आदिवासियों के लिए अलग दंडकारण्य राज्य की मांग तेज़

10 अक्टूबर को हुई डीपीबीपी की बैठक में पूर्व केंद्रीय मंत्री और छत्तीसगढ़ के प्रमुख आदिवासी नेता अरविंद नेताम, और आंध्र प्रदेश के राजनेता गंगाधर स्वामी सेट्टी भी शामिल हुए. तीन राज्यों के नेताओं का साथ आना इस अभियान को मज़बूत बनाता है.

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अक्टूबर के दूसरे हफ़्ते में, दक्षिणी ओडिशा के कोरापुट ज़िले में एक छोटी सी बैठक आयोजित की गई. इसमें छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के राजनेताओं ने भी भाग लिया. तीन अलग-अलग राज्यों से होने के बावजूद, इन नेताओं का लक्ष्य एक था – आदिवासियों के लिए एक केंद्र शासित प्रदेश (Union Territory) का गठन.

आप सोच रहे होंगे कि तीन राज्यों के राजनेता एक अलग प्रशासनिक यूनिट क्यों बनाना चाहते हैं? दंडकारण्य यूनियन टेरिटरी की मांग के पीछे वजह है ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश सरकारों द्वारा आदिवासियों की दशकों से उपेक्षा.

ग़रीबी और विकास दंडकारण्य इलाक़े की जैसे पहचान बन गया है. यहां तीन दशकों से माओवादियों का राज था, हालांकि सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बाद उनका प्रभाव कुछ कम ज़रूर हुआ है.

1950 के दशक में, केंद्र सरकार ने बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से विस्थापित लोगों को इलाक़े में बसाया, और दंडकारण्य विकास प्राधिकरण का गठन किया.

पूर्व मंत्री, चार बार के विधायक और कोरापुट से एक बार के सांसद, जयराम पांगी ने हाल ही में भारतीय जनता पार्टी छोड़कर अपना पूरा ध्यान दंडकारण्य यूनियन टेरिटरी बनाने के काम पर लगाने का फैसला किया है. इस केंद्र शासित प्रदेश में आदिवासियों का प्रशासन में ज़्यादा अधिकार होगा, और वो इलाक़े के सभी प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णय भी ले सकेंगे.

दंडकारण्य इलाक़े में खनिजों का भंडार है

पांगी ने द हिंदू से बातचीत में कहा, “ओडिशा के सीमावर्ती इलाक़ों में रहने वाले आदिवासियों को नीतियों और उनके कार्यान्वयन में कभी भी कोई अहमियत नहीं दी जाती. इस इलाक़े में आदिवासियों के विकास के लिए न तो राज्य और न ही केंद्र सरकार ने काम किया है.”

आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए दंडकारण्य पर्बतमाला विकास परिषद (DPBP) के नाम से एक संगठन बनाया गया है. पिछले कुछ महीनों में इस संगठन ने कोरापुट जिले में कोटिया ग्राम पंचायत के आसपास की समस्याओं के समाधान के लिए आवाज़ उठाई है. कोटिया पंचायत विवादास्पद है, क्योंकि ओडिशा और आंध्र प्रदेश दोनों सरकारें इसपर दावा करती हैं.

अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाने के पीछे सबसे बड़ा तथ्य है कि इलाक़े में अधिकांश आबादी आदिवासी समुदाय से है.

छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के नेता शामिल

10 अक्टूबर को हुई डीपीबीपी की बैठक में पूर्व केंद्रीय मंत्री और छत्तीसगढ़ के प्रमुख आदिवासी नेता अरविंद नेताम, और आंध्र प्रदेश के राजनेता गंगाधर स्वामी सेट्टी भी शामिल हुए. तीन राज्यों के नेताओं का साथ आना इस अभियान को मज़बूत बनाता है.

डीपीबीपी के एक सदस्य, कोरापुट के पूर्व ज़िला कलेक्टर गदाधर परिदा कहते हैं, “कोरापुट जिले में बड़ी बांध परियोजनाओं ने हज़ारों लोगों को विस्थापित किया है और कई गांवों में पानी घुस गया. इन बांधों से बनी बिजली ने देश के कई हिस्सों को रोशन किया, लेकिन इलाक़े के आदिवासी अंधेरे में ही हैं.”

आदिवासियों को कोई फ़ायदा नहीं

इसके अलावा नाल्को द्वारा खनन और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के प्लांट से भी इलाक़े के लोगों को कोई फ़ायदा नहीं हुआ है. उन लोगों को भी नहीं जिन्हें इन कंपनियों के लिए अपनी ज़मीन से अलग होना पड़ा.

एक तरफ़ जहां दंडकारण्य इलाक़े में बसाए गए शरणार्थियों, चाहे वो बांग्लादेश से हों, या मलकानगिरी में बसाए गए श्रीलंकाई, को विकास का फ़ायदा मिला है, वहीं इलाक़े के आदिवासियों के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है. माना जा रहा है कि इस फ़र्क ने कोरापुट में सामाजिक अशांति फैला दी है.

इलाक़े से विकास जैसे गुम है

अविभाजित कोरापुट ज़िला, जिसका गठन 1936 के आसपास हुआ था, ने इस समय ओडिशा में रहने का फ़ैसला किया था. लेकिन इलाक़े के लोगों को लगता है कि क़रीब 85 साल बाद भी यह उपेक्षित ही हैं.

गदाधर परिदा के मुताबिक़ ओडिशा सरकार इलाक़े के लोगों की मदद के लिए आगे नहीं आएगी. ऐसे में दंडकारण्य को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग शुरू करने के अलावा इन लोगों के पास दूसरा विकल्प नहीं बचा है. उधर जयराम पांगी कहते हैं कि अगली पीढ़ी के भविष्य की सुरक्षा के लिए केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा सही कदम है.

अरविंद नेताम का मानना है कि ओडिशा के कोरापुट, बस्तर और सुकमा सहित छत्तीसगढ़ के कुछ ज़िले और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों की आबादी एक समान है. यहां के लोग दिसारी भाषा बोलते हैं, और उनकी संस्कृति एक जैसी है. ऐसे में तीनों इलाक़ों का साथ आना सही है.

दंडकारण्य इलाक़ा खनिज के भंडारों से लैस है. इसलिए आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सरकारों के लिए इसकी अहमियत भी ज़्यादा है. अलग प्रशासनिक यूनिट बनने से इलाक़े के आदिवासी यहां के खनिज संसाधनों से जुड़े मामलों में भी निर्णय ले सकेंगे.

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