बोलती आदिवासी लड़कियों से क्यों डरते हो ?

आपने अपने घर में अपनी बच्चियों को जमीन का हकदार नहीं बनाया तो फिर वह दूसरे के घर में जाकर कैसे क्लेम करें कि यह जमीन हमारे नाम से खरीदी गई है. अगर ग़ैर आदिवासी मर्द शोषण कर रहा है तो आदिवासी मर्द क्या कर रहा है? आदिवासी औरत दोनों के ही हाथों शोषण का शिकार है.

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मंच

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हम मंच पर गये ही नहीं

और हमें बुलाया भी नहीं

उंगली के इशारे से

हमें अपनी जगह दिखाई गयी

हम वहीं बैठ गये;

हमें शाबाशी मिली

और ‘वे’ मंच पर खड़े होकर

हमारा दुख हमसे ही कहते रहे

‘हमारा दुख हमारा ही रहा

कभी उनका हो नहीं पाया…’

हमने अपनी शंका फ़ुसफ़ुसायी

वे कान खड़े कर सुनते रहे

फिर ठंडी सांस भरी

और हमारे ही कान पकड़

हमें ही डांटा 

माफी मांगो; वर्ना…!

–वाहरु सोनवणे

दो साल बाद अपने गांव आई हूँ. यहां के पुरुष महिलाओं के साथ बैठकर किसी भी राजनैतिक और सामाजिक विषयों को लेकर चर्चा नही करते. यहाँ निरक्षर महिला ही गांव की सरपंच हैं लेकिन पार्षद पति विधायक पति की तरह यहां सरपंच के बेटे का राज चलता हैं. सरपंच बस हर पन्ने में अंगूठा लगाने के लिए हैं.

गांव की औरतें सुबह से शाम तक अपने कामों में व्यस्त रहती हैं. इसके अलावा वो समय पर पुरूष के खाने पीने का ध्यान रखती हैं. जैसे किसी अपाहिज की सेवा की जाती है. अपाहिज की तरह बैठ कर खाने वाले इन मर्दों को औरत ही पालती हैं और इनका आदेश भी मानती हैं.

इसी आदिवासी समाज के लोग कहते हैं कि हम मातृ सत्तात्मक समाज से आते हैं. यह कैसा मातृ सत्तात्मक समाज है? जहां एक लड़की के सवाल करने से, किसी की आलोचना करने से उस लड़की के चरित्र पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं. क्योंकि वह लड़की अपने समाज में होती लैंगिक असमानता को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखती है ?

अपनी ही लड़कियों से नफ़रत क्यों ?

आदिवासी समुदायों में एक नया ट्रेंड नज़र आ रहा है. कई आदिवासी संगठन यह दावा करते हैं कि आदिवासी लड़कियों को बहला फुसला कर ग़ैर आदिवासी लड़के शादी कर रहे हैं. ये संगठन यह दावा भी करते हैं कि आदिवासी लड़कियों से शादी करने के बाद ग़ैर आदिवासी परिवार आदिवासी लड़कियों के नाम पर ज़मीन ख़रीदते हैं.

लेकिन यह इलज़ाम लगाने वाले लोग या संगठन इस सवाल का सामना नहीं करना चाहते हैं कि आदिवासी समुदायों में लड़कियों को ज़मीन में हिस्सा क्यों नहीं दिया जाता है.

हमारे यहां लड़कों को यह नहीं पता की बाप दादा ने अपनी जमीन को बचाने के लिए किस कदर बाहर के लोगों से लड़ाइयां लड़ी हैं. अगर आदिवासी की ज़मीन बेची जा रही है तो दोषी आदिवासी लड़की नहीं है. क्योंकि ज़मीन ख़रीदने और बेचने वाले दोनों ही मर्द हैं.

आपने अपने घर में अपनी बच्चियों को जमीन का हकदार नहीं बनाया तो फिर वह दूसरे के घर में जाकर कैसे क्लेम करें कि यह जमीन हमारे नाम से खरीदी गई है. अगर ग़ैर आदिवासी मर्द शोषण कर रहा है तो आदिवासी मर्द क्या कर रहा है? आदिवासी औरत दोनों के ही हाथों शोषण का शिकार है.

बीच में पेंडुलम की तरह एक लड़की को घुमाते हैं और उसे ही दोष देते हैं. सच यही है कि आदिवासी पुरुष जब ग़ैर आदिवासी से शादी करने पर आदिवासी लड़की को गाली देता है तो यह उसकी कुंठा और दंभ है.

आदिवासी समुदायों को यह सोचना चाहिए कि 10 एकड़ जमीन होते हुए भी कोठार धान के नाम पर केवल एक बोरी धान दे देने से भाई बहनों का प्यार मुख्यधारा के किसी भी धर्म से से अलग हो जाता है? आदिवासियों में लैंगिक अनुपात की बात करते हुए तथाकथित प्रगतिशील विचारधारा के पुरुष फूले नहीं समाते और लहालोट होते हैं.

वह कभी नहीं बताते कि एक भाई के चक्कर में सात बहनों की लंबी कतार लगा देते हैं फिर उसे कहानी की तरह बताते हैं कि “सात बहिन रहाय भने एक भाई राहय भने”……इस भने के चक्कर में महिलाएं कितनी शारीरिक और मानसिक समस्याओं से गुजरती हैं इस बात की ना तो घर के पुरुषों को खबर है ना ही उस समाज को है.

धर्म परिवर्तन पर दोहरा मापदंड

आदिवासियों के धर्म परिवर्तन पर आजकल काफ़ी बहस हो रही है. खासतौर से उन आदिवासी परिवारों को निशाना बनाया जा रहा है जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है. धर्म परिवर्तन के सिलसिले में भी यह आरक्षण ख़त्म करने की माँग की जाती है.

आदिवासी प्रकृति का पुजारी है और उसकी अपनी जीवनशैली और धार्मिक आस्थाएँ हैं. अगर कोई आदिवासी परिवार ईसाई धर्म अपनाता है तो यह अधिकार उसे संविधान से मिलता है. यह उस परिवार का व्यक्तिगत फ़ैसला है.

वैसे ही जैसे कोई आदिवासी परिवार हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति अपना लेता है. अगर कोई आदिवासी परिवार हिन्दू धर्म का पालन करता है तो उसे धर्म परिवर्तन की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जाना चाहिए. इस सवाल पर आदिवासी समुदायों को बचने की बजाए बात करनी चाहिए. क्योंकि अंततः यह आदिवासी समुदायों से जुड़ा एक अहम सवाल है.

समुदाय के मसले और समाधान

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि किसी भी समाज की तरह से आदिवासी समाज के सामने भी कई मसले हैं. जल, जंगल और ज़मीन के अलावा सामाजिक मसले भी तो हैं. इन मसलों पर बातचीत और बहस की ज़रूरत है. इन मसलों पर बहस होती भी है.

लेकिन इस बहस में स्थानीय आदिवासी ग़ायब है. इस बहस में अन्य बुद्धिजीवियों के अलावा शहरों में रह रहे आदिवासी बुद्धिजीवी शामिल हैं. लेकिन आदिवासी इलाक़ों के नौजवान इस बहस से ग़ायब हैं. मुझे लगता है कि छत्तीसगढ़ का बस्तर हो या फिर दूसरे आदिवासी इलाक़े, आदिवासी नौजवान अपने मसलों को बेहतर समझता है.

मसलन हमारे समुदाय यानि मुरिया में भी अब लड़के लड़कियाँ पढ़ रहे हैं और अपने मसलों पर लिखने बोलने का माद्दा रखते हैं. उन्हें इस बहस में शामिल करना बेहद ज़रूरी है. क्योंकि आदिवासी के जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई हो या फिर सामाजिक मसलों की कश्मकश, इसके लिए तो ज़मीन पर उतरना होगा.

आदिवासी समुदाय को समझना होगा कि जहां एक तरफ़ उसे अपने संसाधन बचाने के लिए सरकारों पर दबाव बनाना है, वहीं अपने भीतर के संघर्ष को भी नज़रअंदाज़ नहीं करना है. जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई जितनी ज़रूरी है उतनी ही अपने समाज में बदलाव की लड़ाई अहम है.

(ज्योति मरकाम छत्तीसगढ़ के बस्तर कोंडागांव से मुरिया आदिवासी समुदाय से आती हैं वर्तमान में वह अपने समुदाय में एकमात्र स्वतंत्र पत्रकार हैं. शौक के साथ ज़िम्मेदारी की बात करें तो उसे अपने समुदाय में महिलाओं के मुद्दों पर खुलकर बातचीत करने के साथ खुले तौर पर लिखना और बोलना पसंद है. फिलहाल वह स्नातक में अंतिम वर्ष की छात्रा है.)

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  1. बहुत ही सटीक और वाजिब सवाल। एक आईना दिखाया है ज्योति आपने। जोहार 😊

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