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केरल की आदिवासी बस्तियों में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक, कार्यकर्ता सरकार के आदेश से नाराज़

आदेश में कहा गया है कि जो कोई भी आदिवासी बस्तियों में प्रवेश करता है, उसे अपने प्रवेश की तारीख से 14 दिन पहले संबंधित अधिकारियों को आवेदन देकर अनुमति लेनी होगी. आदेश में यह भी कहा गया है कि बिना अनुमति के रिसर्च, इंटर्नशिप, फील्ड सर्वे और कैंप आयोजित करने, फिल्म शूटिंग और वीडियोग्राफी की अनुमति नहीं दी जाएगी.

प्रशासन की अनुमति के बिना केरल की आदिवासी बस्तियों में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है. एक नए आदेश में सरकार ने यह कहा है.

इस आदेश से आदिवासियों के बीच काम करने वाले कार्यकर्ताओं में काफ़ी नाराज़गी है, क्योंकि वो मानते हैं कि ‘यह केरल में आदिवासियों के ज़रूरी मुद्दों पर पर्दा डालने की कोशिश है, और इससे आदिवासी समुदाय शक्तिहीन हो जाएंगे.’

हालांकि, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री के राधाकृष्णन ने सरकार के इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह आदिवासियों की रक्षा करने और उन्हें माओवादियों से प्रभावित होने से रोकने के लिए है.

क्या कहता है सरकारी आदेश

12 मई, 2022 को अनुसूचित जनजाति विकास विभाग (STDD) के निदेशालय ने एक आदेश जारी किया था, जिसने केरल में आदिवासी बस्तियों में गैर-आदिवासी या ‘बाहरी लोगों’ के प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया.

आदेश में कहा गया है कि जो कोई भी आदिवासी बस्तियों में प्रवेश करता है, उसे अपने प्रवेश की तारीख से 14 दिन पहले संबंधित अधिकारियों को आवेदन देकर अनुमति लेनी होगी. आदेश में यह भी कहा गया है कि बिना अनुमति के रिसर्च, इंटर्नशिप, फील्ड सर्वे और कैंप आयोजित करने, फिल्म शूटिंग और वीडियोग्राफी की अनुमति नहीं दी जाएगी.

इसके अलावा आदेश में कहा गया है कि परियोजना अधिकारी/आदिवासी विकास अधिकारी, रिसर्च या इंटर्नशिप के लिए ज़्यादा से ज़्यादा एक महीने की अवधि की अनुमति दे सकते हैं. अधिकारियों को यह तय करने का भी अधिकार होगा कि लोग किस आदिवासी बस्ती में जा सकते हैं.

अनुसंधान, क्षेत्र सर्वेक्षण, इंटर्नशिप, फिल्म शूटिंग और वीडियोग्राफी करने की अनुमति के लिए अनुरोध जिला स्तर के विभागों को भेजे जाने हैं, और इसे आगे निदेशालय को भेजा जाएगा, जिसका इस मामले पर फैसला अंतिम होगा.

हालांकि, संबंधित अधिकारी (जिला स्तर पर) चिकित्सा ज़रूरतों और सामाजिक कार्यों से संबंधित शिविर आयोजित करने की अनुमति देंगे अगर प्रस्तावित शिविर तीन दिनों से ज़्यादा का नहीं हैं.

आदेश के अनुसार तीन दिन से ज़्यादा के शिविरों को अनुमति देने का अधिकार सिर्फ़ निदेशालय के पास है. साथ ही आदिवासी बस्तियों में रात में ठहरने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

साथ ही आदेश में कहा गया है कि हर रिसर्च/क्षेत्र सर्वेक्षण की रिपोर्ट की एक कॉपी निदेशालय को दी जाए. जो भी इन निर्देशों का पालन नहीं करेगा उसे दोबारा यात्रा करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

आदेश यह भी कहता है कि ‘वामपंथी उग्रवाद’ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के लिए पुलिस विभाग से विशेष अनुमति की ज़रूरत होगी.

आदेश की निंदा

आदिवासी कार्यकर्ताओं ने सरकार के इस कदम की निंदा की है.

वायनाड की एक आदिवासी नेता के. अम्मिणी, जो आदिवासी महिला आंदोलन की राज्य अध्यक्ष भी हैं, ने एक पत्रिका से कहा, “यह केरल में आदिवासी लोगों के मुद्दों पर पर्दा डालने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं है. शोधकर्ता, मीडियाकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता वो लोग हैं जो हमारी समस्याओं को सुनते हैं और इसे बाहरी दुनिया के सामने पेश करते हैं. सरकार इस कदम से उन्हें ऐसा करने से रोकना चाहती है.”

अम्मिणी का आरोप है कि केरल ने अब तक सिर्फ़ आंशिक रूप से वन अधिकार अधिनियम (2006) को लागू किया है. इसके अलावा वो कहती हैं कि सरकार आदिवासी बस्तियों के मुखियाओं की शक्तियों को हथियाने की कोशिश कर रही है.

आदेश पर सरकार का बयान

फ़ैसले का बचाव करते हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कल्याण मंत्री के राधाकृष्णन ने कहा कि गैर-आदिवासियों द्वारा आदिवासियों के यौन शोषण की घटनाएं चिंता की बात हैं.

उन्होंने कहा कि बाहरी लोगों की निगरानी करने और उनकी आवाजाही नियंत्रित करने की ज़रूरत है. इसके अलावा आदिवासी समुदायों में माओवादियों की घुसपैठ भी इस फ़ैसले के पीछे की एक बड़ी वजह है.

“केरल के कुछ हिस्सों में आदिवासियों की स्थिति दयनीय है, लेकिन वह अपने घरों से शिफ़्ट नहीं होना चाहते हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से उन आदिवासियों से मिला हूं जो बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों और मानव-पशु संघर्ष की घटना वाले इलाक़ों से भी बाहर निकलने को इच्छुक नहीं हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि वे माओवादियों के प्रभाव में हैं,” राधाकृष्णन ने कहा.

हालांकि, आदिवासी नेता इस विचार से सहमत नहीं हैं. “बाहरी लोगों द्वारा किया गया यौन शोषण और उत्पीड़न कोई नई समस्या नहीं है. इसलिए यह ठोस कारण नहीं हो सकता,” आदिवासी गोत्र महासभा के संस्थापकों में से एक, गीतानंदन ने कहा.

गीतानंदन के मुताबिक़ आदिवासी बस्तियों में बाहरी लोगों को प्रवेश करना चाहिए या नहीं, यह फ़ैसला लेने का हक़ सिर्फ़ आदिवासियों को ही है, न कि किसी आदिवासी विभाग के अधिकारी को.

इसके अलावा गीतानंदन को लगता है कि सरकार के नए कदम का अधिकारी दुरुपयोग कर सकते हैं, ताकि मीडियाकर्मियों को गांवों में प्रवेश करने से रोका जा सके और दुनिया को सरकार द्वारा उनके साथ किए जा रहे अन्याय के बारे में न बताया जा सके.

लेकिन मंत्री राधाकृष्णन ने इस बात का खंडन किया और कहा कि मीडियाकर्मियों को नहीं रोका जाएगा, और सरकार इस बात का ख़ास ख्याल रखेगी.

1 COMMENT

  1. अगर सरकार को आदिवासी जन की चिंता होती तो इस प्रकार की बेवजह रोक ना लगाती, क्या सरकार को आदिवासी जन के जागरूक ना हो पाने में शंका है तो सरकार का भ्रम है आदिवासी जन अपना अच्छा और बुरा जानते है, सरकार अपनी विफलताओं को इस आदेश के जरिए छुपाना चाहती है जो बिल्कुल भी न्योचित नही है, सरकार अपना कार्य करें और मिडिया कर्मियों को अपना कार्य करने देना चाहिए।

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