बँधुआ मज़दूरी के गोले में घूमता भारत का आदिवासी

"जब हम वहाँ काम करेंगे तो फिर मज़दूरी नहीं मिलेगी. बस खाने पीने के लिए थोड़ा बहुत पैसा दिया जाएगा. अभी यानि ऑफ़ सीज़न में मज़दूरी 150 रूपये रोज़ मिलती है जब सीज़न होता है तो मज़दूरी 200 रूपये रोज़ हो जाती है. हम सारे एक साथ मज़दूरी के लिए नहीं जाते हैं. जैसे मेरा बेटा अभी घर पर है क्योंकि वहाँ पर जो ढोर हैं जैसे गाय है या बकरे हैं उन्हें सँभालना पड़ता है."

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मध्य प्रदेश के बड़वानी के बस अड्डे पर गहमागहमी और रौनक़ कुछ कम है. इसकी दो वजह हैं पहली वजह तो कोरोना की मार है और दूसरी वजह है कि यह पलायन के लिए ऑफ़ सीज़न है.

यानि इस समय आदिवासी मज़दूरी के लिए कम संख्या में घर से निकलता है. बरसात के मौसम में आदिवासी पहाड़ी ढलानों और जंगल में अपने खेतों में बीज डालता है.

इस सीज़न में जो आदिवासी बस स्टैंड पर नज़र आते हैं वो अपने गाँवों को लौट रहे हैं. ये आदिवासी अपने पशुओं के लिए कुछ चारा और सेठ से एडवांस ले कर लौटते हैं. 

ऐसे ही एक आदिवासी जिन्होंने अपना नाम बिलम बताया था, कहा, “मैं सेठ के पास गया था पैसा लाने के लिए. पैसा मैं एडवांस लेने गया था क्योंकि मुझे अपने खेत में मक्का और दूसरी फ़सल के लिए बीज और खाद ख़रीदना है. इसलिए सेठ के पास गया था एडवांस लेने के लिए. अभी हम अपने घर पर रहेंगे और तीन चार महीने अपने खेत में काम करेंगे. जब अपनी फ़सल कट जाएगी तो दशहरे के बाद सेठ के पास चले जाएँगे. वहाँ उनके खेत में काम करेंगे.”

सेठ से लिया गया यह एडवांस इस परिवार को एक ऐसे चक्र में लिए हुए है जिसे बँधुआ मज़दूरी कहा जाता है. मध्य प्रदेश के इस इलाक़े में जिसमें बड़वानी के अलावा खरगोन, धार, झाबुआ और अलिराजपुर भी शामिल है, हज़ारों आदिवासी परिवार इस चक्र में फँसे हुए हैं.

ये आदिवासी ऑफ़ सीज़न में यानि उस समय जब सेठ के खेतों या भट्टों या फिर निर्माण क्षेत्र में काम नहीं होता है, एडवांस पैसा लेते हैं. उसके बाद महीनों तक सेठ के यहाँ काम करते हैं.

बिलम बताते हैं, “जब हम वहाँ काम करेंगे तो फिर मज़दूरी नहीं मिलेगी. बस खाने पीने के लिए थोड़ा बहुत पैसा दिया जाएगा. अभी यानि ऑफ़ सीज़न में मज़दूरी 150 रूपये रोज़ मिलती है जब सीज़न होता है तो मज़दूरी 200 रूपये रोज़ हो जाती है.  हम सारे एक साथ मज़दूरी के लिए नहीं जाते हैं. जैसे मेरा बेटा अभी घर पर है क्योंकि वहाँ पर जो ढोर हैं जैसे गाय है या बकरे हैं उन्हें सँभालना पड़ता है. अरे बाबा साढ़े सात एकड़ ज़मीन है वैसे उसका पट्टा अभी नहीं मिला है. लेकिन जब बारिश नहीं आती है तो सूखा पड़ जाता है. तो कैसे काम चलेगा. मज़दूरी तो करनी ही पड़ेगी.”

अब कोई भी यह तो कहेगा ही कि अगर सेठ से एडवांस लिया गया है तो उसका पैसा चुकाने के लिए अगर परिवार सेठ के यहाँ काम करता है तो उसमें बुराई क्या है.

इसमें बुराई ये है कि सेठ पैसा देता है लेकिन पैसा चुकाने का विकल्प नहीं देता है. सेठ की तरफ़ से शर्त होती है कि इस पैसे के बदले में उसकी तरफ़ से तय मज़दूरी पर पूरे परिवार को काम करना पड़ेगा.

इस दौरान एडवांस लेने वाले आदिवासी परिवार के पास अगर ज़्यादा मज़दूरी देने वाला कोई ऑफ़र भी हो तो वो इसे स्वीकार नहीं कर सकता है.

क्योंकि वो सेठ के यहाँ बंध चुका है. बँधुआ मज़दूरी उन्मूलन क़ानून 1976 के अंतर्गत इन आदिवासी परिवारों को बँधुआ मज़दूर के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता है. यह क़ानून बँधुआ मज़दूरी को परिभाषित करते हुए कहता है – 

“बंधुआ मज़दूरी (उन्मूलन) अधिनियम, 1976, की धारा 2(जी) के अनुसार बंधुआ मजदूरी क़र्ज़ या सामाजिक दबाव के बदले काम (श्रम) करना है. जब मजदूर निम्नलिखित अधिकारों में से किसी एक को खो देता है: (1) न्यूनतम मजदूरी (2) आवाजाही का मौलिक अधिकार, (3) रोजगार का अधिकार, या (4) अपने उत्पाद को बाजार मूल्य पर बेचने का अधिकार.  तो उसे बँधुआ मज़दूर माना जाएगा. ऐसे मामलों में, जिला मजिस्ट्रेट को पीड़ित के बचाव, रिहाई और पुनर्वास और अपराधी के खिलाफ मुकदमा चलाने की सकारात्मक कार्रवाई करने के लिए बाध्य किया जाता है.”

ग़रीबी और बेबसी इन आदिवासी परिवारों को बँधुआ मज़दूरी की तरफ़ धकेलती है. ये आदिवासी अपने खेतों पर फ़सल पैदा करते हैं. लेकिन बारिश के भरोसे खेती रहती है.

इसके अलावा बीज, खाद और कीटनाशक के बढ़ते दाम खेती को लगातार महँगा बना रहे है. क़र्ज़ की कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं है.

इन हालात में आदिवासियों के लिए बँधुआ मज़दूरी का यह चक्र ही जीवन चक्र बन गया है. पीढ़ी दर पीढ़ी ये परिवार इस चक्र में चलता रहते हैं.

बड़वानी ज़िले के भुक्सी लौट रहे सेकड़िया कहते हैं, “घर जा कर देखते हैं कि फ़सल बची है या मर गई.  हमने खेत में बाजरा, मूँग और कुछ और जवार बोई हुई है. मेरे पास ज़्यादा ज़मीन नहीं है. मेरे पिता के नाम पर तो काफ़ी ज़मीन थी. लेकिन अब भाइयों में बट गई है. मेरे पास साढ़े सात एकड़ ज़मीन है पर उसमें से हमें तीसरा हिस्सा ही मिलता है. मेरा 10 लोगों का परिवार है. इसलिए मज़दूरी करनी ही पड़ती है. अगर बारिश नहीं होती है तो खेतों के लिए तो छोड़िए पीने का पानी भी नसीब नहीं होता है. नदी नाले सब सूख जाते हैं. परिवार के अलावा गाय-भैंस और बकरियों के लिए भी तो खाना जुटाना पड़ता है. इसलिए जहां भी हो वहाँ मज़दूरी के लिए चले जाते हैं.”

साल भर आदिवासी परिवार एक गोले में घूमते रहते हैं. परिवार के कुछ सदस्य मज़दूरी से लौटते हैं तो परिवार के दूसरे सदस्य जो अभी तक घर की देख-भाल कर रहे थे, वो मज़दूरी पर निकल जाते हैं.

इस गोले में घूमते हुए इन परिवारों के बच्चों की शिक्षा का क्या होता है, उनके टीकाकरण का क्या होता है, उनके पोषण का क्या होता है.

जब ये आदिवासी काम की तलाश में जाते हैं तो बच्चे भी तो अपने साथ ले जाते हैं. जहां जाते हैं वहाँ ना तो स्कूल जाने का मौक़ा मिलता है और ना ही बच्चों को आंगनबाड़ी की सुविधा ही मिल पाती है. 

2011 की जनगणना में भी यह तथ्य सामने आता है कि भारत में कम से कम 135000 लोग बँधुआ मज़दूर हैं. 2016 का Slavery Index का अनुमान है कि भारत में कम से कम 80 लाख लोग ऐसे हैं जो बंधुआ मज़दूर की श्रेणी में हैं.

बड़वानी और आस-पास के ज़िलों के लाखों आदिवासी परिवार इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं. बेशक बड़े जमींदारों और सेठों के हाथों इन आदिवासियों का शोषण हो रहा है.

लेकिन बंधुआ मज़दूरी के इस गोले में घूमते इन आदिवासियों को आप कम से कम जि़ंदा तो देख पा रहे हैं. क्योंकि कोई संस्थागत व्यवस्था तो इन्हें ज़िंदा भर तक रखने की दिखाई नहीं देती है. 

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