‘सरना धर्म कोड’ आदिवासियों पर हुए अन्याय को समाप्त करेगा

जो लोग सरना धर्म की परिभाषा पूछते हैं या फिर आदिवासियों के धर्मशास्त्रों की मांग करते हैं, वो नासमझ हैं. आदिवासी लाखों साल से प्रकृति के सहचर रहे हैं और उनकी अपनी धार्मिक आस्थाएं और मान्यताएं रही हैं. जिस तरह से बाक़ी धर्मों के नियम और परंपराएं हैं उसी तरह से आदिवासियों के धार्मिक नियम और परंपराएं हैं. आदिवासी धर्म को किसी धार्मिक ग्रंथ या शास्त्र की ज़रूरत नहीं है.

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‘सरना धर्म’ की परिभाषा सबसे आसान है. आदिवासियों की धार्मिक मान्यताएं प्रकृति से जुड़ी हुई हैं, और उसके ही अनुरूप चलती हैं. मसलन विज्ञान कहता है कि धरती सूर्य के चक्कर लगा रही है और दाईं तरफ़ से बाईं तरफ़ यह प्रक्रिया चलती है. उसी तरह से आप देखेंगे कि किसी पेड़ पर जब कोई लता चढ़ती है तो वो भी दाईं तरफ़ से बाईं तरफ लिपट कर पेड़ पर चढ़ती है. उसी तरह से आदिवासी समुदायों में आप देखेंगे की उनके घरों पर लिपाई या पुताई आपको दाईं तरफ़ से बाईं तरफ़ मिलेगी. उसी तरह से जब आदिवासी त्यौहारों में नृत्य होता है, मसलन सरहूल पर जब हम साल के वृक्ष के चारों तरफ़ घूम कर नाचते हैं तो वह भी दाईं से बाईं तरफ़ होता है. खेत की जुताई भी दाईं से बाईं तरफ़ ही होती है. इस तरह से आप देखेंगे कि आदिवासी प्रकृति के नियम का अनुसरण करते हैं और उसके साथ एक तालमेल बना कर चलते हैं.

बंधन तिग्गा उरांव आदिवासियों के एक धार्मिक समारोह की अगुवाई करते हुए

जो लोग सरना धर्म की परिभाषा पूछते हैं या फिर आदिवासियों के धर्मशास्त्रों की मांग करते हैं, वो नासमझ हैं. आदिवासी लाखों साल से प्रकृति के सहचर रहे हैं और उनकी अपनी धार्मिक आस्थाएं और मान्यताएं रही हैं. जिस तरह से बाक़ी धर्मों के नियम और परंपराएं हैं उसी तरह से आदिवासियों के धार्मिक नियम और परंपराएं हैं. आदिवासी धर्म को किसी धार्मिक ग्रंथ या शास्त्र की ज़रूरत नहीं है. किसी भी धर्म के लिए धर्म शास्त्रों की अनिवार्यता नहीं होती है. अन्य धर्मों में भी तो पहले परंपराएं और नियम बने, फिर उन्हें शास्त्रों में दर्ज किया गया था.

आदिवासी धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं धरती पर सबसे पुरानी हैं. आदिवासी ये मानते हैं कि आकाश में भगवान है, बीच में उनके पुरखे हैं और ज़मीन पर इंसान हैं. जब आदिवासी सरना स्थल पर जमा हो कर अराधना करते हैं तो वो अपने धर्मेश यानि भगवान और अपने पुरखों को महसूस करते हैं. आदिवासी अपने धर्मेश और पुरखों से विनती करते हैं कि हमारी खेती अच्छी हो, गांव और समुदाय पर कोई बीमारी ना आए, कोई विपत्ति ना आए. इसलिए यह कहना कि आदिवासियों का कोई धर्म नहीं है और उनके धर्म को मान्यता नहीं दी जा सकती एक ग़लत समझ होगी.

उत्तर-पूर्व के राज्यों में सरना धर्म की स्वीकार्यता लगभग असंभव है

आदिवासियों के धर्म को समझते हुए दूसरे धर्मों की परिभाषा थोपने की कोशिशों से बचना चाहिए. मतलब ये है कि जो मापदंड दूसरे धर्मों के लिए अपनाए जाते हैं तो उसके अगर दार्शनिक पक्ष को देखेंगे तो आप पाएगें कि आदिवासी धर्म को अलग से पहचान देने का ठोस आधार है. लेकिन अगर आप हिंदू धर्म, इस्लाम और इसाई या फिर जैन और बौद्ध धर्म की तरह आदिवासियों में भी कोई ऐसा पुरुष ढूंढने निकलेंगे जिसे सभी फ़ॉलो करते हैं, तो वो आपको आदिवासियों में नहीं मिलेगा. यानि आपको हिंदुओं की तरह राम या कृष्ण, मुसलमानों के पैगंबर या इसाइयों के मसीह की तरह की व्यवस्था नहीं मिलेगी जहां पैगंबरों को ही भगवान मान लिया गया.

आदिवासी धर्म में प्रकृति के सहचर में यह माना जाता है कि ईश्वर और पुरखे ही आलौकिक ताक़त है. उसी के अनुकार आदिवासियों की धार्मिक मान्यताएं, नियम और रूढ़ीगत परंपराओं का निर्माण हुआ है. आदिवासी ने प्रकृति को महत्व दिया क्योंकि वो जानता है कि अंतत: उसके जीवन का आधार वही है. शायद यही कारण है कि आदिवासियों ने कोई मूर्ति नहीं बनाई है.

भील आदिवासी भी सरना धर्म को अपनी पहचान से नहीं जोड़ते

हाल ही के समय में भारत के आदिवासी समूहों में अपने पूजा स्थलों को सजाने संवारने की प्रवृति शुरू हुई है. मसलन सरना स्थल की बाड़ बनाई जाती है उसकी साफ़ सफ़ाई की जाती है. लेकिन अभी भी कोई मूर्ति उसमें नहीं लगाई जाती. वहां पर साल के पेड़ की अराधना की जाती है. अपने पुरखों और धर्मेश को प्रसन्न किया जाता है. कुछ जगहों पर यह भी देखा गया है कि हिंदू धर्म की देखा देखी आदिवासियों ने भी मंदिरों का निर्माण करना शुरू कर दिया है. हांलाकि आदिवासी धर्म में यह माना जाता है कि धर्मेश यानि भगवान आकाश में ही रहता है. इसलिए सरना स्थल या कोई भी और पूजा स्थल वह नहीं हो सकता जिसकी छत हो. यानि आदिवासी मान्यता के अनुसार भगवान और पुरखे खुले में रहते हैं. झारखंड में आप देखेंगे जो सरना स्थल पक्के भी बने हैं उनकी छत खुली रखी जाती है जिसके नीचे करम के पेड़ की डाल लगाई जाती है.

जहां तक आदिवासियों के मंदिर निर्माण का सवाल है तो यह बेशक आदिवासियों की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ज़रूरी नहीं है. लेकिन इसको बड़ी चिंता की बात नहीं माना जाना चाहिए. आमतौर पर सभी धर्मों में समय, स्थान और काल के हिसाब से इस तरह के प्रभाव देखे गए हैं. लेकिन धर्म का जो मूल है वह प्राचीन है.

बंधन तिग्गा का कहना है उत्तर-पूर्व के आदिवासी समूहों को सरना धर्म कोड के तहत अलग पहचान दी जा सकती है

आदिवासियों की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं का अध्ययन करने पर इस बात को समझा जा सकता है. मसलन झारखंड, ओडिशा, बंगाल, बिहार और कई और राज्यों में एक परंपरा है बिशु सेंदरा. दरअसल, जो भी आदिवासी समुदाय है चाहे वो उरांव हो या फिर मुंडा या कोई दूसरा, हर समुदाय में इस तरह की व्यवस्था मिलेगी जो समाज को चलाती है. मसलन उरांव में पड़ाह व्यवस्था है तो मुंडाओं में मानकी मुंडा व्यवस्था है.

सेंदरा का मतलब होता है मार देना. इस परंपरा के तहत आदिवासी सामूहिक तौर पर जंगल में शिकार पर जाते हैं और जो भी मिलता है उसे बांट लेते हैं. एक तरह से यह परंपरा आदिवासी मान्यताओं की रक्षा के लिए है. उसी तरह से इस बिशु सेंदरा में उस व्यक्ति को भी सज़ा दी जाती है जो आदिवासी परंपराओं या नियमों के हिसाब से नहीं चलता है. कहने का मतलब ये है कि आदिवासियों में बाक़ायदा समाज को चलाने के लिए नियम हैं और मज़बूत धार्मिक मान्यताएं हैं.

ब्रिटिश शासन में आदिवासियों की पहचान को अलग से दर्ज किया जाता रहा था. यह सिलसिला 1871 से लेकर 1941 तक चलता रहा. लेकिन उसके बाद यह बंद हो गया. क्यों हुआ, इसकी सफ़ाई आज तक किसी सरकार ने नहीं दी है. अब इस ग़लती या भूल को सुधारने का समय है. भारत के आदिवासियों को एक अलग धर्म कोड दिया ही जाना चाहिए. झारखंड की विधानसभा ने सरना धर्म कोड से संबधित बिल पास कर दिया है. अब राष्ट्रीय स्तर पर भी इसको मान्यता मिलनी चाहिए. जहां तक सवाल है कि क्या देश के सारे आदिवासियों के लिए एक ही धार्मिक पहचान संभव है, तो इस सवाल पर विमर्श हो सकता है. मेरी नज़र में सरना धर्म कोड में यह संभव है.

(बंधन तिग्गा झारखंड में सरना धर्म के लिए हो रहे आंदोलन का हिस्सा हैं और धर्मगुरू माने जाते हैं.)

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