आदिवासी कला को बढ़ावा और कोविड जागरुकता फैलाना – एक तीर से दो निशाने

“महामारी न सिर्फ़ कई ग्रामीण समुदायों को अलग-थलग कर रही थी, बल्कि लोक कला के कई रूपों को भी ख़तरे में डाल रही थी. लोग उन कलाओं को छोड़कर अपनी आय बढ़ाने वाले व्यवसायों को अपना रहे थे. इसलिए हमने COVID-19 के बारे में जागरुकता फैलाने और वैक्सिनेशन को बढ़ावा देने के लिए इन्हीं लोगों और उनकी कला का इस्तेमाल करने का फैसला किया.”

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अक्टूबर के महीने में जब पश्चिम बंगाल के शहरों में दुर्गा पूजा मनाई जा रही था, तब राज्य के पांच आदिवासी गांवों में बच्चे COVID-19 के खिलाफ़ जागरुकता पैदा करने के लिए अपने घरों की दीवारों को पेंट कर रहे थे.

एक अक्टूबर को शुरू हुआ यह अभियान UNICEF के सहयोग से जादवपुर यूनिवर्सिटी के सामुदायिक रेडियो द्वारा आयोजित किया जा रहा है, और इसे ज़मीन पर चलाने का ज़िम्मा कोलकाता स्थित चलचित्र अकादमी का है.

इस अभियान को शुरु करने के पीछे की वजहों के बारे में द हिंदू को बताते हुए, इमांकल्याण लाहिरी, जो यूनिवर्सिटी में इंटरनैशनल रिलेशन्स पढ़ाते हैं, औऱ सामुदायिक रेडियो के संयोजक हैं, ने कहा, “महामारी न सिर्फ़ कई ग्रामीण समुदायों को अलग-थलग कर रही थी, बल्कि लोक कला के कई रूपों को भी ख़तरे में डाल रही थी. लोग उन कलाओं को छोड़कर अपनी आय बढ़ाने वाले व्यवसायों को अपना रहे थे. इसलिए हमने COVID-19 के बारे में जागरुकता फैलाने और वैक्सिनेशन को बढ़ावा देने के लिए इन्हीं लोगों और उनकी कला का इस्तेमाल करने का फैसला किया.”

जागरूकता के साथ कला

जिन गांवों में यह अभियान चल रहा है, उनमें लालबाजार, उरांशोल, गंगाधरपुर, सेबैटन और ख्वारासूली शामिल हैं – ये सभी झारखंड की सीमा से लगे झारग्राम ज़िले में स्थित हैं. चलचित्र अकादमी के संस्थापक सदस्य और कलाकार मृणाल मंडल ने बताया, “हम छऊ नृत्य, पाइक नृत्य और पटचित्र का उपयोग कर रहे हैं ताकि लोगों को COVID ​​​​के खिलाफ़ आगाह किया जा सके, और वैक्सिनेशन के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.”

43 साल के मंडल 2018 से ही झारग्राम में रह रहे हैं, और लालबाजार गांव के निवासियों को कला सिखा रहे हैं. उनकी कोशिशों का ही नतीजा है कि अब यह गांव ख्वाबगाँव, या ड्रीम विलेज के नाम से जाना जाता है, और पर्यटकों के बीच काफ़ी पॉपुलर है.

ख़्वाबगांव

मृणाल मंडल कहते हैं, “मेरे लिए, अब सभी पांच गांव ख्वाबगांव हैं. यहां पर लोधा, संथाल और कुर्मी आदिवासी रहते हैं, यह बहुत शर्मीले, बहुत अच्छे लोग. आमतौर पर मैं उन्हें कला सिखाता हूं ताकि वो कला का उपयोग आजीविका के रूप में कर सकें. अब मैं आदिवासी कलाकारों को भी इस अभियान से जोड़ रहा हूं. इससे उनकी कला को भी बढ़ावा मिलेगा, उन्हें कुछ पैसा मिल जाएगा, और जागरुकता भी बढ़ेगी.”

यह अभियान – जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम और बच्चों के लिए पेंटिंग प्रतियोगिताएं शामिल हैं – अगले साल दिनाजपुर और सुंदरबन जैसे नए इलाक़ों में ले जाया जाएगा.

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