच्चे की आँखों में एक चमक है. इन आँखों में एक चमक आपको दिखाई देगी. लेकिन अब पता चल रहा है कि कोविड और लॉक डाउन के दौरान ऐसे लाखों बच्चों को आंगनबाड़ी से मिलने वाला खाना नहीं मिल पाया है. हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि यह माँ और बच्चा स्वस्थ्य होंगे.

एक लोधा बच्चा

लोधा आदिवासी बस्ती में सुबह सुबह इस बच्चे की तस्वीर हमने ली थी. जब हमने अपना कैमरा इस बच्चे की तरफ़ घुमाया तो देखो कैसे खुश था. जीने और खुश रहने की तमन्ना, पर बदन ढकने को कपड़े नहीं और पेट भरने को खाना इसके परिवार के पास नहीं है.

माँ से पिता के हाथों में आ गया

जी आपने सही पहचाना, यह वही बच्चा है जो अपनी माँ की गोद में था. अब यह बच्चा अपने पिता की गोद में है. लेकिन देखो लगता है अपने पिता से सवाल पूछ रहा है. आज काम पर तो जाओगे ना. अगर तुम काम पर नहीं गए तो हम लोगों को भूखा ही सोना पड़ेगा.

जंगल किनारे खड़ी ये आदिवासी बच्चियाँ क्या बातें कर रही होंगी

सिमलीपाल टाइगर रिज़र्व के बाहर खड़ी ये तीन लड़कियाँ आपसे में क्या बातें कर रही होंगी. शायद एक दूसरे से कह रही होंगी कि इससे अच्छा तो हमारे माँ बाप जंगल में ही थे. या फिर यह कह रही हैं कि हमें भी कुछ बनना है, पढ़ना है आगे बढ़ना है…पर कैसे.

(ये सभी तस्वीरें श्याम सुंदर ने इन बच्चों के माँ बाप की अनुमति से ली हैं.)

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